लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

कुछ लोग अलग ही मिट्टी के बने होते हैं. जब संसार समस्याओं से दूर भागता है, तब ये लोग समस्याओं के बवण्डर में साहस से घुसते हैं; आगे बढते हैं; समाज को संगठित कर संकट का सामना करते हैं. ऐसे कठिन प्रकल्प सिरपर लेनेवाले वीर विरला ही होते हैं. जब इन्दिराजी ने १९७६ में, भारत में, आपात्काल घोषित किया तब ऐसा ही अनुभव अमरिका में इस लेखक को हुआ था.
पर आज इस प्रकरण को क्यों उजागर करना चाहता हूँ? क्यों कि…..

(दो) एक परिवार तंत्र?

….अभी अभी पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री. प्रणव मुखर्जी संघ को संबोधित कर आए हैं. और बहुसंख्य कांग्रेसी प्रवक्ता अपनी बालिशता उजागर कर, महामहिम मुखर्जी को संघ कार्यक्रम में न जाने का परामर्श दे रहे थे. तब इस वृत्तान्त को लिखने का मन बना. कुछ विलम्ब हो गया; (बीच में प्रवास भी हुआ.) पर ऐतिहासिक सत्य को सामने लाने की कोई समय मर्यादा नहीं होनी चाहिए..इतिहास सदैव कहा जा सकता है; ऐसा मानकर इस संक्षिप्त परन्तु मह्त्वपूर्ण ऐतिहासिक अध्याय को समीचीन और समसामयिक मानकर प्रवक्ता के प्रबुद्ध पाठकों के सामने रखता हूँ.

और क्यों कि, दूसरी ओर, कांग्रेस का संघविरोधी पैंतरा सच्चाइयाँ टालकर भ्रान्तियाँ फैलाने में व्यस्त है. वह प्रेरित है एक विशेष परिवार से. बडा विरोधाभासी चित्र है. आज कांग्रेस देशभक्ति का चोला पहनी हुयी, एक पारिवारिक मण्डली (कम्पनी) या समवाय बनकर (कॉर्पोरेशन) रह गयी है. परिवार से संचालित, परिवार के हित में, परिवार द्वारा. इतनी पारदर्शी (प्रायवेट कंपनी ) निजी मण्डली अपने आप को जनतंत्र घोषित करती है, प्रजा को भोली और मूर्ख समझती है. और ठगनेका अभियान चलाती है.

जनता का शासन जनता के हित में जनता द्वारा हो, उसे कहते हैं, जनतंत्र. पर परिवार का शासन, परिवार के हित में , उसे कहती है जनतंत्र ? उसे वास्तव में कहा जाना चाहिए परिवार तंत्र! इस परिवार तंत्र से विपरित, जनतंत्र की रक्षा में संघ का, विदेश से स्वयंसेवकों के योगदान का इतिहास आपको जानना चाहिए. वैसे यह आलेख वैयक्तिक जानकारी पर आधारित है. एक ऐतिहासिक प्रकरण या झांकी कहा जा सकता है.

(तीन) प्रवासी भारतीय

यह १९७५-७६ के इन्दिरा जी के घोषित आपात्काल के विरोध में, अमरिका से चलाए गए अभियान का इतिहास है. उस समय भी अमरिका में काफी प्रवासी भारतीय थे; बहुत सारे छात्र भी थे. काफी सदा की भाँति “अपनी अपनी संभालियो भाड में जाए देस” में विश्वास रखनेवाले तो थे ही. और इन्दिरा के ऊगे हुए सूरज की पूजा करने वाले भी काफी थे; पर बहुसंख्य भारतीय निष्क्रिय ही थे. ’इन्दिरा के विरोधकों के पासपोर्ट’ जब्त होने का डर भी था. आगे कुछ आर एस एस के सक्रिय स्वयंसेवकों के पासपोर्ट जब्त भी हुए थे. ऐसे कठिन वातावरण में संघ स्वयंसेवकॊं ने अमरिका में भी सफल संगठन खडा किया, उसका जो अनुभव लेखक को हुआ, उस वैयक्तिक अनुभव पर यह प्रस्तुति है. इसे इस लेखक के अनुभवों का प्रकरण कहा जा सकता है.

(चार) अभियान का प्रबंधन:

सुदूर अमरिका से आपात्काल का विरोध कैसे किया जाए, कैसे अमरिकन शासन की ओर से भारत पर दबाव लाया जाए, और कैसे भारत का जनतंत्र पुनरस्थापित करने का अभियान चलाया जाए, ऐसे उद्देश्यों से एक सभा न्यु योर्क में बुलाई गयी. कानो कान ही सभा का प्रचार किया गया.

