uniform civil code

“समान नागरिक संहिता” क्यों आवश्यक है…?

“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।

तीन तलाक,समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार

मुस्लिम महिलाओं की तरफ से समान नागरिक संहिता नहीं बल्कि एकतरफा तीन तलाक़, हलाला व बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है उनकी मांग है कि इन प्रथाओं पर रोक लगाया जाए और उन्हें भी खुला का हक मिले.

नागरिकता कानून में संशोधन को लेकर हायतौबा…

निस्संदेह यदि हिंदुओं के अलावा कोई मुसलमान या ईसाई भी सच्चे अर्थों में अत्याचार और अन्याय के चलते देश में आता है, तो उसे भी यहां रहने का हक है। लेकिन प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन जब भारत में शरण लेती हैं, तो इन्हीं तथाकथित धर्मनिरपेक्ष तत्वों को यह भी बर्दाश्त नहीं हुआ था।

धर्म बनाम राष्ट्रधर्म

दुर्भाग्य का विषय यह कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम लाॅ में व्यक्ति की गरिमा और मानव अधिकारों के हित में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। शहबानों प्रकरण में देश की शीर्ष अदालत यह कह चुकी है कि मुस्लिम समुदाय में निजी कानूनों में सुधार होना चाहिए।

सुधार क्यों नहीं चाहता मुस्लिम समुदाय

यह कैसी प्रथा है कि फोन पर, ई-मेल से, एसएमएस से या पत्र से भी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह देने भर से संबंध खत्म कर लिया जाता है। मुस्लिम महिला को इसमें समानता का अधिकार कहाँ है? उसके पास तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं है। इस कुरीति का समर्थन करने के लिए यह कहना कि यदि पुरुष के पास तीन तलाक का अधिकार नहीं होगा, तब वह महिला से छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर देगा। इसलिए तीन तलाक महिलाओं के हक में है, क्योंकि इससे उनका जीवन सुरक्षित होता है। यह कठमुल्लापन नहीं, तो क्या है?