भारतीय क्षात्र धर्म और अहिंसा – अध्याय -2

वैदिक राष्ट्र और अहिंसा

यजुर्वेद में एक सुन्दर ऋचा आयी है :–

ओ३म आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम आ राष्ट्रे राजन्य: शूरऽइषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशु: सप्ति: पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठा: सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नऽओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम्।। -यजु० २२/२२

अर्थात हे सर्वाधार सर्वेश्वर सर्वव्यापक प्रभो ! हमारे राष्ट्र में ब्राह्मण सब ओर वा सब प्रकार से ब्रह्म तेज से युक्त , ज्ञान दीप्ति से प्रदीप्त तप:पुंज हों । बाण विद्या तथा शस्त्रास्त्र प्रयोग में सुनिपुण स्वयं निष्कम्प होकर शत्रुओं को अत्यंत विचलित करने वाला महारथी हो। इस यजमान की धेनु गौ दूध देने वाली , बैल भार उठाने में समर्थ हो , घोड़ा शीघ्रगामी हो , स्त्री अत्यन्त बुद्धिमती अथवा नगर नेत्री हो । रथी जयशील हो और जवान , वीर और सभा में बैठने योग्य हो । हमारे अभिलषित समय पर बादल बरसें । हमारी औषधियां फल वाली पके और हमारा योगक्षेम ठीक रहे।”

शब्दार्थ- ब्रह्मन्!= हे सब से महान् ! बड़ों से भी बड़े ! राष्ट्रे= नियम, व्यवस्था में चलने वाले देश में ब्राह्मण= बुद्धिजीवी, योजनाओं को सोचने वाले ब्रह्मवर्चसी= ब्रह्म तेज युक्त, अपने ज्ञान के अनुकूल जीने वाले, अपने ज्ञान को सार्थक करने में समर्थ, साक्षर [स+अक्षर] अक्षर= ज्ञान के अनुरूप आ जायताम्= शोभायमान हों। ऐसे ही राजन्य:= राज-काज का कार्य करने वाले शूर:= आगे बढ़ कर कार्यकर्ता, निर्भय, साहसी, बिना डरे निर्णय लेने वाले इषव्य:= निशानची रक्षा की व्यवस्था के लिए अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में कुशल अतिव्याधी= हर प्रकार के रोगों से दूर अर्थात् पूर्णतः स्वस्थ महारथ:= अच्छे से अच्छे वाहनों से युक्त आ जायताम्= [इन गुणों से] अच्छी प्रकार से युक्त हों। धेनु:= दूध देने वाले पशु दोग्ध्री:= अच्छा दोहन करें, अच्छी मात्रा में दूध दें या वाले हों। अनड्वान= भार ढोने वाले [पशु, बैल] वोढा= भार वाहन के कार्य में सफल हों। सप्ति:= यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाले वाहन आशु:= शीघ्र गति से चलने वाले हों। योषा= नारी, देश की महिलायें पुरन्धि= पुरं [अपने] शरीर, परिवार, नगर को धि:= संभालने में समर्थ हों। अस्य= इस यजमानस्य= राष्ट्र यज्ञ के कर्ता-धर्ता के युवा= जवान, पुत्र, नागरिक जिष्णु:= जय की, सफलता की भावना से भरे हुए रथेष्ठा:= रथ, वाहन युक्त, उसके चलाने में सक्षम सभेय:= सभा के योग्य अर्थात् सामाजिक जीवन में उठने-बैठने, रहने-सहने, बोलने-वर्तने में सफल, सिद्ध और वीर:= दुष्टता को हटाने वाले, अपनेपन में अडिग, सत्य पर अटल जायताम्= [इन गुणों से भरे हुए] हों। हम राष्ट्रवासी कामे-कामे= जब-जब, जहां-जहां चाहें वहां-वहां इच्छानुसार न:= हमारी पर्जन्य:= जल व्यवस्था [का कर्ता बादल] निनि वर्षतु= निश्चित रूप से पहुंचे, सफल हो, वर्षा बरसे। जिससे न:= हमारी ओषधय:= गेहूं, चना ,धान, जौ, तिल, सौंफ आदि अन्न फलवत्य:= पकें फलें जिससे न:= हम सब देशवासियों के लिए योग= अप्राप्त की प्राप्ति, क्षेम= प्राप्त का संरक्षण। रूपी अर्थशास्त्र के सिद्धांत। कल्पन्ताम्= सार्थक हों, पूर्ण हों, चरितार्थ हों। अर्थात् हमारा राष्ट्र भौतिक और नैतिक प्रगति से भरपूर हो।
वेद के इस मंत्र में राष्ट्र के आवश्यक तत्वों में से एक आवश्यक तत्व ‘क्षत्रिय जमहारथी’ का होना माना गया है। ऐसा महारथी जो स्वयं निष्कम्प होकर शत्रुओं को अत्यन्त विचलित करने में समर्थ हो और सभी शस्त्रास्त्रों को चलाने में निपुण हो ।
वेद के पावन ज्ञान में जब पाठक रुचि लेता है तो सामाजिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में वेद कितना सुविचारित ढंग से कहता व सोचता है ? – यह स्पष्ट होता चला जाता है । उपरोक्त वेद मंत्र से स्पष्ट है कि वेद को हमारी राष्ट्रीय सीमाओं और राज्य – व्यवस्था में होने वाले नित्य प्रति के उपद्रवों एवं विप्लवों की सृष्टि के प्रारम्भ में ही जानकारी थी । तभी तो वह राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा और राज्य में शान्ति – व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्षत्रिय महारथियों का होना राष्ट्र के लिए एक आवश्यक तत्व मानता है ।
बलराज मधोक यजुर्वेद के उपरोक्त सूक्त की व्याख्या में राष्ट्र के लक्षणों की ओर इंगित करते हुए विद्वत्तापूर्ण शैली में लिखते हैं :- ” वह जनसमूह जो एक सुनिश्चित भूखंड में रहता है , संसार में व्याप्त और इसके चलाने वाले परमात्मा और प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकार करता है , जो बुद्धि को प्राथमिकता देता है और विद्वान जनों का आदर करता है और जिसके पास अपने देश की बाहरी आक्रमण और आन्तरिक प्राकृतिक आपदाओं से बचाने और सभी के योगक्षेम की क्षमता हो , वह एक राष्ट्र है।”