प्रायः सौ लोग सभा में आए थे. १९७५ -७६ में ऐसी संख्या को देखकर हम बडे उत्साहित थे. जब हमने अनेक वक्ताओं को सुना तो और भी प्रोत्साहित हुए. अनेक वाकपटुओं ने अपने विचार रखे. सभा के अंत में कार्यवाही के अलग अलग उत्तरदायित्व लेने के लिए आवाहन किया गया. तो कुछ २० एक कार्यकर्ताओं ने अपने नाम लिखवाए. लोग डरे हुए भी थे. भारत की भलाई तो चाहते थे, पर शिवाजी अपने घर में नहीं होना चाहिए. बिल्ली के गले में घण्टी बंधनी तो चाहिए पर कोई और बाँधे. ऐसा माननेवाले चतुर वाणी वीर थे.

(पाँच)सारे निकले संघ कार्यकर्ता

अचरज की बात पता चली , जब सभी उत्तर दायित्व लेनेवालों का अंतरंग निकट परिचय होता गया, प्रायः सारे संघ संस्कारित कार्यकर्ता ही निकले. कुछ वाणी-वीर कुछ न कुछ बहाना और वैयक्तिक कारण बताकर अदृश्य हो गए. वैसे बाद में कुछ और कार्यकर्ता भी जुडे थे. इस से सारे भारत हितैषी आप ही आप छनकर सामने आ गए. जिन के कंधों पर संगठन खडा करना और फैलाना संभव हुआ.

(छः)बहुसंख्य संघ का स्वयंसेवक

बहुसंख्य संघ का स्वयंसेवक ही आपात्काल का प्रतिकार करने और उसका अंत करने आगे बढकर कार्य करने आया था. अपने पासपोर्ट को दाँव पर लगा कर कार्य कर रहा था. हमारे नेतृत्व ने भी, चतुराई से, कुछ स्वयंसेवकों के नाम आगे करते हुए,अन्य कार्यकर्ताओं की पहचान सुरक्षित रखकर अभियान चलाया था. प्रसिद्धि विमुखता के संघ संस्कार के कारण इसका ऐतिहासिक सूक्ष्म विवरण भारतीय समाचार माध्यमों में शायद ही प्रचारित हुआ है.

स्वयंसेवक को ठोस कार्य में ध्यान और समय देने के बाद प्रचार की आदत ही नहीं है. वैसे प्रचार का तंत्र भी जानना पडता है; और संघ का प्रामाणिक, शाखा में गया स्वयंसेवक काम करना जानता है, प्रचार करना नहीं. उसके लिए ठोस काम से समय निकाल कर प्रचार करना अनुचित होता है.
बहुसंख्य स्वयंसेवक अननुभवी युवा ही थे. मैं भी पी.एच.डी. कर रहा था. व्यस्त ही था.

(सात) समस्या का हल:

यह ऐतिहासिक विवरण मेरी वैयक्तिक जानकारी और स्मृति पर आधारित है. पर निम्न कार्यकर्ताओं ने विभिन्न उत्तरदायित्व स्वीकार कर ठोस काम किया था. ये नाम (हिन्दू फिलॉसॉफी इन ऍक्शन–लेखक डॉ. महेश मेह्ता ) पुस्तक से लिए गए हैं. और भी कार्यकर्ता होंगे ही. संघ में अविज्ञात वीर ही बहुसंख्य होते हैं. और नाम करने के बदले काम करने में विश्वास करनेवाले होते हैं. तो इन उल्लिखित नामों की कुल संख्या भी एक हिमशैल की शिखा मात्र ही है.

(आठ) कार्यकर्ताओं की सूची:

एस आर हीरेमथ (Illinois), , श्री. कुमार पोद्दार (Michigan), डॉ. हसमुख शाह (CT) , डॉ. फारुख प्रेसवाला (Indians for Democracy- NY) , डॉ. मुकुन्द मोदी (NY), रवि चोप्रा (NJ), डॉ. महेश मेहता (NJ), अंजली पंड्या (NJ), सुभाष मेहता(NY), राम सचदेव (NY), जितेन्द्र कुमार (D C) डॉ. राम गेहानी (D C) प्राणजीवन भाई पटेल (N Y), डॉ. शैख (NY) डॉ. अमित मित्रा (NC), डॉ. मनोहर शिन्दे, (CA), गौरांग वैष्णव ( CT), रमेश पटेल (CT ) डॉ. रोमेश दिवान (NY), डॉ. राम प्रकाश अगरवाल (MA), डॉ. मधुसूदन झवेरी, (MA) शरण नन्दी. इत्यादि . इन सभी को साथ देनेवाले भी अनेक कार्यकर्ता थे. मैं कुछ मित्रों को अवश्य भूल ही रहा हूँ.

