लेखक परिचय

डॉ. धनाकर ठाकुर

डॉ. धनाकर ठाकुर

फारबिसगंज, अररिया में 10 अप्रैल, 1955 को जन्‍म। एम.बी.बी.एस., एम.डी.(औषधि) डी.सी.एच. की शिक्षा प्राप्‍त की। अंतरराष्‍ट्रीय मैथिली परिषद् के संस्‍थापक एवं प्रवक्‍ता। मैथिली, संस्‍कृत, हिंदी, अंग्रेजी, रसियन, फ्रेंच, कन्‍नड, नेपाली सहित 16 भाषाओं के जानकार। चिकित्‍सा संबंधी चार पुस्‍तकें संपादित कीं। मैथिली, हिंदी एवं अंग्रेजी में सात पुस्‍तकों के रचयिता। 'आयुर्विज्ञान प्रगति' एवं 'मैथिली संदेश' पत्रिका के संपादक। मैथिली, हिंदी एवं अंग्रेजी में समसामयिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लेखन।

Posted On by &filed under टॉप स्टोरी, विविधा.


डा॰ धनाकर ठाकुर

indiaभारत – राज्यों का संघ है – राज्य  ही मूल इकाई होनी चाहिए  जो २.५- ५ % आबादी या और क्षेत्रफल के मानडंडों को पूरा करने वाला हो मैं १९७७ से देश में सांगठनिक प्रवास कर रहा हु प्रान्त की जीविता ,  भूगोल,  जलवायु, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, राष्ट्र की सुरक्षा और भाषा जो शिक्षा का और प्रशासन का माध्यम बन सके के आधर पर  ये राज्य हों . किसी पाठक के तेलंगाना के विरोध पत्र पर  टाइम्स ऑफ़ इंडिया ,बंगलोरे में २९.६.२००६  को मेरा पत्र छाप था , “I feel like astronomical debate on Pluto, etc. “A State should be formed with sufficient mass (area as well as population) for its self-sustenance to overcome rigid socio-economic as well as linguistic forces so that it assumes nearly a well defined cultural shape. I feel the mass of Indian states should be 2.5 to 5 per cent of area and or population- needing thereby smaller states and UTs to be merged and bigger states to be shelved for optimal political potential. Mithila, Vidarbha, Purvanchal, Bundelkhand are equally fit cases like Telangana which needs serious considerations.”

वस्तुतः पहले यह विचार होना चाहिये  की प्रान्त हो कितने- यदि आपने ३५-४० से संख्या बढाए तो फिर क्षेत्रों की आवश्यकता होगी क्योंकि हमारा यह आम अनुभव है की किसी बैठक में ३०-३५ से अधिक व्यक्ति हों तो वह  किसी निश्चित अंतराल २-३ घंटे में ख़त्म ही नहीं हो सकती – कुछ बोलेंगे –कुछ सुनेंगे और कुछ सोयेंगे- कुछ हाथ उठा समर्थन करेंगे कुछ विरोध में रहेंगे- किसी अध्यक्ष (मान लीजिये राष्ट्रपति को राज्यपालों की, , प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्रियों की या किसी केन्द्रीय मंत्री को उस विभाग के राज्य के मंत्रियों की बैठकों से ऐसे ही निपटना होगा.

प्रान्तों की राजधानियों के बारे में भी विचार हो के ईव पहले से ही आबादी के भर से तंग हुवे प्रदूषित हो रहे महानगरों में नहीं हों – समय आ गया है भारत की नयी राजधानी पर भी विचार हि जो मेरे विचार से जबलपुर में होनी चाहिए नर्मदा के किनारे, ऐसा राष्ट्रिय सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक है (जब अखंड भारत था तो  दिल्ली ठीक था –वैसे वहां गर्मी और सर्दी अति है और आबादी बहुत घनी हो गयी है ). राजधानी बड़े शहर में होना भी आवश्यक नहीं- वाशिंगटन , बोन, बर्न से बड़े बहुत शहर है ..

राज्यों की राजधानी के लिए रात भर की यात्रा करने की आवश्यकता नहीं हो – ४-५ घंटे में पंहुचा  जा सके तो सचिवालय के घूस  की दर ख़त्म नहीं हो तो कम जरूर हो जायेगी और ललोगों का खर्चा . पुरानी राजधानियों के मह्ल्प्म का व्यावसायिक , शैक्षणिक , सामाजिक उपयोग हो सकते हैं.

भारत में प्रस्तावित राज्य – राजधानी – क्षेत्रफल और आबादी का प्रतिशत भारतमे और घनत्व/ वर्ग किलो मीटर ( २००१ के जनगणना के अनुसार )

1.            जम्मू-कश्मीर-लद्दाख   श्रीनगर-जम्मू  6.76      0.98        45

2.            पंजाब-                   चंडीगढ़                1.53        2.46        499

3.            केन्द्रीय प्रदेश                 दिल्ली 3.08        3.99        404

4.            हरित प्रदेश         कन्नौज 1.80        3.84        664

5.            उत्तराखंड               देहरादून    2.59        3.58        379

6.            अवध            लखनऊ          2.10        4.66        694

7.            विन्ध्य-बुंदेलखंड  झांसी               3.85        2.66        221

8.            पूर्वांचल                जौनपुर                1.66        4.12        776

9.            बिहार           पटना                 1.40        3.79        847

10.          मिथिला      बरौनी                 1.70        4.61        849

11.  उदयाचल            बन्गाइगाँव              1.57        3.20        636

12.  ब्रह्मपुत्र         जोरहट             3.55        1.39        113

13.  बराक          शिलंग          3.21        1.44        139

14.  बंग प्रदेश      खड़गपुर                       2.35        6.41        854

15.  झारखण्ड   जमशेदपुर         3.58        3.14        273

16.  उत्कल     भुबनेश्वर                3.27        2.73        260

17.  आन्ध्र    विजयवाड़ा          3.13        2.78        277

18.तेलंगाना- रायलसीमा हैदराबाद            5.54        4.30        242

19.          छत्तीसगढ़    रायपुर                 4.11        2.03        154

20.          विदर्भ           नागपुर                 2.70        2.01        232

21.          महाकौशल          जबलपुर              2.78        1.51        172

22.          मध्यभारत          भोपाल             3.73        2.21        183

23.          राजपुताना     जयपुर       3.33        2.66        249

24.          मेवाड़        उदयपुर                2.44        1.38        176

25.          मरू प्रदेश  जोधपुर       4.99        1.46        91

26.    सौराष्ट्र-कच्छ     राजकोट 3.35     1.46        136

27.  गुजरात  गांधीनगर                      2.63        3.50        415

28. पश्चिम महाराष्ट्र      लोनावाला           2.94        4.74        502

29. पूर्व महारष्ट्र               औरंगाबाद           3.88        2.94        236

30.          उत्तर कर्नाटक  हुबली                       3.57        2.54        222

31.          दक्षिण कर्नाटक   मैसूर      2.20        2.52        357

32.          केरल                 कोच्ची                 1.12        3.05        849

33.          वड          तमिल्गम चिदंबरम        1.80        3.05        529

34.          तेन तमिल्गम  मदुराई             2.38        3.08        404

साथ का नक्शा स्केल के अनुसार नहीं है और सभी वर्त्तमान प्रान्तों के भीतर के जिलों में अंतर का अंदाज़ उससे होगा( लेख बहुत लंबा होगा इसलिए अलग दे नहीं रहा हूँ वैसे  वह उपलब्ध है – जिज्ञासु मेल करें dhanakar@gmailcom  या  फ़ोन ०९४७०१९३६९४, ०९४३०१४२७८८

मैथिली सन्देश में इसका एक रूप २६.१०.१९९६ को प्रकशित हवा जबकि रांची में अखिल; भारतीय पत्रकार संघ  (all India conference of the working journalists) हवा था जिसके बाद मरू प्रदेश उत्तर कर्नाटक और दक्षिण तमिलनाडु की मांग शुरू हुई .

कोई केंद्र शासित राज्य (उन्हें निकटस्थ प्रान्तों में मिला दिया गया है- लक्षद्वीप केरल में , अंदमान  बंग प्रदेशमे)

संलग्नक- नक्शा प्रस्तावित नए भारतीय प्रान्तों का .

9 Responses to “भारतीय राज्य पुनर्गठन –एक दृष्टि”

  1. राकेश कुमार आर्य

    राकेश कुमार आर्य

    डा० धनाकर जी,
    यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो पृथक राज्यों की मांगों के पीछे पहला और प्रमुख कारण राजनीतिक होता है। लोग पृथक राज्यों के गठन से कम से कम मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक आदि बनने की अपनी इच्छा को फलीभूत होना देखना चाहते हैं। बड़े राज्य में उनकी यह इच्छा जब पूरी नही हो पाती तो वह छोटे राज्य की वकालत करते हैं और लोगों की भावनाओं को भड़काकर सत्ता सोपान का आनंद उठाते हैं। परंतु यहां यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि बड़े राज्यों में किसी क्षेत्र विशेष का वर्चस्व स्थापित हो जाना सामान्य सी बात है। उस वर्चस्व को तोड़ने के लिए तथा स्वयं को उस वर्चस्व की घुटन से मुक्त करने के लिए भी छोटे राज्यों की मांग की जाती है। यहीं पर यह भी ध्यान दिया जाए कि यदि राज्यों में क्षेत्र विशेष का वर्चस्व स्थापित कर क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की ओर पूरा और न्यायपरक ध्यान दिया जाए तो ये पृथक राज्य मांगने की स्थिति कभी ना आए। लेकिन कहा जाएगा कि आदमी से गलती होना स्वाभाविक है आखिर राजनीतिज्ञ भी तो आदमी ही हैं। यदि उनमें ऐसी त्रुटियां मिलती हैं तो क्या हो गया? इस पर हमारा मानना है कि राजनीतिज्ञ भले ही आदमी हैं, पर वे आम आदमी नही हैं वे खास आदमी हैं और इसलिए उनसे खास व्यवहार की उम्मीद की जाती है। यह उम्मीद ही उन्हें आदमी से ऊपर उठाती है और देवता बनाती है। यदि वह अपने को देवता स्थापित नही कर पाते हैं तो माना जाएगा कि वे इसके योग्य ही नही थे। हमें ध्यान देना चाहिए कि नये राज्य के बनने पर कितना धन व्यय होता है। निश्चित रूप से उस धनराशि से हजारों गांवों का समग्र विकास हो सकता है। नये राज्य के नये जनप्रतिनिधियों के वेतन आदि का मासिक और वार्षिक व्यय जो नया राज्य बनने पर अब निरंतर होते रहना है यदि वह ना करके निरंतर कुछ गांवों के विकास पर व्यय किया जाए तो आशातीत सफलता के परिणाम आएंगे।
    इसलिए हमारी मान्यता है कि क्षेत्रीय असंतुलन की जिस कमी के कारण नये राज्यों की मांग उठती है वह राजनीतिज्ञों के मानसिक असंतुलन के कारण उठती है। पहले उसका ही इलाज किया जाना चाहिए।
    अत: राजनीतिज्ञों को उच्च और न्यायपरक व्यवहार निष्पादित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना अपेक्षित है। अब दूसरी बात पर आते हैं छोटे राज्यों के विषय में कहा जाता है कि इनके द्वारा विकास की प्रक्रिया निर्बाध रूप से हर व्यक्ति तक पहुंचती है। इसलिए छोटे राज्य ही जनता के हित में हैं। इस तर्क को भी राजनीतिज्ञ अपने स्वार्थों के दृष्टिïगत ही देते हैं। ये तो है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का मुख्यमंत्री अपने हर गांव के प्रधान से संवाद स्थापित नही कर सकता जबकि हरियाणा का मुख्यमंत्री ऐसा कर सकता है। परंतु यह भी आवश्यक नही है कि एक ग्राम प्रधान का अपने मुख्यमंत्री से संवाद करना या स्थापित होना अनिवार्य ही है। यदि ऐसा है तो विधायक, सांसद, जिला पंचायत अध्यक्ष आदि की व्यवस्था क्यों की गयी है? आखिर वे भी तो जनप्रतिनिधि ही हैं और जनता की शिकायतों को दूर करने के लिए ही उनका निर्वाचन किया गया है। यदि वे बीच में व्यर्थ ही बैठे हैं, तो फिर तो हर विधायक अथवा सांसद को ही मुख्यमंत्री बनाना पड़ेगा और वह अपने प्रधानों की सम्मति से शासन चलाएगा।

    Reply
    • Dr. Dhanakar Thakur

      पृथक राज्यों की मांगों के पीछे प्रमुख कारण सांस्कृतिक होता है। बहुत कम नेता इन मांगों के समर्थन में पहले आते हैं वैसे उनके बिना आये राज्य बनेंगे नहीं . क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की बात करना आसान है पर पूरा आक्रना कठिन . राज्यों की मांग उठानेवाले अ राजनीतिक व्यक्तियों को भी आम आदमी नहीं समझें . नये राज्य के बनने पर धन व्यय के एबात फजूल है- जनता का धन व्यय दूर राजधानी जाने में बहुत होता है , इसका अंदाज़ किसी बड़े राज्य की जनता का आकलन कर होना चाहिए- पुराने राज्यों से नए में कैडर बंटते हैं- पुरानी राजधानियां का प्रदूषण कम होता है, जनभार घटता है नये जनप्रतिनिधियों के वेतन आदि का मासिक और वार्षिक व्यय पुराने को काट कर ही बनता है ।
      असंतुलित राज्य देश की राजनीती में सबको सामान अवसर नहीं देते – क्षेत्रीय असंतुलन भी स्वाभाविक रूप से होता है- मैंने संतुलित राज्य की बात की है और किसी एक प्रान्त के नेता बनने का लोभ किसे एको हो सकता है पर देश भर के प्रान्तों का नहीं
      निउस्चय छोटे राज्यों के द्वारा विकास हवा है यदि सही से अध्ययन की जाये – फिर यह अस्मिता , अपने वैशिष्ट्य का भी प्रश्नहै इसलिए छोटे राज्य ही जनता के हित में हैं। जनप्रतिनिधि ही हैं तो राज्य की भी क्या जरूरत – एकात्मक भी देश रह सकता है पर संघीय ढांचे के भी सोच में तर्क हैं और राज्य यदि संतुलित हों तो देश में आर्थिक आयर राजनीतिक समानता होगी । आपने लेख पढ़ा और लिखा इसलिए धन्यवाद .

      Reply
  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    वेशक श्री धनाकर ठाकुरजी के प्रस्तुत आलेख में सन्निहित प्रस्ताव युक्तिसंगत और ‘राष्ट्र क्षेम ‘ से विलग हैं किन्तु प्रासंगिक विमर्श के लिए समयानुकूल हैं ..!

    Reply
    • Dr. Dhanakar Thakur

      युक्तिसंगत और ‘राष्ट्रक्षेम ‘ से विलग दोनों एक साथ कैसे संभव है? राज्यों का बिना किसी ठोस सिद्ध्नत के बनाने से ‘राष्ट्रक्षेम ‘ से विलगाव सम्बह्व है पर
      संतुलित राज्यों का बनाना ‘राष्ट्रक्षेम ‘ से विलग हो हे नहीं सकता हैं ,

      Reply
  3. श्वेत ब्रत झा

    एक असफल राज्य झारखण्ड बनाया गया | भय, भूख व् भ्रस्टाचार की स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी क्रीड़ा-स्थली |यदि भारत के इस इलाके को सफल होते देखना हो तो संथाल परगना को भी एकदिन झारखण्ड से अलग करना ही पड़ेगा जिसकी राजधानी देवघर या दुमका होगी |

    Reply
    • Dr. Dhanakar Thakur

      संथाल परगना पर पुरे भारत को गौरव होना चाहिए – अंगेजों के विरुद्ध १८५५ में(जी हाँ १८५७ के पहले ) हल विद्रोह में तिलका माझी के नेत्रित्व में लड़ रहे १५०००- २५००० संथालों को गाजर-मुली की तरह मार दिया – सूले एपर लटका दिया- उसले सामने जलें वाला बाग़ भी कुछ नहीं है – जनजाति के नाम पर संथाल परगना को झारखण्ड में रखना ही गलत था संथाल परगना के जिसके सभी जिले भारत के ५० सबसे पिछड़े जिले में आते हैं . इसलिए मैंने उसे मिथिला में रखा है जिससे उसका स्वाभाविक सम्बन्ध है( भागलपुर प्रमंडल का वह भाग रहा है और मैथिली की दक्षिणी बोली अंगिका वहां बोली जाती है ) – आदिवासी आरक्षण का जो भाग उनमे अधिक पिछड़े होने के कारण संथाली को नहीं मिलता वह उन्हें ही पूरा का पुरा मिथिला में मिलेगा – अभी रांची – जाने में १२ घंटा ट्रेनमे लगता है जो मिथिला के भीतर कंही ४-५ घंटे में हो जाएगा वल्कि तब भागलपुर या देवघर के भी राजधानी बनने की संभावना होगी (वैसे बरौनी के प्रस्ताव में सभी को सुविधा विचार मैंने रखा है ) – गंगा जल सिंचाई के लिए संथाल परगना को मिलेगा केवल अभिषेक के लिए बाबा बैद्यनाथ को नहीं , वैसे भी कांवरियों में अधिकांश मिथिला से ही आते हैं – ————————————– वैसे वर्तमान झारखण्ड के बारे में भ्रान्ति अधिक है मधु कोड़ा के होते हुवे भी विकास हवा जरूर नहीं होता कार्य मुंडा या बाबूलाल मरांडी ही रहते तो और भी अधिक होता –
      Referring TOI (20.11.2011)
      In the article of Subodh Verma
      Vital statistics
      Bihar-
      2002-3 vs. 2009-10 Bihar Jharkhand
      % increase in primary schools 13 97
      Literacy rate 64(from 47) 68(from 54)
      Economic growth 6.8(from 4.9) 7.0(from 5.3)
      Infant Mortality rate 52(from 62) 44(from 70)
      Help from the centre(of grants and loans as % of total expenditure) 25 13
      Despite draughts more in Jharkhand plateau food production lowered -15 -19

      Reply
    • धनाकर ठाकुर

      झारखण्ड सभी पैमाने पर बिहार से २००० और २०१० के बीच बढा है मधु कोड़ा के होते हुवे भी
      अबस्थाई सरकार आने पर और बढेगा

      Reply
  4. डॉ. मधुसूदन

    Madhusudan

    राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को क्षति पहुंचाए बिना आप छोटे प्रदेश शासन की सुविधा के लिए सोच(?) सकते हैं।
    नीति राष्ट्रीय होनी चाहिए। राज्य, राष्ट्र-पूरक भूमिका निभानेवाले हो। क्रियान्वयन स्थानीय पर सोच राष्ट्रीय हो। राज्यनीति=राजनीति, राष्ट्रनीति को पोषक होनी चाहिए।
    उसीका दूसरा पहलु –> (१) उतने मुख्य मंत्री अधिक बनेंगे। (२) अन्य मंत्री भी उसी प्रमाण में बढ जाएंगे। (३) भ्रष्टाचार भी बढ जानेकी संभावना ? (४) शासन का खर्च जनता पर कर बढाकर ही तो संभव होगा।
    शासन की ही दृष्टिसे स्वीकार भी हो जाए, तो भी आगे समस्याएं आ सकती है।
    और पाठक भी अपने विचार रखें।
    मैं अलग दृष्टिकोण पढना चाहता हूँ। मेरे मत से, आपकी सहमति आवश्यक नहीं।

    Reply
    • Dr. Dhanakar Thakur

      प्रवक्ता ने लेख छापा तदर्थ धन्यवाद् के साथ , मधुसूदंजी, आपकी सभी भावनाओं का ध्यान मैंने अपने दृष्टि में किया है- मैं १९८९ में अपने वरीय मित्र गोविन्दाचार्यजी को कहा था की अपने पास इतने लोग है जो देश का चप्पा-चप्पा जानते हैं , अहर्निश प्रवास करते हैं क्यों हम केवल वनाचल(झारखण्ड का तब हम इस नाम से समर्थन करते थे ) , उत्तराखंड या छत्तीसगढ़ की ही बात करें – उन्होंने सहमति दी पर ऐसा प्रपत्र किसी का आया नहीं- हैदराबाद के संघचालक डॉ. चन्द्रमौलि ने मुझे बताया के पहले भारत में ५५ राज्य ( उस समयके देश) देश थे – मैंने भुबनेश्वर में माननीय कैलाशपति मिश्र (जो कार्यसमिति बैठक के ल्लिये गए थे और मैं अपने प्रवास पर) जिन्होंने मुड़े गोद में खेलाया था जब वे पूर्णिया के प्रचारक थे , प्रायः मेरे घर पर ही रहते थे ) जी से पूछा देन्दयाल्जी के छोटे राज्यों का क्या स्वरुप था – पर मुझे किसी ने नहीं दिया तब झक मारकर मैंने स्वयम इस पर फ़ाइल खोल ली – १९९६ में एक प्राथमिक स्वरुप प्रकाशित किया – प्रवास में लोगों से राय लेता रहा – २००४ में गोविन्दाचार्य जी से आगरा में भेंट हुई और उन्हें दिया तो बहुत खुश हुवे राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को क्षति पहुंचाए बिना आप छोटे प्रदेश शासन की सुविधा के लिए सोच(?) सकते हैं।
      निश्चित रूप से” नीति राष्ट्रीय होनी चाहिए। राज्य, राष्ट्र-पूरक भूमिका निभानेवाले हो। क्रियान्वयन स्थानीय पर सोच राष्ट्रीय हो। राज्यनीति=राजनीति, राष्ट्रनीति को पोषक होनी चाहिए।”
      उसीका दूसरा पहलु –> (१) उतने मुख्य मंत्री अधिक बनेंगे—मेरी दृष्टिमे अभी यह ३४ है वर्त्तमान में भी २८+ ७ केन्द्रशासि त हैं । (२) अन्य मंत्री भी उसी प्रमाण में बढ जाएंगे।- उत्तर 1 के समान , वैसे कुछ अधिक राज्य भी हुवे तो अब 10 प्रतिशत या १२ की बाध्यता है (३) भ्रष्टाचार भी बढ जानेकी संभावना– नजदीक राजधानी से आने जाने का झन्झट कम होगा और लोग नेताओं को अधिक जानेंगे – वैसे भ्रस्ताचार का आकार से कुछ लेना-देना नहीं है यह देश की मानसिक स्थिति है (४) शासन का खर्च जनता पर कर बढाकर ही तो संभव होगा- शास न का खर्च घट भी सकता है – हेलिकोपर का कम प्रयोग होगा नेताओं द्वारा – गाडी पर्याप्त होगी । प्रान्तों के कैडर बांटें जायेंगे – बड़े प्रांत में कर्मचारियों का दूर -दूर तबादला नहीं हो सकेगा – हरयाणा के ईमानदार खेमका ने ४१ तबादले सह लिए- उत्तर प्रदेश की दुर्गा को नोयडा से बलिया फिर…घुमाते हुवे परेशान कर सकती है बिना निलंबन के भी. पुरानी राजध्नियों से आबादी का बोझ भी घटेगा जिससे पर्यावरण सुधरेगा
      शासन की ही दृष्टिसे स्वीकार भी हो जाए, तो भी आगे समस्याएं आ सकती है- समस्याएं नयी -नयी आते रहती हैं – देश का नक्शा कई बार बदला है और बदलता रागेगा मैंने २.५- ५% आबादी और या खेत्र का ध्यान रख संतुलित प्रान्त बनाने की बात की है- छोटे , अति छोटे प्रान्त की नहीं ।
      और पाठक भी अपने विचार रखें।

      Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *