हिन्द और पाक की बातचीत टली

-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-

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पच्चीस अगस्त को हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिवों के स्तर की बातचीत होने वाली थी । इस प्रकार की द्विपक्षीय बातचीत दोनों देशों में पिछले कई दशकों से हो रही है । स्तर अलग अलग होता है। कभी प्रधानमंत्री स्तर की तो कभी विदेश मंत्री स्तर की । लेकिन वर्तमान बातचीत इससे भी छोटे स्तर की थे । इसमें केवल विदेश सचिव ही बैठने वाले थे । ऐसी द्विपक्षीय बातचीत में दोनों देशों के बीच जो मसले लम्बित हैं, उन पर चर्चा होती है ताकि उनका कोई हल निकल सके । नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी आये थे । तब उनकी भारत के प्रधानमंत्री से भी बातचीत हुई थी । तभी चर्चा हुई होगी कि दोनों देशों के बीच जो समस्याएं १९४७ के बाद से अभी भी लम्बित हैं , उनके संतोषजनक समाधान के लिये सिलसिलेवार बातचीत प्रारम्भ की जाये । लेकिन ऐसी बातचीत में पहले ग्राउंडवर्क करना पड़ता है । विदेश सचिव इसी काम के लिये मिलते हैं ।

लेकिन पाकिस्तान भारत के साथ लम्बित विषयों पर जब भी कोई द्विपक्षीय बातचीत करता है , उससे पहले उसका दिल्ली स्थित दूतावास सक्रिय हो जाता है । वह बातचीत से पहले जम्मू कश्मीर राज्य में से कश्मीर घाटी में रहने वाले कुछ भारतीय नागरिकों को बुलाता है । ये वे नागरिक होते हैं जो खुल्लमखुल्ला भारत विरोधी कामों में ही नहीं लगे होते बल्कि आतंकवादियों के साथ इनके तार भी जुड़े होते हैं । कश्मीर घाटी में पाकिस्तान , आतंकवादियों और अलगाववादियों की दो तरीक़े से सहायता करता है । चोरी छिपे हथियार देता है और खुलेआम उनके तथाकथित सिविल सोसायटी के नेताओं को अपने दिल्ली स्थित दूतावास में बुला कर घाटी के मुसलमानों में उनके सामाजिक स्तर और प्रतिष्ठा को बढ़ाता है । पाकिस्तान , हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं को कश्मीर घाटी के मुसलमानों की, सिविल सोसायटी कहता है । हुर्रियत कान्फ्रेंस के तीनों धड़ों को , कश्मीर घाटी के मुसलमानों में प्रचारित करना होता है कि पाकिस्तान सरकार जब भी भारत सरकार से बात करती है तो सबसे पहले उनसे सलाह मशविरा करती है । इससे इन नेताओं का उनके अपने समाज में रुतबा बढ़ता है । यह एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक युद्ध है , जिसमें पाकिस्तान अपनी सहायता इन हुर्रियत के बूढ़ों की ख़ातिरदारी करके करता है । आतंकवादी को हथियार और हुर्रियत को प्रचार मुहैया करवाकर पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ छद्म युद्ध पिछले कई सालों से चला रहा है ।

इस बार भी पाकिस्तान के दिल्ली स्थित दूतावास ने विदेश सचिव स्तर की बैठक से पहले श्रीनगर के हुर्रियत कान्फ्रेंस के नेताओं को बातचीत के लिये दिल्ली बुला लिया । केवल बुलाया ही नहीं बल्कि इसका प्रचार भी किया । क्योंकि पाकिस्तान द्वारा हुर्रियत को साथ लेकर किये जाने वाले इस ड्रामे का मनोवैज्ञानिक लाभ हुर्रियत के जनाधारविहीन नेताओं को तभी मिलता है यदि इस का ज़ोर शोर से घाटी के मुसलमानों में प्रचार भी किया जाये । यही कारण है कि हुर्रियत के नख दन्त विहीन नेता पाकिस्तान द्ूतावास द्वारा भेजे गये इस निमंत्रण पत्र को कई दिन तक सिर पर मुकुट की तरह धारण कर जेहलम के एक कदल से दूसरे कदल पर घूमते रहते हैं । यह परम्परा पिछले कई साल से चलती आ रही है । लेकिन दिल्ली इस पर मौन साधे रहती थी ।

इस बार पाकिस्तान दूतावास ने जब हुर्रियत के इन बूढ़ों के आगे दिल्ली में दस्तरख़ान सजाया तो भारत सरकार ने इसका सख़्त विरोध किया । भारत सरकार ने पूछा कि बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली है। पाकिस्तान सरकार चाहे तो बातचीत से पहले अपने यहाँ तालिबान से लेकर क़ादरी -इमरान खान तक से सलाह मशविरा कर सकती है । लेकिन वह भारतीय नागरिकों से इस विषय पर सलाह मशविरा करे , यह मान्य नहीं हो सकता । भारतीय नागरिक भी ऐसे जो सीधे सीधे अलगाववादी-अातंकवादी गतिविधियों में लगे हों । यह तो सीधे सीधे पाकिस्तान द्वारा भारत के अन्दरूनी मसलों में दख़लन्दाज़ी करने के बराबर होगा, जिसकी अनुमति किसी भी देश को नहीं दी जा सकती । इसका अर्थ तो यह हुआ कि पाकिस्तान ,भारत के साथ बातचीत करते हुये, भारत के ही कुछ नागरिकों को बातचीत का तीसरा पक्ष बनाना चाहता है और वह यह काम चोरी छिपे नहीं बल्कि खुले आम कर रहा है। कोई भी स्वाभिमानी देश, अपने देश में इस प्रकार किसी दूसरे देश को दख़लन्दाज़ी की अनुमति नहीं दे सकता।