शास्त्र और शस्त्र का उचित समन्वय

सचमुच राष्ट्र की यह एक बहुत ही उत्तम परिभाषा है। किसी भी सभ्य समाज अथवा राष्ट्र के सञ्चालन हेतु समाज में ब्राह्मण वर्ग का अर्थात ज्ञान -विज्ञान में निष्णात वैज्ञानिकों का होना परमावश्यक है। जनसाधारण को धर्म और नीति का पाठ पढ़ाकर समाज में एकत्व को स्थापित करना ब्राह्मण वर्ग का कार्य है । दूसरे शब्दों में शास्त्र चर्चा द्वारा मानवीय नैतिक मूल्यों की स्थापना ब्राह्मण वर्ग का प्रमुख कार्य है । किन्तु इस शास्त्र चर्चा के लिए शस्त्र चर्चा भी उतनी ही आवश्यक है । इसलिए ब्राह्मण के साथ – साथ ही शस्त्रधारी छत्रिय महारथियों का होना भी वेद ने आवश्यक माना है ।
इसके अतिरिक्त लोगों का आचरण किस प्रकार समाज , राष्ट्र और विश्व की शान्ति में सहायक सिद्ध हो सकता है ? व्यक्ति किस प्रकार शान्तिपूर्ण उपायों से सामाजिक , शारीरिक एवं आत्मिक उन्नति कर सकता है ? – उसका शेष मानव समाज से और सृष्टि में सभी प्राणधारियों से किस प्रकार का सामंजस्य तथा सहयोग पर आधारित सम्बन्ध हो ? – यह सब बताना भी पण्डित वर्ग का ही कार्य है। पण्डित वर्ग यदि अपने कार्यों में आलस्य , प्रमाद और उपेक्षाभाव बरतता है तो ऐसा समाज और राष्ट्र पतन के रास्ते पर चले जाते हैं । जैसा कि स्वयं हमारे राष्ट्र के साथ अतीत में महाभारत के युद्ध के पश्चात हुआ भी । इस युद्ध के पश्चात पण्डित वर्ग ने अपने दायित्वों के निर्वाह में आलस्य , प्रमाद का सहारा लिया । फलस्वरूप भारतीय समाज और राष्ट्र पाखण्डवाद और अन्धविश्वासों की दलदल में जा फंसा । अतः कोई भी सभ्य समाज उन्नति तब ही कर सकता है , जबकि उसके पास ब्रह्मतेजो युक्त, ज्ञानदीप्ति से प्रदीप्त तप:पुंज ब्राह्मण वर्ग हो । इसीलिए वेद राष्ट्र सञ्चालन के लिए सर्वप्रथम ऐसे ही पण्डितों को राष्ट्र का आवश्यक अंग स्वीकार करते हुए उनके होने की कामना करता है , जो कि एक निश्चित भूमि खण्ड में रहने वाले जनसमूह की चेतना को जागृत किये रखने एवं उसका विकास और उन्नति का पथ प्रदर्शित करने के लिए अपने पास क्षमता और सामर्थ्य रखता हो।

हमारा उद्घोष था – ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’

अब प्राचीन काल में रहे भारतीय शासकों ने उन क्षत्रियों के आदर्श वाक्य ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ अर्थात सारे विश्व को आर्य करो पर इसी मन्त्र के प्रसंग में चर्चा कर लेना भी उचित होगा। वैदिक राष्ट्र में अहिंसा की नीति का पालन करते हुए अर्थात सभी के कल्याण और परित्राण की कामना करते हुए हमारे महान पूर्वज समग्र संसार को अपनी सर्व मंगलकारी और चहुँमुखी उन्नति और नीतियों के द्वारा श्रेष्ठ बनाना चाहते थे । यह पुनीत कार्य हमारे पण्डितों और क्षत्रियों के सहयोग और पारस्परिक सखाभाव से ही सम्भव था । संक्षेप में कहें तो यह आदर्श वाक्य शास्त्र और शस्त्र अर्थात उपदेश और आदेश की एक दूसरे की पूरक नीति पर ही अवलम्बित था। जिसके आधार पर हम संसार में मानव जाति को मानवता का उत्कृष्ट पाठ पढ़ाने के लिए विश्व के चारों कोनों में जाते थे । यह महान आदर्श और पुनीत दायित्व यद्यपि पण्डित वर्ग का ही कार्य था , किन्तु यह पूर्ण तभी हो सकता था जब राष्ट्र में सुनिपुण स्वयं निष्कम्प होकर शत्रुओं को अत्यन्त विचलित करने वाले महारथी होते। इसीलिए हमारे यहाँ यह व्यवस्था थी कि :–

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु:.
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ..’

आगे चारों वेदों का ज्ञान हो और पीठ पर तरकश में भरे बाण सहित धनुष हो, अर्थात ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों के गुणों से युक्त हो जो शाप भी दे सके और दंड भी ।”

वीर महारथियों का होना आवश्यक क्यों ?

