‘इण्डियन भारत’ के ‘महाभारत’ का दुर्योद्धन-प्रसंग

मनोज ज्वाला

‘इण्डिया दैट इज भारत’ के संविधान से संचालित भारतीय लोकतंत्र के
महापर्व का १७वां आयोजन जारी है । वर्षों तक सत्ता-सुख भोगता रहा विपक्ष
पांच वर्ष पहले १६वें पर्व के दौरान सत्ता गंवा चुके होने के बाद अब इस
बार उसे किसी भी तरह हासिल कर लेने के बावत आसमान सिर पर उठा लिया है ।
युद्ध का आकार-प्रकार बदला हुआ है ; मल्ल-युद्ध अब वाक-युद्ध का रुप ले
चुका है, तो जाहिर है योद्धाओं और महारथियों के नाम , वाण व संधान भी
बदले हुए हैं । इस कलयुगी महाभारत के सत्ता-पक्ष में धर्म खडा है, तो
प्रतिपक्ष में अधर्म अडा है , जिसका पाखण्ड सिर चढ कर बोल रहा है । आलम
यह है कि प्रतिपक्षियों का नेता यज्ञोपवित , कण्ठीमाला व तिलक धारण कर
मंदिर-मंदिर घुमता फिर रहा है और धूंआधार शब्दवाण मारते जा रहा है, तो
उसके दल की महासचिव सत्ता-पक्ष के नायक नरेन्द्र मोदी को ‘दुर्योद्धन’ कह
कर भ्रम फैलाने की चेष्टा कर रही है । दांव-पेंच व चाल वही के वही हैं ।
कूट्नीति से ले कर फूट नीति तक हर प्रकार की नीति- अनीति को अख्तियार
किया जा रहा है ; किन्तु संग्राम के असली नियन्ता- कृष्ण वासुदेव मधुसूदन
दूर कहीं नेपथ्य में हास-परिहास कर रहे हैं, जिनकी प्रेरणा से अब चूंकि
प्रियंका वाड्रा ने नरेन्द्र मोदी को दुर्योद्धन कह ही दिया है, तो जाहिर
है इस ‘इण्डियन भारत’ में ‘आर्यन महाभारत’ का वह प्रसंग समुपस्थित हो गया
है , जिसमें नैतिकता की दुहाई दी जा रही थी । जी हां, नैतिकता की दुहाई !
भीम और दुर्योधन के बीच भीषण मल्लयुद्ध चल रहा था, जिसमें कोई
पक्ष थक नहीं रहा था ।
चूँकि दुर्योधन का पूरा शरीर गांधारी के वरदान से बज्र का बन चुका था-
जंघा छोड कर ; इस कारण भीम के भीषण प्रहारों के बावजूद वह हार ही नहीं
रहा था । तब श्रीकृष्ण वासुदेव ने भीम से कहा- दुर्योधन की जंघा पर
प्रहार करो ! श्रीकृष्ण के इस वचन को सुनकर दुर्योधन जोर से चिल्लाया-
मधुसूदन ! आप यह क्या कह रहे हैं ? मल्ल-युद्ध में कमर के नीचे प्रहार
करना युद्ध-नीति के विरुद्ध अनैतिक है , नैतिकता के प्रतिकूल है । तब
श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोल उठे- वाह ! दुर्योधन , वाह ! युद्ध-नीति और
नैतिकता की दुहाई आज दे रहे हो, जब संकट से घिर चुके हो । याद करो, जब
एक निहत्थे बालक अभिमन्यु पर तुम्हारे आठ-आठ महारथी एक साथ शस्त्रों से
प्रहार कर रहे थे, तब कहां गई थी युद्ध-नीति व नैतिकता ?
बीच सभा मे तुम्हारे आदेश पर जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था, तब कहाँ
थी नैतिकता ? तुम तो युद्ध के पहले से ही अनैतिकता के रथ पर सवार हो,
अतएव हे अनैतिक पुरुष, तुम्हारे मुख से अब नैतिकता की बात शोभा नही देती

