क्या अपनी फौज हटाने के साथ ही तालिबान के लिए रेड कारपेट बिछा रहा अमेरिका!

(लिमटी खरे)

दुनिया के चौधरी अमेरिका के द्वारा अफगानिस्तान से सेना वापसी की घोषणा के बाद 04 मई को अफगानिस्तान पर तालिबान ने हमला किया और उसके बाद से तालिबान के हमले लगातार ही जारी है। तालिबान के हमलों के बीच अमेरिका की फौज के कदम वापस खींचने के मामले में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन प्रशासन की बहुत किरकिरी हुई। दुनिया का सबसे ताकतवर देश आखिर मौन क्यों है! हमारे मतानुसार बाईडेन माकूल वक्त का इंतजार कर रहे हैं, और जैसे ही तालिबान के कमोबेश सारे सरगना अफगानिस्तान में एकत्र होंगे अमेरिका उन पर हमला बोल देगा। अमेरिका और भारत के नागरिकों को जिस तेजी से अफगानिस्तान से निकाला जा रहा है यह उसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। अमेरिका दो तरह की रणनीति अपना सकता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन के द्वारा 14 अप्रैल को अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी की घोषणा की गई, 11 सितंबर तक समूची सेना वहां से वापस होने की बात भी उन्होंने कही।। मई से सेना वापसी आरंभ भी हुई। इधर सेना की वापसी आरंभ हुई उधर 04 मई को दक्षिणी हेलमंड सहित अन्य आधा दर्जन प्रांतों पर तालिबान के द्वारा अफगानी सेना पर जबर्दस्त हमला किया गया। इसके बाद से तालिबान लगातार ही आगे बढ़ रह है। उधर, अमेरिकी सेना की हरकतें देखकर यही लग रहा है कि अमरीकि सेना पीछे हटते हुए तालिबानियों के लिए रेड कारपेट बिछा रही है। अगर मई में ही तालिबान के हमलों को अमेरिका के द्वारा नाकाम कर दिया जाता तो हालात इस कदर बदतर होने से रोका जा सकता था।

आज समूचा विश्व अफगानिस्तान में तालिबानी बर्बरता की कहानी सुन रहा है। अब अफगानिस्तान का एक बार फिर बर्बरता के शिकंजे में जाना विश्व के लिए चिंता की बात मानी जा सकती है। तालिबान की हरकतों का समर्थन शायद ही कोई देश करे। कुछ देशों में फिरकापरस्त लोग जरूर तालिबान की गतिविधियों को जायज ठहरा सकते हैं। भारत में लोग इतिहास के पन्ने पलटकर भावुक हो सकते हैं कि अफगानिस्तान कभी भारत का अंग रहा है। लगभग दो दशकों से अफगानिस्तान के पुर्ननिर्माण में भारत की महती भूमिका रही है। भारत ने लगभग 2.3 अरब डालर के सहायता कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा था, जिन पर अब प्रश्न चिन्ह लग गया है। अफगान मूल के लोग तो भारत के प्रति मैत्रीभाव रखते हैं पर तालिबान का रूख भारत के प्रति क्या रहा है यह बात किसी से छिपी नहीं है।

अफगानिस्तान के एयरपोर्ट के जो दृश्य दुनिया के सामने आए हैं वे यह साबित करने के लिए पर्याप्त माने जा सकते हैं कि तालिबान का कितना खौफ है लोगों के मानस पटल पर। तालिबान का तुर्रा तो देखिए, तालिबान ने अब तक अफगानिस्तान से भाग रहे लोगों को रूकने की अपील करना भी उचित नहीं समझा है। ऐसा नहीं कि मजहबी आधार वाले सारे देश इसी तरह की मानसिकता को रखते हैं। संयुक्त अरब अमीरात को देखिए, यूएई ने दुनिया भर के योग्य और बेहतरीन लोगों को एक माला में पिरोकर वहां आदर्श समाज की स्थापना की है। यूएई में मजहबी कानून और पाबंदियां हैं, उनका पालन कड़ाई से जरूरी है, पर इसके बाद भी लोग वहां जाने लालायित रहते हैं।

