लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

देश के महानगरों में नई मेट्रो रेल लाइन बिछाने व चलाने की जबावदेही केंद्र सरकार ने नीति बनाकर निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित कर दी है। लिहाजा अब यदि कोई राज्य सरकार अपने प्रदेश के नगर में मेट्रो रेल की परियोजना शुरू करना चाहती है तो उसे हर हाल में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) माॅडल अपनाना होगा। प्रदेशों को अधिकार होगा कि वे किराया निर्धारण और उसके मूल्यांकन के लिए एक स्थायी दर निर्धारण प्राधिकरण स्वतंत्र रूप से बना लें। नई नीति के तहत मेट्रो रेल परियोजनाओं को तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले में केंद्र सरकार कुल खर्च की 10 प्रतिशत राशि परियोजना को देगी। दूसरे में केंद्र और राज्य मिलकर 50-50 फीसदी धन राशि खर्च करेंगे। तीसरे प्रकार की परियोजनाओं में केंद्र की आर्थिक मदद वाले पीपीपी माॅडल परियोजना का अमल करेंगे। लेकिन इन तीनों तरह की परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी अनिवार्य होगी। इस नीति ने तय कर दिया है कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे भारतीय रेल का निजीकरण करने पर आमादा है।

भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। गोया इसकी सरंचना को विश्वस्तरीय बनाने की द्रष्टि से कोशिषें तेज जरूर हो गई हैं। सुविधा संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियादी शुरूआत भी हो गई है। स्पेन की मदद से टेल्गो रेल भी चलाए जाने की तैयारी है। अब नई चुनौतियों के रूप में रेल यात्रा को आधिकारिक रूप से सुविधाजनक, सुरक्षित व यात्री फ्रेंडली बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इन सब में सरकार की कोशिश है कि वह निजी पूँजी निवेश जरिए इन्हें अमल में लाए।

इसी नजरिए से रेलवे के विकास से जुड़ी ‘एक्सिस कैपिटल की ताजा अध्ययन रिपोर्ट‘ आई है। ‘रेलवे 360 डिग्रीः एक्चुअली व्हाइट हैपेन‘ नामक इस अध्ययन रिपोर्ट में रेलवे का 2030 तक का रोडमैप तैयार किया गया है। इसके मुताबिक रेलवे को अब पहले की तरह चलाना संभव नहीं रह गया है। अब इसे नई चुनौतियों के अनुरूप ढालना होगा। इसके तहत रेलों की चाल बढ़ाना, रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण करना और यात्री सुविधाओं में जबरदस्त इजाफा करना शामिल है। चूंकि 2018-19 से 70 फीसदी मालगाड़ियां अलग से बनाए जा रहे ट्रेक पर चलने लग जाएंगी, जिसकी प्रबंधन की जबावदेही रेलवे की ही सहायक संस्था डीएफसीसीएल को सौंप दी जाएगी। मालगाड़ियों से होने वाली कमाई भी इसी संस्था के खाते में जमा होगी। ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है, जिससे माल और यात्रीगाड़ियों से होने वाले लाभ-हानि को अलग-अलग करके दर्शाया जा सके। साफ है, लेखे-जोखे की इस प्रक्रिया से यात्री गाड़ियां घाटे का सौदा दिखने लग जाएंगी और रेलवे को इस घाटे की भरपाई के लिए हर साल यात्री किराए में वृद्धि का बहाना मिल जाएगा। साथ ही मेट्रो समेत नई रेल परियोजनाओं में निजी पूँजी निवेश का वातावरण बन जाएगा। नई मेट्रो नीति इसी मंशा की पर्याय है।

हालांकि इस नीति के बनने के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया है। मेट्रोमैन ई श्रीधरण का कहना है कि मेट्रो में पीपीपी माॅडल दुनिया में कहीं भी सफल नहीं हुआ है। कोई भी निजी कंपनी इसमें धन लगाना नहीं चाहेगी, क्योंकि इसमें लाभ की गुंजाइश न्यूनतम है। दरअसल निजी कंपनियां अपने निवेश पर 12 से लेकर 15 फीसदी तक का मुनाफा चाहती हैं। जबकि आज तक दुनिया में किसी भी मेट्रो परियोजना से 2 से 3 प्रतिशत लाभ ही संभव हुआ है।  साथ ही प्रशानिक व्यवस्था में पर्याप्त दखल और नौकरियों की भर्ती अपनी इच्छानुसार करना चाहती हैं। इसमें वे आरक्षण सुविधा की भी विरोधी हैं। इस नीति को लागू करने का नुकसान यह होगा कि जो राज्य सरकारें अपने स्तर पर प्रदेश के नगरों में मेट्रो परियोजनाएं लागू कर रही थीं, उसमें यह नीति बाधा बनेगी। लखनऊ, जयपुर और मुंबई में राज्य सरकारों ने अपने बूते ही मेट्रो रेलें शुरू की हैं।