जो समझाने से भी और शान्तिपूर्ण उपायों से भी ठीक रास्ते पर नहीं आता , उसके लिए शर सन्धान आवश्यक है । इसी मन्त्र और इसी शस्त्र और शास्त्र की सम्पूरक नीति ने हमारे वैदिक राष्ट्र में धर्म और राजनीति को एक दूसरे का पूरक होना या इसी नीति के अन्तर्गत हमारे पंडित वर्ग ने राजनीति की आचार संहिता में राजनीतिक नेतृत्व के लिए और अहिंसा की रक्षा के लिए साम , दाम , दण्ड और भेद की नीति निर्मित की ।
यह नीति भी वैदिक राष्ट्र में शस्त्र और शास्त्र की नीति को ही प्रतिध्वनित करती है । जिसमें से प्रथम दो नीति साम और दाम शास्त्र की और दण्ड व भेद शस्त्र की परिचायक हैं । भारतीय राष्ट्र में जब तक वेद का दिव्य – दिवाकर अपना आलोक उत्कीर्ण करता रहा, तब तक हम उक्त नीतियों के आधार पर चलते हुए विश्व समुदाय को नेतृत्व प्रदान करते रहे । इन नीतियों के अन्तर्गत ही अहिंसा बनी रह सकती है। क्योंकि हिंसक व्यक्ति का अस्तित्व समाज में और भी अशान्ति और अस्थिरता उत्पन्न करता है । उसका शर सन्धान समाज में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना में सहायक सिद्ध होता है । यही कारण है कि वैदिक राष्ट्र में अहिंसा की स्थापनार्थ महारथियों का होना आवश्यक माना गया है ।
जिस संस्कृति में ”सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया”- की लोक मंगलकारी और सर्व सुखकारी कामना उसका प्राण बनकर वास करती हो , जिसमें सदैव सुख और शिव की कामना की जाती है , उसमें युद्ध जैसी विनाशकारी वस्तु के लिए महारथियों का होना क्यों माना गया ? यह प्रश्न उत्तर बनकर अभी तक हमारे विश्लेषण से सुबुध्द पाठकों के अन्तर्मन में उतर गया होगा । किन्तु एक शंका निम्नलिखित वेद मंत्र से हो सकती है कि वेद वैदिक राष्ट्र में युद्ध और शांती की बातें एक साथ ही क्यों करता है ?

वेद का शांती पाठ

निम्नलिखित मन्त्र में हम सर्वत्र शांति का वास देख रहे हैं तो उसी शान्ति को अपने लिए भी उस सर्वनियंता सर्वाधार और सर्वेश्वर से वर रूप में मांगते हैं :-

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥ ( यजुर्वेद 36 / 17 )

अर्थात द्युलोक शान्तियुक्त अर्थात शांत है , अन्तरिक्ष लोक शान्त है , पृथ्वी शान्ति युक्त है , जल शान्ति युक्त है, सब दिव्य पदार्थ शान्ति युक्त हैं । वेद विद्या शान्ति युक्त है ,सब कुछ शान्ति युक्त है । शान्ति की भावना स्वयं शान्ति युक्त है । यह सब चीजें शान्तियुक्त हैं । यही शान्ति जो इन सब को ठीक रख रही है , मुझे भी प्राप्त हो ।”
जब सर्वत्र शान्ति का ही वास है तो फिर युद्ध की अशान्तिदायिनी स्थिति के लिए महारथी होने की प्रार्थना क्यों की गई ? राष्ट्रकवि दिनकर ने कितना सुंदर लिखा है :–
जहाँ शस्त्र बल नहीं शास्त्र
वहां रोते हैं या पछताते हैं ।
ऋषियों को भी सिद्धि तप से तभी मिलती है ,
जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े हो जाते हैं ।।

उपरोक्त पंक्तियों से हमारे उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मिल जाता है कि वेद सर्वत्र शान्ति की स्थापना और शास्त्रों की रक्षार्थ एक सुसज्जित और संगठित सेना के संगठन पर बल क्यों देता है ? वेद मानवतावादी हैं । अहिंसा प्रेमी हैं । हम जिस वैदिक राष्ट्र की बातें कर रहे हैं , उसमें इन दोनों तत्वों का होना अति आवश्यक है । वेद में मानवतावाद की स्थिति यह है कि वेद हमसे स्पष्ट शब्दों में कहता है :–

“मनुर्भवः जनया दैव्यम जनम ।”

अर्थात ‘मनुष्य बन और देवों के हितकारी जन को अर्थात सन्तान को उत्पन्न कर ।’ वेद वह कामधेनु है जो मीठे दूध के अतिरिक्त और कुछ देती ही नहीं । इसके मीठे दूध को पीकर हृदय की आध्यात्मिक भूख तो शान्त होती ही है , साथ ही समाज की , राष्ट्र की और संसार की पैशाचिक एवं अमानवीय दुष्ट प्रवृत्तियों का निराकरण भी उपलब्ध हो जाता है । सचमुच में यदि देखा जाए तो वेद का उपरोक्त उपदेश उसे सभी मजहबी पुस्तकों से उत्कृष्टतम सिद्ध करने के लिए अकेला ही पर्याप्त है ।