लेकिन या तो पाकिस्तान सरकार इस सीधी सी बात को समझ नहीं रही थी या फिर समझने के बाबजूद भारत के अन्दरूनी मामलों में सीधे सीधे हस्तक्षेप करने के लिये हर हालत में बजिद थी । ये दोनों स्थितियाँ भारत को विकल्पहीनता की ओर ले जा रही थीं । यदि पाकिस्तान को इस बात की ही समझ नहीं है कि दो देशों में द्विपक्षीय वार्ता का तरीक़ा क्या होता है , तब उससे बातचीत का कोई लाभ नहीं है । यदि वह भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत में भारत के कुछ नागरिकों या समुदाय की ओर से बोलने का अपना अधिकार समझता है , तब उससे बातचीत करने का अर्थ होगा स्वयं ही अपने देश में कश्मीर के अलगाववादियों की सहायता करना । इसलिये भारत सरकार ने समय रहते ही पाकिस्तान सरकार को चेता दिया था कि वह हुर्रियत कान्फ्रेंस के नाम पर कश्मीर घाटी में अपनी हरकतें बन्द करे,  लेकिन इसके बावजूद श्रीनगर से कुछ नागरिक दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास में पहुँचे । पाकिस्तानी राजदूत ने उनका गर्मजोशी से स्वागत ही नहीं किया बल्कि बन्द कमरों में उनसे लम्बी बातचीत भी की । क्या बातचीत हुई इसका खुलासा न तो पाकिस्तानी राजदूत ने किया और न ही श्रीनगर के उन मुलाक़ातियों ने । यह पाकिस्तान की खुल्लमखुल्ला चुनौती ही नहीं थी बल्कि शिमला समझौता का भी उल्लंघन था , जिसमें दोनों देशों ने आपसी विषय परस्पर बातचीत से सुलझाने का निर्णय किया था ।

भारत सरकार ने दिल्ली में पाकिस्तान के राजदूत को विदेश मंत्रालय बुलाकर , उसकी इस करतूत पर केवल विरोध प्रदर्शन ही नहीं किया बल्कि पच्चीस अगस्त की द्विपक्षीय वार्ता ही रद्द कर दी । पाकिस्तान को शायद इस बात की आशंका नहीं थी कि भारत इस सीमा तक जायेगा । उसे लगता था कि पहले की सरकारों की तरह केवल रिकार्ड के लिये दिल्ली विरोध करेगी और वार्ता भी जारी रहेगी । शायद वह यह भी टैस्ट करना चाहता था कि नई सरकार अपनी विदेश नीति में , ख़ासकर पाकिस्तान को लेकर विदेश नीति में पहले से चले आ रहे एजेंडा पर ही चलती रहेगी या फिर नये सिरे से अपना नया एजेंडा निर्धारित करेगी । पहले वाला एजेंडा तो अमेरिका और पाकिस्तान ने मिल कर तय किया हुआ था , भारत सरकार उसमें भारत के लिये निर्धारित भूमिका का निर्वाह कर देती थी । लेकिन अब नया एजेंडा दिल्ली ने ख़ुद तय किया है । यदि वार्ता करनी है तो पाकिस्तान को दिल्ली के अपने दूतावास में अलगाववादी हुर्रियत कान्फ्रेंस के तथाकथित नेताओं की भीड़ एकत्रित करने की परम्परा बन्द करनी होगी । यह नहीं हो सकता की शान्ति वार्ता दिल्ली से और उसी के दौरान आश्वासन कश्मीर घाटी के अलगाववादी गुटों को कि डटे रहो , हम आपके साथ हैं ।

दिल्ली में नवाज़ शरीफ़ देख कर गये थे कि मोदी युग आ गया है । अब शायद पाकिस्तान व हुर्रियत कान्फ्रेंस दोनों को ही पता चल गया होगा कि मोदी युग के आने का क्या अर्थ है । लेकिन दुनिया की पल पल की घटना को सूंघ लेने वाला अमेरिका भी इस संकेत को बख़ूबी समझ गया होगा । पता चला है कि वह भी नये सिरे से कोशिश कर रहा है कि बातचीत शुरु हो । लेकिन नरेन्द्र मोदी ने वार्ता का भारतोन्मुखी एजेंडा तय कर दिया है । अब देखना केवल यह है कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही इसे कितना जल्दी समझ लेते हैं।

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