पाकिस्तान से एक गांव लेने के लिए भारत को गंवाने पड़े बारह गांव

शहीद राजगुरू की जयंती पर विशेष

उत्तम मुखर्जी

आज देश पर कुछ बातें करता हूं। आज उन्हें याद कर लेता हूं आज़ादी की जंग में खुद को जिन्होंने कुर्बान कर दिया। आज आपको पंजाब के एक गांव में लिए चलता हूं जो है तो पाकिस्तान का लेकिन मिल गया है हिन्दुस्तान को। एक ऐसा गांव जिसे पाकिस्तान से लेने के लिए भारत को बारह गांव देने पड़े।

आज राजगुरू की जयंती है। शिवराम हरि राजगुरू। महाराष्ट्र के पुणे में आज ही के दिन सन 1908 में इनका जन्म हुआ था । 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ इन्हें भी अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था। हंगामा खड़ा होने के डर से अंग्रेजों ने सतलुज नदी के किनारे हुसैनीवाला के पास इनके शव फेंक दिए थे। एक दिन पहले इन क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाकर लाशें फेंक दी गई थी । सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के आरोप में उन्हें सजा सुनाई गई थी।
क्या हिन्दू क्या मुसलमान..भगत, सुखदेव और राजगुरू की याद में उस दिन सभी फफक फफक कर रोए थे। किसी के घर पर चूल्हा नहीं जला था। मात्र 23 साल की उम्र में हमारी आज़ादी की खातिर भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजगुरू ने फांसी की रस्सी को चूम लिए थे।

कहानी फ़िरोजपुर के हुसैनीवाला की,जहां है राजगुरू की समाधि

भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु का अंतिम संस्कार पाकिस्तान के हुसैनीवाला में हुआ था। सतलुज के किनारे NH पर यह इलाका स्थित है। सूफी ग़ुलाम हुसैनवाला के नाम पर इस गांव का नाम हुसैनीवाला पड़ा है। सूफी का मज़ार भी यहां है।
अब कहानी को थोड़ा टर्न देता हूं। दरअसल हिंदुस्तान अपने शहीदों की याद में हुसैनीवाला में राष्ट्रीय स्मारक बनाना चाहता था। यह सम्भव नहीं हो पा रहा था क्योंकि मुल्क के बंटवारे के बाद हुसैनीवाला पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। भारत ने पाकिस्तान को हुसैनीवाला लौटाने का प्रस्ताव दिया। पाकिस्तान तैयार तो हो गया लेकिन इसके बदले सीमा से सटे बारह गांव भारत से मांग लिए। भारत भी क्या करता? शहीदों को सम्मान देना था। मज़बूरी में 12 महत्वपूर्ण गांव पाकिस्तान को दे दिए गए । तब जाकर हमें हुसैनीवाला मिला।
भारत और पाकिस्तान की सीमा के निकट हुसैनीवाला गांव है, जो फिरोजपुर जिले के अंतर्गत आता है। यहां शहीदे-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की समाधियां मौजूद हैं।भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा थी कि जहां भगत सिंह रहे वहीं उनकी भी समाधि बने। इसलिए बटुकेश्वर की समाधि भी यहां मौजूद है। साथ ही पंजाब माता के खिताब से नवाजी गईं भगत सिंह की माता विद्यावती देवी की समाधि भी यहीं पर स्थित है। बेटे के स्मारक के बगल में ही उनकी मां आखिरी नींद लेना चाहती थी। भारत ने अपने 12 गांवों के बदले इस गांव को विशेष रूप से पाकिस्तान से इसलिए लिया, क्योंकि यहां शहीदों की निशानियां और देशवासियों की भावना जुड़ी हुई है। ये भारतीय इतिहास में बेहद ही महत्वपूर्ण जगह है।

हुसैनीवाला में BSF केंद्र है। उसी परिसर में सूफी ग़ुलाम हुसैनवाला का मज़ार आज भी है। सतलुज के इस पार हुसैनीवाला जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान के हिस्से में गंडा सिंह वाला गांव है।
पाकिस्तान से लिखापढ़ी में यह गांव भारत को मिला हुआ है। बावजूद सत्तर के दशक में पाकिस्तान ने शहीदों के स्मारक को नुकसान पहुंचाया था। बाद में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने वर्ष 1973 में इसका पुनरुद्धार कर राष्ट्रीय स्मारक बनाया। ज्ञानी जी उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री थे।
हर साल यहां 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।

उत्तम मुखर्जी

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