श्री राम को हथियार उठाने ही पड़ेंगे

वेद सम्पूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानकर प्राणिमात्र के प्रति दया और करुणा का भाव अपनाता है । यदि वेद की आदर्श व्यवस्था को ज्यों का त्यों समग्र संसार स्वीकार कर आत्मसात कर ले और वैदिक धर्माचरण को स्व:आचरण का अंग बना ले तो चारों ओर शान्ति व्यवस्था , उन्नति और विकास का साम्राज्य स्थापित होकर हर व्यक्ति को आत्मिक विकास एवं आत्मोन्नति का भरपूर अवसर सुलभ हो सकेगा । तब हर प्राणी निष्कण्टक होकर अपने जीवन को जीयेगा । किसी को भी किसी से भी किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं रहेगा । सर्वत्र मनसा, वाचा ,कर्मणा अहिंसा का ही बोलबाला होगा । यह धरती का स्वर्ग होगा । जिसमें अनैतिक कुछ भी नहीं होगा किन्तु जैसा कि अहिंसा शब्द से ही स्पष्ट है, इसमें मूल शब्द हिंसा है , जिसमें ‘अ’ अक्षर जोड़ने से अहिंसा शब्द बनता है । इससे स्पष्ट है कि जहाँ पूर्ण शान्ति और व्यवस्था हो अर्थात अहिंसावाद का बोलबाला हो ,वहाँ हिंसा का अस्तित्व भी अवश्यम्भावी है । इसीलिए हिंसा के समूल विनाश और अहिंसा की स्थापना हेतु वेद हमको नर से नारायण बनाकर उस आदर्श स्थिति में जीने के लिए प्रेरित करता है, जिसमें शस्त्र और शास्त्र दोनों साथ – साथ हो।
जीवन का कटु सत्य है कि समाज और राष्ट्र में जहाँ अच्छाई होती है, वहाँ बुराई भी अवश्य होती है । बुराई अच्छाई को परास्त कर अपने साम्राज्य की स्थापना हेतु हर युग में प्रयासरत रही है । इन दोनों के युद्ध में अच्छाई के प्रतीक श्रीराम ही अन्त में विजयी होते हैं , परन्तु बुराई के रूप में रावण का अस्तित्व भी उनके साथ हर युग में बना रहा है । यदि इस रावण का अर्थात बुराई और अत्याचार का राष्ट्र से सदा – सदा के लिए विनाश करना है तो श्रीराम को हथियार उठाने ही पड़ेंगे ।राष्ट्र को अहिंसा के पथ पर आरूढ़ करने के लिए श्रीराम को सुसज्जित सेना का आश्रय लेना ही पड़ेगा । इसीलिए वेद वैदिक राष्ट्र के सुमंगल के लिए क्षत्रिय महारथियों के होने को उचित और आवश्यक मानता है ।

देवासुर संग्राम

हमारे नीति शास्त्रों में देवताओं और दैत्यों अर्थात देवासुर संग्राम की जो घटना पग-पग पर आती है , उसका निहित अर्थ भी हमको यही आदेश और सन्देश देता है कि हमको किसी भी परिस्थिति में दैत्यों अर्थात दुष्ट प्रवृत्ति के पापाचारी और अनाचारी लोगों के समक्ष घुटने नहीं टेकने हैं । ऐसे सज्जन प्रवृत्ति वाले लोगों की वह अदृश्य सत्ता आश्रय और संरक्षक होती है । इसीलिए जीत सदा उन्हीं की होती है।
किन्तु इन देव पुरुषों को भी राष्ट्र में शान्ति की स्थापनार्थ उसी प्रकार क्षत्रियों का सहारा लेना पड़ता है जिस प्रकार महर्षि विश्वामित्र को श्रीराम और लक्ष्मण जैसे महारथियों का सहारा लेना पड़ा था। इसीलिए ऐसे देव पुरुष हर मनुष्य को नर से नारायण बनाने के अपने महान उद्देश्य को फलीभूत करने के लिए राष्ट्र में सदा ऐसे महारथियों के होने की कामना करते हैं ।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का उदाहरण

यहाँ पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम जो कि हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं और आदर्श पुरुष हैं , साथ ही बहुत ही मानवतावादी और विश्व बन्धुत्व की भावना में विश्वास रखने वाले हैं , उनके राष्ट्रप्रेम का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा।
अहिंसावादी शासक को वर्तमान में धर्मभीरू और कायर समझा जाता है । उससे आशा व अपेक्षा भी की जाती है कि यदि वह सचमुच में अहिंसावादी है तो शस्त्र प्रयोग नहीं करेगा । ऐसी आशा व अपेक्षा ही ऐसे अहिंसावादी शासक के राष्ट्रप्रेम पर भी प्रश्नचिह्न लगा देती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सर्वथा अहिंसावादी थे ,राष्ट्रवादी थे । उनके मुख से अधोलिखित शब्द किसी कवि ने उस समय कहलवाये हैं जब श्रीलंका को जीतने के पश्चात वह स्वदेश लौटने की तैयारी कर रहे हैं । (यह प्रसंग मूल रामायण में नहीं है ) श्रीराम उस समय लक्ष्मण से कहते हैं :–

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

अर्थात : ” लक्ष्मण ! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।”
हमारे लिए राम का उपरोक्त कथन आदर्श है , जो हमारे राष्ट्रीय जीवन के लिए और उन लोगों के लिए जो श्रीराम की पूजा करते हैं और उन्हें भगवान मानते हैं , किन्तु उनके अनुकरणीय गुणों को जीवन में अपनाने से दूरी बनाते हैं , के लिए प्रेरक हो सकती है। यदि हम श्रीराम को अपना आदर्श राष्ट्रपुरुष स्वीकार करते हैं और उनके जीवन से कुछ सीख लेना चाहते हैं तो फिर ऐसा नहीं हो सकता कि हमारी जननी और जन्म भूमि किसी विदेशी आततायी प्रजा- उत्पीड़क अथवा राष्ट्रद्रोही रावण के उत्पीड़न और प्रताड़ना से उत्पीड़ित हो और हम ‘ओम नमः शिवाय’ का जाप करते हुए उसके विनाश की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से करते रहें, अपितु हम क्योंकि श्रीराम और श्रीकृष्ण की सन्तानें हैं, इसलिए शस्त्रबल से उस आततायी प्रजा – उत्पीड़क शासक का समूल विनाश करना हमारा राष्ट्रीय धर्म है ।
अपने राष्ट्र के प्रति यदि हमें इन दोनों महापुरुषों से कुछ सीख लेनी है तो वह उनका वैदिक क्षत्रिय धर्म ही है । इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमने जब अपने राष्ट्रीय धर्म को पहचानने में प्रमाद का प्रदर्शन किया है और क्षत्रिय धर्म को तिलांजलि दी है, तब – तब हमारी जन्मभूमि व इस पावन राष्ट्र को कंस की जेल की सलाखों के पीछे नारकीय जीवन बिताना पड़ा है। हमने स्वर्ग प्राप्ति के लिए मन्दिरों में पूजा-पाठ को ही अपना धर्म मान लिया । इस वैदिक राष्ट्र में वेद सम्मत क्षत्रिय धर्म को पूर्णतया विस्मृत कर दिया। धर्म के वैज्ञानिक स्वरूप से हटकर हमने इसके बाह्य लक्षणों को ही धर्म मान लिया । राम नाम तो हमने खूब जपा लेकिन राम शब्द की महिमा न जान सके । राम के राष्ट्रीय स्वरूप और वीरोचित गुणों को हमने पूर्णतया उपेक्षित कर दिया । हमारे लिए स्वर्ग प्राप्ति जननी और जन्मभूमि से भी बढ़कर हो गई । हमारे वैदिक धर्म के पतन ने हमारे राष्ट्रीय धर्म को भी प्रभावित किया और उसे विकृत कर दिया।