तालिबान का भारत के प्रति क्या रूख है यह बात आईने के मानिंद साफ है। दो दशकों में तालिबान के द्वारा भारतीय दूतावास पर जिस तरह एक के बाद एक हमले किए, कंधार विमान अपरहण आदि अनेक उदहारण हैं, जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि तालिबान की भारत के प्रति किस तरह की मंशाएं हैं। तालिबान को अफगानिस्तान के रूप में एक सुरक्षित ठिकाना मिलने की बात भी कही जा रही है।

वैसे इस सबके बाद भी दुनिया के चौधरी अमेरिका के द्वारा जिस तरह कदम पीछे खींचे जा रहे हैं, वह बात किसी को हजम नहीं हो पा रही है। विश्व में अमेरिका की तूती बोलती है, इसके बाद भी अमेरिका चुप क्यों है! कहा जा रहा है कि तालिबान के द्वारा अमेरिका पर बड़ा हमला करने की तैयारी की जा रही थी। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन के द्वारा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा अफगानिस्तान के फौज वापस लाने की बात का मसर्थन करते हुए कवायद आरंभ की गई। जैसे जैसे अमेरिका की फौज इलाकों से हटीं वैसे वैसे तालिबान ने उन इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया। लोग तो यह कहने से भी नहीं चूके कि क्या अमेरिका के द्वारा फौज हटाने के साथ ही तालिबान के लिए रेड कारपेट बिछाता दिख रहा है।

दरअसल, अमेरिका के द्वारा अफगानिस्तान को खुला छोड़कर तालिबान का ध्यान अमेरिका पर हमले से भटकाने की कवायद की गई है। तीन चार महीने में अमेरिका के द्वारा तालिबान को अफगानिस्तान में ही घेर दिया गया है। इसके साथ ही भारत व अमेरिका के द्वारा अपने नागरिक जिस तेजी से वहां से निकाले जा रहे हैं, वह भी एक रणनीति का हिस्सा ही माना जा सकता है। अमेरिका के द्वारा बीस साल तक अफगानिस्तान पर फौज के जरिए शासन किया है। आज चप्पे चप्पे में अमेरिका के सूत्र, गुप्तचर सभी का बोलबाला है। अफगानिस्तान में मोबाईल नेटवर्क भी अमेरिका के कब्जे वाली कंपनियों का है। इस लिहाज से तालिबानियों की हर हरकत पर अमेरिका बारीक नजर रखे हुए है।

हमारी समझ के अनुसार अमेरिका के दो प्लान हो सकते हैं। पहले प्लान के तहत अमेरिका उस वक्त का इंतजार कर रहा होगा ताकि तालिबान के सेकण्ड लाईन के लीडरान अफगानिस्तान में एकत्र हो जाएं। उसके बाद अमेरिका उन सबको घेरकर मारने का काम कर सकता है। इससे तालिबान के लड़ाकों को वह दिशाभ्रमित कर देगा और उन्हें दोबारा संगठित होने, नेतृत्व मिलने में एक दशक से ज्यादा का समय लग सकता है। इस काम के लिए अमेरिका डेढ़ से दो माह तक इंतजार कर सकता है। तब तक तालिबान की बर्बरता से अफगान मूल के नागरिक भी आज़िज आ चुकेंगे और वे अमेरिका की फौज के मुखबिर भी बन सकते हैं। तालिबानियों को अफगान में ही समेटने के लिए अमेरिका अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक इंतजार कर सकता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका के प्लान बी के अनुसार अमेरिका अब ज्यादा इंतजार शायद ही करे। इसका कारण यह है कि अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाने और उसी दौरान युद्ध विराम के समझौतों को तालिबान के द्वारा सरेआम तोड़ने पर भी अमेरिका की चुप्पी के कारण अमेरिका सहित वैश्विक स्तर पर अमेरिका की बहुत बदनामी हो रही है। फिलहाल जिन हवाई जहाजों से अमेरिका के नागरिकों को बाहर निकाला जा रहा है, उन्हीं जहाजों के जरिए अमेरिका के द्वारा अपनी फौजों को भी भेजकर हवाई अड्डों पर रिर्जव में रखा जा रहा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कुल मिलाकर यह पूरी कहानी डेढ़ से दो माह के बीच ही सिमटने की उम्मीद लग रही है। इस बार अमेरिका आर पार की लड़ाई अर्थात तालिबानी आतंक से दुनिया को मुक्ति दिलाने की फिराक में ही दिख रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका की यह अघोषित मुहिम कारगर साबित हो . . .

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