केंद्र सरकार ने यह नीति शायद इसलिए बनाई है, जिससे उसका सिरदर्द कम हो। दरअसल दिल्ली में मेट्रो की सफलता के बाद यह मान लिया गया है कि शहर की परिवहन व्यवस्था का इससे अच्छा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरे यह जनता को सम्मोहित करने का भी माध्यम बन गई है। इसलिए राज्य का हर मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों ने इसे मतदाताओं को रिझाने का झुनझुना समझ लिया है। इसलिए वे मेट्रो को चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल करने लगे हैं। कई राज्यों ने आनन-फानन में मेट्रो परियोजनाओं की बुनियाद भी महानगरों रख दी है। कई शहरों में इसकी मांग पुरजोरी से उठ रही है। भाजपा शाशित राज्यों की सरकारें केंद्र से धनराशि की मांग भी कर रही हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने इन दबावों से छुटकारा पाने की द्रष्टि से ऐसी नीति बना दी, जिसको अमल में लाना मुश्किल होगा। उद्योगपतियों को पटाने के लिए राज्यों को लाल जाजम बिछाने होंगे। बाबजूद जरूरी नहीं कि उद्योगपति मेट्रो जैसी महंगी, खर्चीली और जटिल परियोजनाओं में पूँजी निवेश करें। साफ है कि न नौ मन तेल होगा और न ही राधा नाचेगी। इसलिए अच्छा है, प्रदेश सरकारें मेट्रो के मोह से मुक्त हो और ग्रामीण विकास की ओर ध्यान दें, जिससे शहरों में आबादी का दबाव कम हो। वैसे भी जिस दिल्ली मेट्रो को एक आदर्श उदाहरण मानकर चल रहे हैं, वह मेट्रो उद्योग की द्रष्टि से ज्यादा लाभ का सौदा नहीं है। लेकिन दिल्ली जैसा महानगर जो कई प्रदेशों की सीमाओं से जुड़ा होने के कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी है, उसमें मेट्रो जैसी एक बड़ी परिवहन सुविधा जरूरी है। लेकिन दूसरी और तीसरी श्रेणी के नगरों में अरबों रुपए खर्च करके इस परियोजना को लागू करना शेखचिल्ली के सपने के तरह है। इससे अच्छा है प्रदेश सरकारें अपने नगर के अनुरूप मौजूदा परिवहन तंत्र को ही दुरुस्त कर उसका आधुनिकीकरण करें।

सरकार ने रेलवे में एकमुश्त निजीकरण करने की बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला शुरू कर दिया है। जलपान, स्वच्छता, माल ढुलाई, निजी कोच खरीद जैसे 17 क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी जा चुकी है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव, लाॅजिस्टिक पार्क निर्माण, लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर द्रुत गति की प्रीमीयम, टेल्गो व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशी पूंजी निवेश और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। कालांतर में इसके परिणाम अच्छे दिखाई दे सकते हैं। इसी दिशा में अगली कड़ी के तहत राज्यों के सहयोग से रेल परियोजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कैबीनेट ने इस फैसले को मंजूरी पहले ही दे दी है। इस योजना के अनुसार प्रत्येक संयुक्त उद्यम में रेलवे और राज्य सरकार की ओर से 50-50 करोड़ रुपए की आरंभिक चुकता पूंजी का योगदान किया जाएगा। इस हिसाब से कुल 100 करोड़ का निवेश होगा। इस द्रष्टि से सीमेंट, स्टील व ऊर्जा संयंत्रों के लिए कच्चे माल की ढुलाई के मकसद से रेल संपर्क बनाने में मदद मिलेगी। देश के सुदुर अचंलों में यात्री सेवाओं का विस्तार भी संभव हो सकेगा। लेकिन हाल ही में आई कैग की रिपोर्ट में जताया गया है कि रेलों में बेहद घटिया दर्जे का खाना दिया जा रहा है और सफाई भी उचित नहीं है। जब हम भोजन और सफाई को निजी हाथों में सौंपकर बीते तीन सालों के भीतर गुणवत्तापूर्ण नहीं बना पाए हैं तो मेट्रो जैसी जटिल परियोजनाओं को कैसे जमीन पर उतार पाएंगे ? यह एक बड़ा सवाल है।

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