राष्ट्रीय चरित्र में आयी दुर्बलता

फलस्वरूप हम धर्मभीरू बनते – बनते अपने राष्ट्रीय चरित्र में कई दुर्बलताओं को प्रवेश करा गये।
यद्यपि अनेकों दुर्बलताओं के चलते भी हमारी राष्ट्रीय चेतना जागृत रही । वह कहीं ना कहीं हमको विदेशियों से लड़ने के लिए प्रेरित करती रही । अतः चाहे हमारा कितना ही प्रभाव और पतन क्यों न हो गया हो , इस सब के उपरान्त भी विदेशियों से हम युद्ध करते रहे। ऐसी राष्ट्रवादी सोच और भावना विश्व इतिहास में अन्यत्र मिलनी दुर्लभ है , जैसी भारत ने अपने पराभव के उस काल में अपना कर दिखायी ।
राष्ट्रीय दायित्व के निर्वाह में हम अहिंसक बनते – बनते नपुंसक बन गए । हम यह भूल गए कि यदि हमारा भारत रहा तो हम भी जीवित रहेंगे और यदि हमारा भारतवर्ष ही नहीं रहा तो फिर हम ही कहाँ रहेंगे ? विदेशी आक्रान्ता और शासकों ने हमारे मन्दिरों को और हमारी सभ्यता व संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । यह सब अहिंसा को गलत रूप से परिभाषित करने और हमारे दृष्टिकोण में आयी कमी के कारण हुआ । जिसमें अपने ही ‘जयचंदों’ और ‘मीरजाफरों’ ने समय-समय पर अच्छी भूमिका निभाई । भारत माता पराभव की बेड़ियों में जकड़ी हुई निस्सहाय अवस्था में आ गयी । बहुत देर तक यह दुखद घटनाएं घटती रहीं और काले पृष्ठ जोड़ -जोड़ कर इतिहास बनाती रहीं ।
यद्यपि पराभव के उस काल में भी मां भारती के अनेकों ऐसे योद्धा , क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता सैनानी हुए जिन्होंने समय-समय पर भारत की चेतना का नेतृत्व करते हुए हमें न तो सोने दिया और ना ही एक राष्ट्र के रूप में हमें मरने दिया । वह हमें जगाते रहे और देश को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से बलिदानों की वेदी भी सजाए रहे।
पराभव के उस काल में वीरों के इस पुरुषार्थ का परिणाम यह हुआ कि देश में स्वतन्त्रता आन्दोलन कभी तेज तो कभी धीमा होकर निरन्तर चलता रहा । अनेकों वीर योद्धाओं , क्रान्तिकारियों और समाज सुधारकों सहित राष्ट्र प्रेमी व्यक्तित्वों ने समय-समय पर आकर माँ भारती की धर्म ध्वजा को अपने हाथों में पकड़े रखा और इसका नैरन्तर्य बनाए रखा । 1857 की क्रांति के समय ऋषि दयानन्द प्रभृति अनेकों विभूतियों ने इस आन्दोलन को और भी गति प्रदान की।