(नौ) डॉ. सुब्रह्मण्यन स्वामी का संसद प्रवेश

उसी अभियान के इतिहास में, डॉ. सुब्रह्मण्यन स्वामी का अचानक संसद में प्रवेश कर, तुरंत अलोप हो जाने का समाचार बडा आश्चर्य चकित करनेवला था. मुझे शिवाजी का पिटारे में बंद हो कर, भाग जाने वाला ऐतिहासिक प्रसंग याद दिला गया था.

अनुमानतः इस समाचार ने ही इन्दिरा के आत्म विश्वास पर क्ठोर प्रहार किया होगा. स्वामी जी मेरे घर भी रुके थे. एक स्वयंसेवक की भाँति मेल जोल से और आत्मीयता से रहे थे; एक सबेरे देखा कि, अपने हाथ से चाय बनाकर पी रहे थे. एक स्वयंसेवक का पारिवारिक भाव व्यक्त हो रहा था.
मुझे बाद में, ना. ग. गोरे जी का आतिथ्य और सारथ्य करने का अवसर भी मिला. स्वामी तिलक जी का आतिथ्य करने का सौभाग्य भी दो बार मिला था.

(दस) ग्रीष्म में मेरा भारत प्रवास

७६ की ग्रीष्म की छुट्टियों में मेरा भारत जाना हुआ, तो, मा. भिडे जी (विश्व विभाग संघ प्रचारक) के आदेश पर काफी प्रचार साहित्य मा. माधव राव मुले जी को पहुँचाने का काम सौंपा गया. मुम्बई पहुँचने पर मेरे शाखा कार्यवाह श्री. शरद लिमयेजी की सहायता से, मुझे मा.माधव राव जी से भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. कुछ पुस्तकें और साहित्य पहुँचाने में मुझे गिरगांव, मुम्बई के प्रचारक श्री करंबेलकरजी माधव राव जी से भेंट करने ले गए थे.

उसी अवसर पर, मा. केदारनाथ जी सहानी, मा. मोरोपंत पिंगले इत्यादि नेतृत्व की भेंट भी कर पाया था. सारे भेष बदले हुए थे. मोरोपंत जी को पहली बार बिना मूछे देखा. उनकी ठहाका मार हँसी-विनोद की शैली याद आ गयी. तुरंत पहचान भी नहीं पाया. मुझे माधव राव जी ने उनके निकट सोफेपर बैठाकर कुशल क्षेम पूछा. अमरिका में चलते अभियान का वृत्त सुना. कुछ प्रश्न पूछे. ऐसा कुछ कुछ याद आ रहा है. (दो भेंटे कुछ धुंधली सी याद आ रही हैं.)

उसी प्रवास में, मुम्बई के, गिरगांव के एक सभा कक्ष में आयोजित विश्वविद्यालयीन छात्रों की बैठक में मेरा मराठी में बौद्धिक हुआ था. अंत में छात्रों के प्रश्न भी हुए. एक विशेष प्रश्न, जो शासक की कुरसी से प्रभावित हो पूछा गया था.
प्रश्न था, यह आपात्काल शासन की कुरसी पर बैठी व्यक्ति कडा प्रभाव नहीं दरशाता? आप क्या मानते हैं ?

मेरा उत्तर था: “प्रभाव उस नेतृत्व का सोचिए , जो बिना किसी सत्ता की कुरसी, मुझे अपने ही खर्च से भारत लाता है? { वैसे मेरा भारत जाना निजी कारणों से भी था.} आप छात्रों को भी सभा में उपस्थित होने, वह भी स्वेच्छा से प्रेरित करता है?
आप भी यहाँ किस प्रेरणा से प्रेरित होकर आये हैं ?
मैं भी अंशतः उसी प्रेरणा से प्रेरित हो कर आया हूँ.
उस प्रेरणा की शक्ति का अनुमान कीजिए. यही आश्चर्य है.
नेतृत्व ही ऐसा , कि जिस कुरसी पर बैठे, वह कुरसी ही प्रभाव धारण कर लेगी.
यह विक्रमादित्य का आसन है.
इन्दिराजी जिस दिन कुरसी से उतरेगी, उनके प्रभाव का अंत होगा.
सोचिए, आप किस प्रेरणा से भय रहित होकर इस सभा में आए ?
जो नेतृत्व बिना किसी कुरसी इतनी उठा पटक करवा सकता है, अमरिका में भी अभियान चलवा सकता है, उस प्रभाव के विषय में क्या कहोगे?
तो प्रश्न करनेवाला स्वयंसेवक और अन्य स्वयंसेवक भी हँसने लगे थे.

4 Responses to “इन्दिरा गांधी घोषित आपात्काल में , अमरिका का संघ स्वयंसेवक”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    बहन शकुन्तला जी क्या कहूँ, कुछ सूझ नहीं रहा है. पर भाग्यवशात संस्कारी माता-पिता और अच्छे लोगों की संगत वो भी उचित समयपर मिलती गयी. भारत में भी और अमरिका में भी. बंधुभाव से भी बढकर अंगांगीभाव या आत्मीयता का भाव जगा. ऐसा भाग्य कम लोगों को मिलता देखा है. उचित समय पर उचित सम्पर्क.
    जिससे दिशा और प्रोत्साहन दोनो मिलते ही गए. यह ईश्वर की कृपा ही मानता हूँ.
    अपनी त्रुटियाँ और चद्दर के छेद मैं ही जानता हूँ.
    और फिर मानव सहज गलतियाँ भी कर सकता हूँ; करता भी हूँ.
    आप की शुभेच्छाओं के लिए हृदयतल से आभार.
    कुछ असमंजस में —पर विनम्र मधुसूदन.

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  2. Mohan Gupta

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक राष्ट्रवादी संस्था हैं। भारत द्रोही और हिन्दू द्रोही संस्थाओ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रभाव कम करने के लिए इन संस्थाओ ने संघ को बदनाम किया। डॉ मधुसूदन जी ने संघ के बारे में जो अपने स्मरणो को जो लिपिबद किया हैं वैसे ही अनुभव कई अन्य व्यक्तियों के भी हैं। ऐसे ही अनुभव एक पत्रकार श्री जफ़र इर्शाद का हैं जिन्हे संघ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और संघ को एक हिन्दू साम्प्रदायिक संस्था समझते थे। १० जुलाई २०११ को फतहेपुर के पास मालवा गांव के निकट एक रेल दुर्घटना हुई थी। श्री जफ़र इर्शाद जी ने उस दुर्घटना के बारे में अपने पत्र को बिस्तर से बताना था। जब बह दुर्घटना स्थल पर पहुंचे तो देखा के कुछ लोग लाशो को हटा रहे थे और लोगो को चाय, बिस्कुट ,रोटी , और सब्जिआ बाँट रहे थे। बह कोई सरकारी कर्मचारी नहीं थे। पता करने पर मालूम हुआ के यह लोग संघ के सदस्य हैं और अपने घरो ,से अपने ख़र्चे पर सारा सामान ला रहे थे। एक संघ कार्यकर्ता जिसकी कपडे की दूकान थी बह कफ़न मृतिक परिवारों को दान में दे रहा था. पत्रकार श्री जफ़र इर्शाद जी ने उस समय संघ का मानव स्वरुप देखा था जो लोगो को नहीं बताया जाता। डॉ.मधुसूदन जी ने संघ के बारे में लेख लिख कर बहुत अच्छा काम किया हैं और लोगो को संघ की वास्तविकता बताई हैं।

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      प्रिय मित्र श्री मोहन जी गुप्ता.
      नमस्कार.
      आप ने समय देकर आलेख पढा और विस्तृत टिप्पणी भी दी.
      आप ने सही अर्थ निकाला है.
      संघ का वास्तविक उद्देश्य बताया है.
      बहुत बहुत धन्यवाद.

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  3. शकुन्तला बहादुर

    शकुन्तला बहादुर

    आदरणीय मधुसूदन जी ,
    बस इतना ही कहूँगी कि इस आलेख के माध्यम से आपके देशप्रेम सम्बंधी विचारों और कार्यकलापों द्वारा आपके जीवन का जो दूसरा पक्ष उद्घाटित हुआ है , उसने आपके वर्चस्वी व्यक्तित्व के प्रति मेरे मन की श्रद्धा को द्विगुणित कर दिया है।
    आपके इस मनस्वी , वर्चस्वी एवं यशस्वी व्यक्तित्व को मेरा सादर नमन स्वीकार हो । परम प्रभु आप पर कृपालु होकर
    उत्तम स्वास्थ्य , अक्षय ऊर्जा और सुदीर्घायु प्रदान करें – यही कामना एवं प्रार्थना है ।

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