शास्त्रों का कथन है कि क्षमा का अधिकारी वही है, जो क्षमा के योग्य हो और
नैतिकता उसी के साथ बरती जानी चाहिए, जो स्वयं नीतिवान हो । इतना कहते
हुए वासुदेव ने
भीम को ललकारा- उठाओ गदा और दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करो, ऐसा करना
धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म-संगत है ! फिर तो आप जानते ही हैं कि
दुर्योद्धन का अन्त ऐसे ही हुआ- जंघा पर भीम की गदा के प्रहार से ।
अब आज के इस लोकतंत्री महाभारत में अनैतिकता के पथ पर सवार
कांग्रेस के नेता-प्रवक्ता जब अपने राजीव गांधी को दिवंगत बता कर उन्हें
नरेन्द्र मोदी द्वारा भ्रष्टाचारी कहे जाने को ‘अनैतिक’ बता रहे हैं और
प्रियंका वाड्रा मोदीजी को दुर्योद्धन कह रही हैं, तब इस चुनावी समर का
परोक्ष सूत्र-संचालन कर रहे मधुसूदन उनसे भी वही प्रश्न पूछते प्रतीत हो
रहे हैं । कांग्रेस के नेता, प्रवक्ता व प्रियंका वाड्रा सभी मिल कर यह
याद करें और बताएं कि अटल बिहारी वाजपेयी जी भी तो दिवंगत हैं, किंतु
कुछ दिनों पूर्व आप सबने आतंकी मसूद को उंगली पकड कर छोडने का जो आरोप
लगाया था उन पर , सो कितना नैतिक था ?, जबकि उन्हें वैसा करने के लिए तब
आप लोगों ने ही विवश किया हुआ था । आपकी सहमति से मसूद को कन्धार
छोडवाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी पर उनके दिवंगत हो जाने के
बाद आप के द्वारा आतंकी को छोडने का आरोप लगाना नैतिकता का मापदण्ड है
क्या ? भारत की स्वतंत्रता के आन्दोलन में वीर सावरकर के तप-त्याग-बलिदान
और उनकी वजह से प्रसिद्ध हुए अण्डमान को सारी दुनिया जानती है । किन्तु
उस ऐतिहासिक अण्डमान जेल से उस दिवंगत नेता की तस्वीर हटाने का जो काम
आपकी सरकार ने किया था सो नैतिक था क्या ? तब कहां और क्यों सो गई थी आप
सब की नैतिकता ? गोपाल-गिरधर सब जानते हैं , फिर भी आप से पुछते हैं कि
हजारों सिक्खों का कत्लेआम भी कराने वाले भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव
गांधी को तथ्यों के आधार पर भ्रष्टाचारी कहने की प्रतिक्रिया में उनके
दिवंगत होने का रोना रोते हुए नैतिकता की दुहाई देने वाले कांग्रेसी
महारथियों ! वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिना किसी आरोप के
निराधार ही ‘चौकीदार चोर है’ कहते फिरना अनैतिक नहीं है क्या ?
और , उस ‘चित्तचोर’ की माया से अब तो पूरा देश यह जान चुका है कि
अपनी पराजय को सामने खडा देख नैतिकता की दुहाई दुर्योद्धन ही देता रहा है
प्रियंका ! इसलिए यह बताने की जरुरत नहीं है कि दुर्योद्धन कौन है ? !
बावजूद इसके, घोर अनैतिकता के रथ पर सवार कांग्रेस की महासचिव, जो कायदे
से भारत को भी नहीं जानती तो महाभारत क्या जानेगी, उनके द्वारा नरेन्द्र
मोदी को दुर्योधन कहा जा रहा है , तो यह वासुदेव की लीला ही है कि बैताल
स्वयं बोल कर बता रहा है कि वह कौन है , कहां है और सामने वाले को अब
क्या करना चाहिए । वैसे इस कांग्रेस को माता गान्धारी से ‘बज्र देह’ का
वरदान तो प्राप्त नहीं ही है, जबकि ब्रिटिश महारानी की जयकार करते हुए
पोषित-पुष्पित व फलित होने के कारण इसकी काया में कई ऐसे ‘कुबड’ जरूर
उभरे हुए हैं, जिन पर प्रहार करना लोकतंत्र के राजनीतिक वाकयुद्ध की
नीति के अनुकूल शास्त्र-सम्मत भी है । अतएव, अब राजीव गांधी का ही नहीं,
बल्कि दिवंगत प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के उन महान ‘आपात कारनामों’ से
भी इस देश के नवमतदाताओं को अवगत कराना जरुरी है, जिनकी वजह से दुनिया का
सबसे बडा लोकतंत्र जख्मी हो गया था । और, ऐसा करने से संविधान व लोकतंत्र
की रक्षा का दम्भ भरने वाले जब फिर तिलमिलाने लगें तो उन्हें हाथों-हाथ
‘चाचाजी’ के चमकीले चमत्कारों की कलई भी खोल कर दिखा देनी चाहिए ।
• मनोज ज्वाला ; मई’ २०१९
• दूरभाष- ६२०४००६८९७

1 thought on “‘इण्डियन भारत’ के ‘महाभारत’ का दुर्योद्धन-प्रसंग

  1. इस चुनाव में जिस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल किया गया है ऐसा कभी नहीं हुआ , प्रियंका ने तो महाभारत नहीं ही पढ़ा , कांग्रेस के अन्य नेताओं को भी इसका ज्ञान नहीं है , वैसे भी ये लोग लिखे भाषण पढ़ने के आदी हैं , वह भी अंग्रेजी रोमन में , इन सब का कारण इनकी शिक्षा व संस्कार हैं १९९५ ँ न सोनिया ने मोदी को जिस प्रकार नरसंहारक व् अन्य क्या क्या सम्बोधन से पुकार कर इसकी शुरुआत की थी , उसे भी ये पता नहीं था कि वह जो बोल रही है उसका क्या आशय है
    बहुत ही घटिया स्तर इस चुनाव में नेताओं से सुनने को मिला और अब तो शर्म ही आने लगी है कि हम किस देश के नागरिक हैं , उच्च संस्कृति कागुण गान करने वाले देश के लोग , नेता कितने गिरे हुए हैं

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