अभिनय की परिभाषा गढ़ गए इरफान

आंखों से प्रभावपूर्ण सहज अभिनय करने वाले अभिनेता इरफान खान अब नहीं रहे। गंभीर बीमारी से लड़ते हुए उन्होंने जिस कदर इंग्लिश मीडियम फिल्म से वापिसी की थी उससे हिन्दुस्तानी सिनेमा का हौंसला जगा था मगर अफसोस। उत्कृष्ट अदाकारी की परिभाषा गढ़ने वाला यह विलक्षण कलाकार अपना सफर पूरा नहीं कर पाया। काश पान सिंह तोमर में गरजते इरफान, पीकू के खुशमिजाज इरफान पर्दे पर बार बार आ पाते। उनके अभिनय का चरम कितना विलक्षण होने वाला था ये हम सब सहज कल्पना कर सकते हैं मगर ये हो न सका। थियेटर और सिनेमा ने अपना चमकदार सितारा खो दिया है। 54 साल के इरफान की अभिनय यात्रा पर आप समग्रता से दृष्टि डालिए। आप महसूस करेंगे कि एक विलक्षण अभिनेता बहुत देर के बाद देश दुनिया की नजर में आया अन्यथा इरफान तो श्रीकांत व भारत एक खोज के समय भी उत्कृष्ट थे। वास्तव में थियेटर की दुनिया से ऐसे ही नगीने निकलते हैं लेकिन हर कोई इरफान जैसा गहरा कहां हो पाता है। ये निरंतरता, ये काम में डूबना सबको कहां आता है। स्मिता पाटिल, राजकुमार, ओमपुरी, अमरीश पुरी सरीखी धारा के इरफान आज के दौर के श्रेष्ठतम अभिनेता थे। वे भारत एक खोज, चंद्रकाता , चाणक्य के समय से प्रभावपूर्ण थे मगर अभिनेता का संघर्ष और मेहनत का दौर पलटकर लोग तक देखते हैं जब वह स्टारडम हांसिल कर चुका होता है। इरफान ने भी टीवी से सिनेमा तक पहुंचते हुए अभिनय की निरंतर छाप छोड़ी। एक किक्रेटर जब पिच पर जम जाता है तो निरंतर चैके छक्कों की बारिश की ओर अग्रसर होता है। इरफान ने भी मकबूल, हैदर, लाइफ इन मेट्र्रो करते हुए अभिनय की पिच समझ ली थी जिसके बाद उन्होंने ताबड़तोड़ पारी खेली। प्रतिभासंपन्न निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने पान सिंह तोमर में उनके अंदर का जादू निकालकर हम सबके सामने परोसा। फिल्म में 45 साल के इरफान ने फौज के रंगरुट, स्टीपल चेज दौड़ते एथलीट के साथ चंबल के बागी सरदार का जीवंत किरदार अदा कर पूरे देश का ध्यान खींचा। इस फिल्म में इरफान ने पान सिंह तोमर के किरदार को इतनी संजीदगी से अदा किया कि लोग चंबल की डकैत समस्या के असल कारणों की चर्चा करने लगे। कैसे वीरभाव से भरपूर इस भूमि में कई होनहार युवा एथलीट पानसिंह तोमर की तरह गलत रास्ते पर चले जाते होंगे यह लोग सोचने को मजबूर हुए। इरफान की यह फिल्म मसाला फिल्मों पर भी भारी पड़ी। जैसे आज तक दिलीप कुमार, राजकुमार के संवाद याद किए जाते हैं वैसे ही इस फिल्म के संवादों के लिए इरफान भी हमेशा याद किए जाएंगे। “बीहड़ में तो बागी होते हैं और डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में” डायलाग इरफान को अमर कर गया है। पर्दे पर बिल्लू बारबर में हमने उन्हें एक केश शिल्पी के किरदार में देखा तो पीकू में वे एक टूर आॅपरेटर थे। सामान्य जीवन के इन किरदारों को सिने पर्दे पर वे ऐसे जी गए कि जैसे वे असल जिंदगी में यही सब हों। इसी अदाकारी ने खान त्रयी के दौर में इरफान की फिल्मों का एक अलग दर्शक वर्ग खड़ा किया जो निरंतर फैलता चला गया। वे आम जिंदगी के किरदारों से आगाज करते हुए पर्दे पर छाते चले गए। लंच बाॅक्स जैसी अलग कहानियां दर्शकों को खूब पसंद आयीं। इरफान की ये फिल्में हिन्दी सिनेमा की एकरसता को भंग करते हुए एक अलग स्वाद का अनुभव कराने वाली रहीं। इन फिल्मों ने ये स्थापित कर दिया कि अब सितारा छवि अकेले सुदर्शन नैन नक्श से तय नहीं होगी, जो अभिनय के समंदर में डूबकर दिखाएगा अब ताज का हकदार वही होगा।

इस धारा की फिल्मों की सफलता ने आज बाॅलीवुड में नवाजुद्दीन सिद्वीकी, आयुष्माना खुराना, आर राजकुमार सरीखे कलाकारों को नए मौके दिए हैं। हिन्दी फिल्मों के फलक का विस्तार हुआ है। व्यावसायिक धारा के कलाकारों की तरफ से मिल्खा सिंह, दंगल जैसी फिल्में इसी परिवर्तन का नतीजा हैं। वास्तव में इरफान की सहज प्रभावपूर्ण गहरी अदाकारी ने अभिनय क्षेत्र को आगे करने का काम किया। हिन्दी सिनेमा में इन परिवर्तनों के बीच वे चमकते चले गए। हिन्दी मीडियम में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था जैसे गंभीर विषय पर मनोरंजक फिल्म करके दर्शकों का दिल जीत लिया। ये फिल्म हर घर हर व्यक्ति को अपनी फिल्म लगी। फिल्म में इरफान हर मध्यमवर्गीय इंसान की दुविधाओं और परेशानियों को मनोरंजन करते हुए सिने कैनवास पर उतार ले गए। हिन्दी मीडियम का करोडों भारतीयों को पसंद आना आना इरफान की खींची लकीर का सम्मान था आगे तो वे फिर चंद मिनिट के लिए टीवी पर एड के लिए आते तो भी हम सबके बीच अपनी छाप छोड़ते रहे। उनका अंदाज यूं अलग रहा कि राजकुमार , दिलीप कुमार , अमिताभ बच्चन की तरह इरफान की संवाद अदायगी भी सिने समारोहों में नकल की जाने लगी। सामान्य चेहरे मोहरे और बड़ी आंखों वाला ये कलाकार वास्तव में अलग रास्ता बना रहा था मगर ये सुनहरा सफर अधूरा रह गया। काश उस जानलेवा बीमारी से लड़कर जैसे इंग्लिश मीडियम के लिए वे पर्दे पर उतरे वैसा हमेशा उतर सकते मगर ये हो न सका। विलक्षण अभिनय क्षमता वाला ये कलाकार नियति के कारण आधे सफर से अचानक आज चला गया है लेकिन उनके तय किए गए मील के पत्थरों के रुप में उनका विलक्षण अभिनय सिने संसार में हमेशा जीवित रहेगा।

Leave a Reply

%d bloggers like this: