धर्म से बड़ी भारतीयता, यह कब स्वीकार करेंगे हम…

हिंदी सिनेमा में एक बहुत ही मशहूर गीत है कि, “मांझी जो नाव डुबोए, उसे कौन बचाये? जी हां इस गीत से शुरुआत इसलिए, क्योंकि जब देश और समाज को चलाने वाले लोग ही देश और समाज की भलाई से इतर सोचेंगे, फ़िर देश तरक़्क़ी की बिसात पर आगे कैसे बढ पाएगा? हम लोकतंत्र के साये तले भले आज़ादी की सांसें लेने का ढोंग कर लें, लेकिन क्या वास्तविक आज़ादी इस देश में है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। जिसकी चिंता किसी राजनीति दल को नहीं। महिला अधिकारों की बातें सभी राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों में जगह पाती है, लेकिन राजनीतिक दल के नेताओं के दिलों में नहीं। यही कारण है कि आज तक महिलाओं को समान अधिकार तक नहीं मिल पाएं। समान अधिकार तो छोड़िए हुजूर, समान वेतन और समान काम का हक़ भी बमुश्किल ही है महिलाओं के लिए। हमारे लोकतंत्र और संविधान की एक अजीब ही व्यवस्था है, लोकतंत्र में लोक तो हैं, लेकिन इसमें शायद आधी आबादी शामिल नहीं और संविधान में बातें तो कई अच्छी-अच्छी लिखी, लेकिन उसे धरातल पर लाने की सियासतदानों की नीयत नहीं। बात संविधान की निकली है, तो इसी संविधान का अनुच्छेद- 44 समान नागरिक संहिता की बात भी करता है, लेकिन आज़ादी के इतने सालों बाद उसे लेकर हम तनिक भी आगे नहीं बढ़ पाएं हैं। हाँ गाहे-बगाहे भाजपा द्वारा इस मुद्दे को हवा दी जाती है, लेकिन जिस ईमानदारी के साथ उसे प्रयास करना चाहिए, वह दमखम भाजपा भी नहीं दिखा पाती। ऐसे में वर्तमान दौर में हमारे राजनेताओं पर यह बात एकदम सटीक बैठती है कि वे सिर्फ़ राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम करते हैं, नहीं तो आज समान नागरिक संहिता की दिशा में देश आगे बढ़ चला होता। 

इतना ही नहीं हमारे देश का एक सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह देखिए कि यहां समाज सुधार के नैतिक फैसलों को भी धर्म का चोला ओढ़ाकर औंधे मुंह रख दिया जाता है, ताकि उसकी कोई बात न करें। गौरतलब हो कि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, जोकि कानून के निर्माता रहे है। उनका मत था कि हमारा देश समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को अपनाएं। लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिए कि आजादी के 75 साल बाद भी इसे लागू नही किया गया है। समान नागरिक संहिता का मतलब है कि धर्म और जाति से ऊपर उठ कर पूरे देश में एक समान कानून लागू करना। जिसके अंतर्गत पूरे देश में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे सामाजिक मुद्दे एक समान कानून के तहत आ जाएंगे, धर्म के आधार पर न्याय व्यवस्था नही रहेगी, लेकिन यही बात तो धर्म के ठेकेदारों को शोभा नहीं देती। उन्हें तो सिर्फ राजनीति करना है। हमारे देश के संविधान में एक और जहां समता और समानता की बात की जाती है। वहीं दूसरी ओर जब बात समान नागरिक संहिता की आती है। फ़िर तमाम राजनीतिक दल इसका विरोध करने के लिए मुखर हो उठते हैं। अब सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारे राजनेता नही चाहते कि महिलाएं आगे बढ़े, क्योंकि समान नागिरक संहिता में बात तो महिलाओं को अधिकार देने की हो रही है। इतना ही नहीं सभी महिलाओं को, समान नागरिक संहिता से समान हक मिल जाएगा। फ़िर उसको लेकर समाज में इतना भ्रम क्यों पैदा किया जा रहा? एक सबसे बड़ी बात यह जब पाकिस्तान में समान नागरिक संहिता अपनाई जा सकती, फिर भारत मे क्यों नहीं? पाकिस्तान में समान नागरिक संहिता के कारण वहां के अल्पसंख्यक मुस्लिम नहीं बन गए, फ़िर भारतीय मुसलमानों को हिन्दू क़ानून थोपे जाने का भय क्यों? 

इतना ही नहीं, यह भय क़ानून थोपे जाने भर का है या बात कहीं इससे अधिक कुछ और सवाल तो यह भी बनता है, क्योंकि एक समय तीन तलाक़ को लेकर भी मुस्लिम समाज के पुरूष यह नहीं चाहते कि इसे ख़त्म किया जाएं। फ़िर सवाल यहीं बात अगर महिलाओं के अधिकार की है। फ़िर उसे यह अधिकार मिलना या नहीं इसकी वक़ालत पुरूषों को करने का हक किसने दे दिया? वैसे भी देखा जाएं तो आज़ादी से पहले भी मुस्लिम के क़ानूनों के साथ कभी हेर-फेर नही की गई, क्योंकि उस धर्म से जुड़े लोग बदलाव को स्वीकार करने के हिमायती कभी दिखें नहीं। वहीं हिन्दू कानूनों में बदलाव आज़ादी से पहले और बाद दोनों कालखण्ड में होते रहें। इतना ही नहीं 1955-56 में हिन्दू कोड बिल को चार हिस्सों में पारित किया गया। पहला हिस्सा 1955 में आया जिसे ‘हिन्दू विवाह अधिनियम’ कहा गया। 1956 में दूसरा कानून आया जिसे ‘हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम’ के नाम से जाना जाता है। वहीं तीसरा हिस्सा 1956 में ही आया जिसे ‘हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट’ कहा गया। इसे हिंदी में हिन्दू अव्यस्कता व संरक्षकता अधिनियम भी कहा जाता है। चौथा हिस्सा ‘हिन्दू कोड बिल’ का 1956 में बना जिसे हिन्दू दत्तक व रखरखाव अधिनियम कहा गया। देखा जाए तो कही न कही चारों क़ानून की मदद से हिन्दू धर्म मे व्याप्त रूढ़ियों को मिटाने का प्रयास किया गया। वहीं इसमें सिक्ख, बौद्ध, जैन, वीर शैव , लिंगायत, आर्य समाज और ब्रम्हा समाज को भी शामिल किया गया क्योंकि ये सभी भी कहीं न कहीं हिन्दू धर्म से ही आते है। लेकिन जब बात मुस्लिम क़ानूनों की आती है तो सभी दल इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेते है।
अब बात मुस्लिम महिलाओं की करे तो आज भी उन्हें सम्पत्ति में हक़ तक नहीं दिया जाता। बहु- विवाह जैसे कलंक का दंश आज़तक मुस्लिम समाज की महिलाओं को झेलना पड़ता है। देश की आजादी को 75 वर्ष होने के बाद भी मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार नही मिल सके है। वही बात 1937 में बने देशमुख एक्ट की करे तो उसमे भी महिलाओं को सम्पत्ति में हक़ देने की बात कही गयी थी, लेकिन सम्पत्ति बेचने का हक नही दिया गया था। इसके अलावा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में पहली बार सम्पत्ति बेचने का हक हिन्दू महिलाओं को दिया गया। वहीं 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में पुनः संशोधन किया गया जिसके बाद विवाहित और अविवाहित महिलाओं को सम्पत्ति में हक़ मिला। वही मुस्लिम महिलाओं की बात करे तो उन्हें इन सब अधिकारों से आजतक वंचित रखा गया है। फ़िर यह भेदभाव क्यों?
आख़िर में जानकारी के लिए बता दें कि आजादी के बाद गोवा राज्य में पुर्तगाली नागरिक संहिता को अपनाया गया है। जिसकी वज़ह से वहां समान नागरिक संहिता लागू है, कहने का तात्पर्य यह कि गोवा में हिन्दू-मुस्लिम सभी के लिए समान क़ानून लागू होते हैं। फिर इसे सम्पूर्ण भारत में लागू क्यों नही किया जा रहा है? जब पाकिस्तान में सिविल यूनिफॉर्म कोड लागू है तो भारत में इसे लागू करने में हमारे राजनेता क्यों आगे नही आ रहे है? क्या वह नही चाहते कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार मिले। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि क्या महिलाओं को समाज में हक़ दे देने से समान नागरिक संहिता लागू करने से इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा? इतना ही नहीं क्या मजहबी आज़ादी, देश की एकता और सम्प्रभुता से अधिक बलवती हो सकती सवाल अपने आपमें यह भी है? जिसके लिए जवाबदेह समाज और धर्म के ठेकेदारों होना पड़ेगा, क्योंकि बात सिर्फ़ अधिकारों की नहीं, देश के लिए फ़र्ज़ निभाने की है और समान नागरिक संहिता आज की महती ज़रूरत भी।

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