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    भारत किसी को भी अपने कंधों का उपयोग करने की इजाजत नहीं देगा . . .

    लिमटी खरे

    रूस और यूक्रेन के बीच महीने भर से ज्यादा समय से चल रहे युद्ध के बीच भारत की तटस्थ भूमिक पर अमेरिका की टीका टिप्पणी के बाद विश्व भर में इस बात को लेकर जिज्ञासाएं तेज हो रहीं थीं कि भारत और अमेरिका के बीच कहीं संबंध बिगड़ न जाएं। सियासी बियावान में तरह तरह के कयास भी लगाए जा रहे थे, किन्तु इसी बीच दुनिया के चौधरी अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच वर्चुअल माध्यम से बातचीत ने अनेक संदेश दुनिया को दे दिए हैं। इस बातचीत के बाद दुनिया भर में उस बात को हवा मिलना बंद हो गई है जिसमें कहा जा रहा था कि अमेरिका और भारत के बीच तनाव की स्थितियां पैदा हो रहीं हैं।

    भारत और अमेरिका के रक्षा मंत्रियों के बीच साझा संवाद का यह चौथा अवसर था। अमेरिका को इस बात पर आपत्ति है कि भारत रूस से तेल क्यों खरीद रहा है, पर भारत की ओर से जिस प्रभावी तरीके से तेल खरीदी के बारे में अपना पक्ष रखा उससे अमेरिका का रूख भी अब सकारात्मक ही दिख रहा है। इस सबके पीछे एक बात यह समझ में आती है कि अमेरिका चाह रहा था कि भारत अपना तटस्थ रूख छोड़कर अमेरिका के साथ आ जाए। यूक्रेन के पक्ष में खड़े अमेरिका के द्वारा यूरोप के साथ मिलकर रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं। अमेरिका के द्वारा रूस से तेल नहीं खरीदने के दबाव भी बनाए जा रहे हैं।

    हाल ही में अमेरिका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिलीप सिंह जब दिल्ली यात्रा पर थे, तब उन्होंने भारत को लगभग चेतावनी भरे शब्दों में कहा था कि भारत इस बात का मतलब जरूर समझ ले कि वह अमेरिका के प्रतिबंधों को अगर नहीं मानता है तो क्या स्थिति हो सकती है। इस सबके बाद भी भारत अपने इरादों और नीतियों पर चट्टान के मानिंद अड़िग ही प्रतीत हुआ और भारत ने अमेरिका को अपने रूख से साफ तौर पर आवगत कराते हुए जता दिया है कि रूस और यूक्रेन युद्ध मामले में वह अपने तटस्थ रवैए को नहीं त्यागेगा! अमेरिका के सामने इतना कहने के लिए किसी देश को बहुत साहस करना होता है, पर भारत ने वैश्विक स्तर पर जिस तरह की अपनी साख बनाई है, उस आधार पर भारत के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल नहीं प्रतीत होता है।

    इसके साथ ही यूक्रेन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के द्वारा कराए गए सभी मतदान में भारत ने भाग न लेकर दुनिया भर को यह स्पष्ट संदेश भी दिया है कि वह अपने कंधे का इस्तेमाल करने की इजाजत किसी को भी नहीं देगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूख से अमेरिका का प्रशासन यह बात साफ तौर पर समझ ही चुका होगा कि भारत के द्वारा अपने हितों और वैश्विक व्यवस्थाओं, वैश्विक शांति आदि के बीच संतुलन साधने में माहिर है। यह बात इससे ही साफ हो जाती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाईडेन के साथ हुई बातचीत में एक बार भी रूस का नाम तक नहीं लिया।

    कहा जाता है कि मनभेद और मतभेद दो अलग अलग बातें होती हैं। अनेक वैश्विक मामलों में भारत और अमेरिका के बीच भले ही मतभेद हों, पर इसके बाद भी दोनों देशों के बीच नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। भारत के द्वारा रूस के साथ पुराने संबंधों को भी हरा रखा गया है। भारत कहता आया है कि रूस के साथ उसकी मित्रता दशकों पुरानी है और उसमें बदलाव नहीं आ सकता है। इधर, अमेरिका के विदेश सचिव एंथनी ब्लिंकेन ने भी इस बात को बहुत ही साफगोई के साथ स्वीकार किया था कि जब भारत के साथ अमेरिका प्रशासन पूरी तरह सहयोग स्थापित नहीं कर पा रहा था तब साल दर साल भारत और रूस के बीच संबंध प्रगाढ़ हुए थे।

    हम बहुत पहले से ही यह कहते आ रहे हैं कि विश्व की महाशक्ति चाहे कोई भी बने, पर वह भारत के सहयोग के बिना इस मुकाम पर नहीं पहुंच सकता है। दरअसल, भारत और अमेरिका दोनों ही विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं। अमेरिका जानता है कि चीन पहले से ही रूस के साथ कदमताल करता आ रहा है। चीन के पास बड़ी सैन्य ताकत है और एक बहुत बड़ा बाजार भी उसकी झोली में ही है। इन परिस्थितियों में भारत को साथ लिए बिना बात शायद ही बन पाए। इसी बीच भारत और चीन के बीच तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए अमेरिका भी भारत को अपने पक्ष में करने लालायित ही दिख रहा है। यह बात सत्य है कि अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के हिसाब से ही कूटनीति निर्धारित की जाती है, पर भारत में संस्कार कूट कूट कर भरे हैं, इसलिए भारत अनेक नाजुक हालातों में रूस के सहयोग को भला कैसे बिसार सकता है।

    अगर अमेरिका और रूस की तुलना की जाए तो भारत के लिए रूस ही वजनदार इसलिए साबित हो सकता है क्योंकि अनेक मौकों पर बाकायदा सबूत सामने होने के बाद भी पाकिस्तान के प्रायोजित आतंकवाद के अनेक मामलों में अमेरिका ने भारत के हितों की साफ तौर पर अनदेखी भी की है। जहां तक रूस और यूक्रेन के युद्ध की बात है तो भारत के द्वारा तटस्थ रहने के साथ ही साथ यूक्रेन में निर्दोष नागरिकों की हत्याओं के मामले में तल्ख शब्दों में निंदा कर यह साबित किया है कि वह मित्रता तो करना जानता है पर अमानवीय कृत्यों में किसी के साथ नहीं है। भारत का रूख रूस के प्रति काफी सकारात्मक है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका भी चाह रहा है कि भारत अब उसका साथ दे, इसके लिए वह दबाव की राजनीति को भी अपना रहा है, पर अमेरिका यह भूल जाता है कि अब एकांगी दबाव अर्थात एक तरफा दबाव का दौर समाप्त हो चुका है। यही कारण है कि अमेरिका के दबाव के बावजूद भी भारत के द्वारा रूस से तेल खरीदी की गई है। इसलिए अब अमेरिका को समझना होगा कि अगर उसे अपनी बादशाहत बरकरार रखना है तो समन्वय के साथ सबका हित साधने की नीति को अपनाना जरूरी है।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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