महर्षि दयानन्द का उपकार

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वराज्य की बात कही । वेद विरुद्ध चली आ रही परम्परा को जिसके अन्तर्गत मात्र व्यक्ति की आत्मोन्नति को ही सर्वोच्च माना जाता था तथा आत्मोन्नति को ही व्यक्ति जननी जन्मभूमि से ऊपर मानने लगा था , उन्होंने पलट दिया । इसके स्थान पर महर्षि दयानन्द ने सबकी उन्नति में अपनी उन्नति की समाजोन्मुखी व राष्ट्रोन्मुखी बात कही । ऋषि ने हमारे अन्तर्मन में सदियों से व्याप्त अहिंसा की अतार्किक धारणा और मान्यताओं को विनष्ट कर दिया । उन्होंने मुक्ति प्राप्ति के लिए जननी और जन्म भूमि से पराधीनता के बन्धनों को काटने को प्राथमिकता प्रदान की । क्योंकि यह एक व्यावहारिक बात है कि आप तभी शान्त और हर्षित रह सकते हैं जब आपके आसपास का मानव समुदाय शान्त और प्रसन्न हो । बहुत ही धैर्य के साथ अपने उद्योग और व्यवसाय में रत हो । यदि वह समाज अथवा मानव समुदाय किसी प्रजा उत्पीड़क शासक अथवा आततायी के अत्याचारों से आक्रान्त है तो फिर शान्ति आपको भी मिल नहीं सकती । इस व्यावहारिक सत्य को पहचान कर महर्षि दयानन्द ने भारतीयों से वेदानुकूल भाषा में स्वराज्य का आवाहन किया।
भारतवासियों ने महर्षि दयानन्द के आवाहन पर ध्यान दिया और अपने राष्ट्रीय धर्म को पहचाना तो उन्होंने ब्रिटिश शासन को अपनी जन्मभूमि अर्थात भारत भूमि से मार भगाने के लिये कमर कस ली । हम वैदिक व्यवस्था केअन्तर्गत एक महारथी की भांति खड़े हुए तो एक दिन राष्ट्र को भी स्वतन्त्र करा दिया। यह बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि जिस ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत भूमि को अपने छल – बल और युद्ध के मैदान में जीतकर अपनी कूटनीति के आधार पर अपने अधीन किया , उस भारत भूमि को आजाद कराने के उपायों के बारे में हम उस समय अत्यन्त
असावधान होकर सोचते हैं जब हम इसे मात्र अहिंसावादी आन्दोलन की जीत का सुपरिणाम सिद्ध करने का प्रयास करते हैं । जिस प्रकार की नीति के अन्तर्गत ब्रिटिश सत्ता ने हमारे देश को अपने अधीन किया था , यह स्वतन्त्र भी उसी पराक्रम , साहस , साम , दाम , दण्ड और भेद की नीति के आधार पर हुआ था।
भारत ने अपने पराभव के उस काल में संसार को यह दिखाया कि वह जहाँ मानवतावाद का पोषक है वहीं दानवतावाद का संहारक भी है । सारे विश्व ने अपनी आंखों से भारत के पौरुष और साहस को देखा और सराहा । यह अलग बात है कि भारत के इस पौरुष और साहस को विदेशी इतिहासकारों और भारत से द्वेष रखने वाले लेखकों ने इतिहास में या अन्य पुस्तकों में उचित स्थान और सम्मान नहीं दिया।
जहाँ – जहाँ हमने अपने नैतिकतावाद और मानवतावाद को अपने पौरुष और साहस के आड़े आने दिया वहीं – वहीं हमें इस पराभव के काल में पराजय का मुँह देखना पड़ा। इसके विपरीत जहाँ – जहाँ हम अपनी अहिंसा और शांति की बातों को छोड़कर देश की रक्षा के लिए शत्रु का सामना करने के लिए मैदान में जा डटे और शत्रु को उसकी ही भाषा में जवाब देने में सक्षम हुए वहीं – वहीं हमने शत्रु को उखाड़ फेंकने में सफलता प्राप्त की।

एक ही अनुभव हुआ है आदमी की जात से ।
जिन्दगी काटे नहीं कटती महज जज्बात से ।।
आह भरने से नहीं सैयाद पर होता असर ।
टूटता पाषाण है पाषाण के आघात से ।।

पाठक वृन्द ! तनिक सोचिए , जिस राष्ट्र का चिन्तन इस प्रकार का हो , जिसका क्षत्रिय धर्म इस प्रकार का हो , यदि उसके इस चिन्तन और धर्म के सच्चे प्रतिनिधियों का सम्मान सही अर्थों में न किया जाए तो उसकी अन्तरात्मा की पीड़ा कितनी असहनीय और कष्टप्रद होती होगी ? पता नहीं , हम क्यों इस व्यावहारिक सत्य से मुँह छुपाते हैं कि यह संसार बड़ा निर्दयी है । यह रोटी तक के अधिकार को केवल उसी को देता है जो अपने इस अधिकार के लिए अपेक्षित संघर्ष करता है । जो जितना अधिक असहाय होकर याचना भरी शैली में अपनी रोटी इस संसार से मांगता है , यह उतनी ही निर्दयता से उसके ऐसे अधिकार को कुचल देता है ।

संसार में हुई हैं रक्तिम क्रान्तियां

जब जब ही कहीं किसी देश में अत्याचार और उत्पीड़न बढ़ा है , शोषण और अन्याय में वृद्धि हुई है , तभी वहाँ पर शोषण , अत्याचार , अन्याय और उत्पीड़न से मुक्ति हेतु रक्तिम क्रांतियां हुई हैं । निर्धन की असहाय अवस्था , उसका मौन होकर अत्याचार को सहन करना ही तो किसी नई क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है । इससे यही सिद्ध होता है कि अहिंसावादी होकर चुपचाप यह सोचना कि संसार आपके अधिकारों का स्वयं ध्यान रखेगा , स्वयं को धोखा देना है । आज के समाज में धनी व्यक्तियों की दिन-प्रतिदिन धन सम्पदा से भरती जा रही तिजौरियां और गरीब के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करना असम्भव होता जाना , किसी अनिष्ट का सूचक है। इस वर्तमान शान्ति में भविष्य की चिंगारी छुपी है । जो निश्चय ही रक्तिम हो सकती है ।
यदि हम सचमुच में दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने में विश्वास नहीं करते हैं और स्वभाव से ही न्याय प्रिय हैं तो निर्धनों के प्रति हमारा शोषण क्यों है ? उनके प्रति उत्पीड़न और अत्याचार की नीति क्यों है ? इन शोषकों , उत्पीड़कों और अत्याचारियों के लिए ही वैदिक राष्ट्र में “शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे”- की व्यवस्था हमारे महान नीतिकारों ने की। कमी यह रही कि हमने ही इस व्यवस्था को सही अर्थों और सन्दर्भ में लागू नहीं किया । हमारी संस्कृति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमने उग्रवादी विचारधारा को थोपने के लिए बलात दूसरों के राष्ट्र को अपनी सीमाओं में मिलाने का कभी अमानवीय और पाशविक कार्य नहीं किया । ना ही हमारे किसी शासक ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए ही दूसरे राष्ट्र से युद्ध लड़ा । हम तो विश्व बन्धुत्व की भावना से ही प्रेरित होकर दूसरे देशों में शान्तिदायिनी भावना का सन्देश लेकर गए । वेद का सन्देश और आदेश भी यही है कि युद्ध शान्ति की स्थापना हेतु ही लड़ा जाए , किसी के शोषण और उत्पीड़न के लिए नहीं । युद्ध का उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश हो । युद्ध का परिणाम जनसाधारण के लिए सुख और चैन पहुंचा कर उसके विकास के और उन्नति के सभी अवसर खोलने वाला हो ।
यहाँ पर यह भी दृष्टव्य है कि वेद देवता प्रवृत्ति के लोगों को राक्षस वृत्ति के लोगों से लोहा लेने के लिए तो प्रेरित व प्रोत्साहित करता है , पर कहीं भी दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को देवताओं के विरुद्ध नहीं भड़काता। वेद कहीं भी जनसाधारण के मध्य हिंसा और वैर विरोध की बात नहीं करता । वेद तो सामाजिक समरसता में गहन आस्था रखने वाला है। वह सभी से एक साथ एक समय में और एक ही स्वर से अहिंसा की अपेक्षा करता है । जिससे कि सामाजिक समरसता बनी रहे । इस सामाजिक समरसता को भंग करना वेद को प्रिय नहीं । उसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वेद अहिंसा की स्थापना हेतु महारथी क्षत्रियों के होने की प्रार्थना करता है ।
वेद की सामाजिक समरसता में कितनी गहरी आस्था है ? देखिए :-

ओ३म्‌ सं समिधवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ ।
इड़स्पदे समिद्युवसे स नो वसुन्या भर ।।

हे प्रभो ! तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन वृष्टि को ।

ओ३म संगच्छध्वं सं वदध्वम् सं वो मनांसि जानताम।
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानानां उपासते ।।

प्रेम से मिल कर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो ।
पूर्वजों की भांति तुम कर्त्तव्य के मानी बनो ।।

समानो मन्त्र:समिति समानी समानं मन: सह चित्त्मेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि।।

हों विचार समान सब के चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान देता हूँ बराबर भोग्य पा सब नेक हो ।।

ओ३म समानी व आकूति: समाना ह्र्दयानी व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा ।
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढे सुख सम्पदा ।।

वेद का सन्देश है कि मनुष्यो ! तुम सब मिलकर चलो। मिल कर बात किया करो । तुम्हारे मन मिल जाएं , तुम वैसे ही मिलकर कार्यों को सिद्ध करो जैसे विभिन्न क्षेत्रों के देव परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं । तुम्हारा सब का संकल्प समान हो , तुम्हारे हृदय समान हों, तुम्हारा मन समान हो । जिससे तुममें परस्पर साथ रहने की शुभ प्रवृत्ति उत्पन्न हो।”
वेद की पावन आज्ञा है कि अरे मानवो ! तुम्हारी आपस में चाल एक हो , वाणी एक हो , तुम्हारा मन एक हो । इससे सिद्ध है कि वेद पारस्परिक वैमनस्यता को ना बढ़ाकर सौमनस्यता को बढ़ाता है । इससे बढ़कर साम्यवाद की आदर्श स्थिति कोई नहीं हो सकती । इससे अलग जाकर जिस प्रकार सोवियत संघ में ऊपरी साम्यवाद को लादने का प्रयास किया गया , उसका परिणाम संसार ने देख लिया है । उस साम्यवाद का विघटन अथवा विखण्डन हृदय और मन का परिवर्तन न होना था । जबकि वेद तो हृदय परिवर्तन के पश्चात अपने – अपने कार्यों में पूर्ण निष्ठा और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण की बातों पर विशेष बल देता है । यदि ऐसा हो जाता है तो राष्ट्र में पूर्ण शान्ति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है । यह स्मरण रखना होगा कि इस उपदेश को व्यावहारिक रूप में लागू करने के लिए क्षत्रिय महारथियों का सहयोग अवश्यंभावी है।
वेद के उपरोक्त ऐक्य में जो कोई हस्तक्षेप करता है उसे वह सहन नहीं करता । ऐसे अनार्यों के विनाश हेतु ही वेद क्षत्रिय महारथियों की सेना के अस्तित्व का पक्षधर है । अतः धर्म की स्थापना हेतु की गई हिंसा हमारे यहाँ धर्म का ही एक अंग है ।

हमने अपना लिया है विपरीत मार्ग

आज हम तथाकथित अहिंसा के उपासक वेद के विपरीत अहिंसा को अपनाए हुए हैं । जो सर्वथा त्याज्य और निन्दनीय है । भारतीय राष्ट्र में आज अनेकों मजहबों और सम्प्रदायों के मानने वाले वास कर रहे हैं । हम सबका इतिहास एक है , संस्कृति एक है । पर इसके उपरान्त भी हम अलग-अलग सम्प्रदाय , मजहब ,जातियों और पन्थों के इतिहास और संस्कृति बनाने व खोजने में लगे हुए हैं। मजहब और सम्प्रदायों की पहचानों ने हमारे मन में मन- मस्तिष्क भी हिन्दू , मुस्लिम , सिख व ईसाई की विघटनवादी मानसिकता के बना डाले हैं । इसका परिणाम यह हुआ है कि हम पहले हिन्दू हैं , मुसलमान हैं , सिख हैं , ईसाई हैं ,परन्तु भारतीय नहीं हैं । इस विघटनकारी मानसिकता के परिणामस्वरुप राष्ट्र में चारों ओर अशांति , भूख और अनाचार का बोलबाला है । ऐसी परिस्थितियों में राज्य के लिए अपेक्षित है कि वह पन्थनिरपेक्ष रहते हुए और विवेकपूर्ण ढंग से न्यायपथ का अनुगमन करते हुए भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों ,मान्यताओं और गौरवपूर्ण परम्पराओं को राष्ट्रवासियों के मन – मस्तिष्क में आरोपित करने का काम करे ।
व्यावहारिक जीवन में वोटों की राजनीति हावी है। यह राजनीति हमारे राजनीतिज्ञों को ऐसा नहीं करने दे रही है । हम सबको वोटों के नाम पर बांटा जा रहा है। जो देश और समाज के लिए अत्यन्त घातक है । इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि बहुसंख्यकों की देशभक्तिपूर्ण और राष्ट्रीय भावनाओं को प्रोत्साहित करने वाली बातों को अस्वीकार कर दिया जाता है। इसके विपरीत अल्पसंख्यकों की राष्ट्रीय विघटन को बढ़ावा देने वाली बातों को स्वीकार कर लिया जाता है। इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में हम जिस ओर बढ़ रहे हैं , वह अत्यन्त भयावह स्थितियों को प्रकट करता है । राष्ट्र का भविष्य अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में डूबा हुआ दृष्टिगोचर होता है ।

जाहिर तो कुछ और ही दिलों से हो रहा है ।
कहने को कह रहे हैं हिंदोस्तां हमारा ।।

हम राष्ट्रीय दुर्भाग्य के जिस दौर में फंसे खड़े हैं , उसके लिए हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व की अहिंसावाद की यह गलत परिभाषा उत्तरदायी है कि हमें हर स्थिति में उदार और मानवोचित रुख अपनाते हुए सहिष्णु बने रहना है । फिर चाहे कोई हम पर कितने ही अत्याचार क्यों न कर ले । इसी कारण देश में वेद और वैदिक संस्कृति का विनाश किया जा रहा है । वेद और वैदिक संस्कृति की बातें किया जाना हमारे लिए अत्यन्त पिछड़ेपन की बातें मानी जाने लगी हैं । अपनी अत्यन्त प्राचीन संस्कृति के प्रति हमारे मन – मस्तिष्क में हीनता की भावना व्याप्त है , क्योंकि दूसरा व्यक्ति भी हमको रूढ़िवादी ना कह बैठे यह डर हमको अपनी संस्कृति की बातें करते समय होता है। भारतीय राष्ट्र में पुनः खालिस्तान , पाकिस्तान और अन्य कितने ही स्थानों की मांग उठने लगी है । यह सोच हमारी विघटनकारी मानसिकता की प्रतीक है । हमारी चाल एक है और ना ही मन एक हैं । वेद व्यवस्था की सामनस्यतावादी समाजोन्मुखी एवं राष्ट्रोन्मुखी प्रवृत्ति उड़न छू हो गई है ।आततायियों और राष्ट्रद्रोहियों के लिए भारतीय संस्कृति में उनके समूल नाश की व्यवस्था का प्रावधान होते हुए भी हम सांप को दूध पिलाते हुए यह तर्क देते हैं कि कड़ाई से निपटना हमारी संस्कृति और संस्कारों के विपरीत है। हमारी इस मानसिकता ने भारतीय राष्ट्र को पूर्व में भी कई बार खण्डित किया है और संभव है कि आगे भी यह क्रम यथावत जारी रहे , क्योंकि हमने पूर्व की घटनाओं से कोई शिक्षा नहीं ली है ।
भारतीय राष्ट्रवाद की लौ को यद्यपि इस्लाम और ईसाइयत ने अपने – अपने शासनकाल में बुझाने का प्रयास किया , किंतु यह दमन चक्र के घोर झंझावातों को सहन करने के पश्चात उसी प्रकार पुनः प्रदीप्त तो हो गयी जिस प्रकार बर्फीले स्थानों की फसल बर्फ पड़ते समय तो बर्फ से ढक जाती है पर जब बर्फ पिघल जाती है तो वह फसल फिर से लहलहा उठती है ।

स्वतन्त्रता के उपरान्त अपनाई गई गलत नीति

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भी भारतीय राष्ट्रीय नेतृत्व वीरोचित क्षात्र धर्म के सर्वथा प्रतिकूल नरम दृष्टिकोण अपनाते हुए राष्ट्रद्रोही तत्वों के प्रति जिस तुष्टीकरण की नीति का सहारा लेता रहा है वह हमारे लिए आत्मघाती ही सिद्ध हुआ है । हमारे आसपास धर्मांतरण के माध्यम से भारतीय संस्कृति का विनाश किया जा रहा है । अफगानिस्तान, पाकिस्तान और इनसे पूर्व श्रीलंका और बर्मा आदि देश जब तक हिंदू अर्थात आर्य रहे तब तक भारतीय सत्ता से शासित होते रहे । पर जब इनमें दूसरे संप्रदाय अथवा मजहब के लोगों का वर्चस्व हो गया तो देर सबेर किसी ना किसी प्रकार ये भारतीय राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से न केवल दूर हो गए अपितु एक स्वतन्त्र राष्ट्र बन गए । इन उदाहरणों से शिक्षा लेते हुए हमें अपने राष्ट्र और संस्कृति की रक्षार्थ अहिंसावाद के आत्मघाती घेरे से स्वयं को बाहर करना होगा , अन्यथा एक समय वह आएगा जब आज के जिम्मेदार लोग ही गद्दार मान लिया जाएंगे । आज राष्ट्र द्रोह और राष्ट्रवाद की परिभाषा बदल गई है । राष्ट्रद्रोही आज राष्ट्रवादी बने खड़े हैं और भारतीय राष्ट्रवाद को छल कर उसमें सेंध लगा रहे हैं । भारत के पूर्वी – उत्तरी भाग के समस्त राज्यों में ईसाई मिशनरियों सक्रिय हैं और वहाँ की अधिकतर हिन्दू जनसंख्या को ईसाई बना दिया गया है । इस भूभाग में भारतीय संस्कृति की नहीं अपितु ईसाइयत की पूजा हो रही है । इनके विरुद्ध आवाज उठाने वालों को राष्ट्रद्रोही सिद्ध किया जा रहा है । इससे वहाँ राष्ट्रवादी शक्तियां दुर्बल पड़ती जा रही हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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