हिमकर श्याम

भारतीय सेना एक प्रतिष्ठित और भरोसेमंद संगठन है. भारतीय सेना को इस बात का श्रेय प्राप्त है कि वह अपने प्रति जनता के सम्मान, विश्वास और भरोसे को बनाये रखने में अब तक सफल रही है. समय-समय पर सेना में उठनेवाले भ्रष्टाचार के मामले भरोसे की इस नींव को हिलाने का काम करते हैं. पिछले कुछ अरसे में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें सेना के अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह के रक्षा सौदों में दलाली के सनसनीखेज खुलासे ने तो सबको चौंका दिया है. यह खुलासा कई मायने में महत्वपूर्ण है. यह सामान्य रिश्वत का मामला नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है. यह शीर्ष स्तर पर भ्रष्ट तत्वों की आसान पहुंच और लॉबिंग के दबाव को उजागर करता है. स्पष्ट संकेत है कि सेना में वरिष्ठ स्तर पर किस कदर भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा चुका है.

रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार देश और जनता के भरोसे और सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं. अपने खुलासे में जनरल सिंह ने स्वीकार किया है कि 600 घटिया गाड़ियों की आपूर्ति को मंजूरी देने के लिए एक व्यक्ति ने सीधे उन्हें 14 करोड़ रूपए के रिश्वत की पेशकश की थी. पूरा प्रकरण साल 2010 का है. इस खुलासे से एक बार फिर यह बात साबित हो गई है कि हथियारों के व्यापारी किस कदर व्यवस्था में अपनी पैठ बना चुके हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में उनका कितना बड़ा हाथ है. पूर्व रक्षा मंत्री जसवंत सिंह ने भी माना है कि रक्षा सौदों में लॉबिंग होती है.

भ्रष्टाचार अब इस हद तक पहुँच गया है कि उसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा असर पड़ने लगा है. रक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार देश की सुरक्षा और अखंडता के लिए गंभीर खतरा है. सशस्त्र सेनाओं के साथ अन्य संस्थाओं जैसा व्यवहार देश की हित में नहीं है. सेना बेहतरीन साधनों से ही अपना कार्य बेहतर ढंग से संपादित कर सकती है. यदि रक्षा मंत्रालय में भ्रष्टाचार का खेल इसी तरह चलता रहा तो देश की सुरक्षा का क्या होगा? इन हालत में क्या हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा दुरूस्त रह सकती है? रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार सीधे तौर पर देश और जांबाज सैनिकों की जान से खिलवाड़ है. कई बार सेना के जांबाजों को जान गंवा कर इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है. देश के लिए जान देने के लिए जो हजारों युवक सेना में भर्ती होते हैं और जो देश की सीमा की रक्षा के लिए ही नहीं, देश के अंदर अशांति से निपटने के लिए अपनी जानें दे रहे हैं उनके मनोबल पर इन घोटालों का क्या असर पड़ेगा, इस पर विचार की आवश्यकता है.

देश अपनी एकता और सुरक्षा को लेकर ऐसी गंभीर चुनौतियां का सामना कर रहा है, जैसा इसके पूर्व कभी भी नहीं किया था. पिछले दशकों में देश के आंतरिक और ब्राह्य सुरक्षा में काफी तेज गिरावट आयी है. चीन, पाकिस्तान और नेपाल से बढते खतरों के मद्देनजर सेना के आधुनिकीकरण की सख्त जरूरत है. अपनी सीमाओं की सुरक्षा और घरेलू व बाहरी मोर्चों पर दमखम बनाए रखने के लिए हमें परमाणु हथियार भी चाहिए, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र और सुरक्षा तकनीकी भी.

यह कोई पहला मामला नहीं है जब रक्षा सौदों में दलाली की बात सामने आयी है. आजादी के बाद से ही रक्षा सौदों में दलाली और रिश्वतखोरी के मामले सामने आते रहे हैं. 1948 में जीप घोटाल के रूप में दलाली का पहला मामला सामने आया. इस मामले में प्रतिरक्षा मंत्री बीके कृष्ण मेनन दोषी पाए गये. 1988-89 में बोफोर्स का मामला उछला. बोफोर्स मामले में स्वीडिश कंपनी से कम गुणवत्ता वाली तोपों की खरीद के आरोप लगे थे. उक्त कम्पनी ने इन तोपों कि सप्लाई के लिए 64 करोड़ की दलाली चुकाई थी. इन तोपों का इस्तेमाल देश की रक्षा के लिए किया जाना था. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे. बोफोर्स प्रकरण के बाद रक्षा सौदों को लेकर कई तरह के दलाली के आरोप लगते रहे हैं.

ताबूत घोटाला 1999 में सामने आया. कारगिल मे जब हमारे सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना खून बहा रहे थे, ठीक उसी वक्त हमारे रक्षा मंत्रालय के अधिकारी शहीदों के लिए ताबूत खरीदने तक में घोटाले करके अपनी तिजोरी भरने में लगे हुए थे. 2001 में इजरायल के साथ बराक मिसाइल की खरीद में गड़बड़ी का मामला सामने आया था. इस मामले में समता पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष आरके जैन, जार्ज फर्नांडीस, जया जेटली और नेवी के अधिकारी सुरेश नंदा पर घोटाले के आरोप लगे. 2005 में 16 हजार करोड़ के पनडुब्बी घोटाले का मामला उजागर हुआ. तहलका प्रकरण भी रक्षा सौदों में होनेवाली दलाली से जुड़ा था. तहलका की टीम ने पूरे तंत्र में व्याप्त दलाली का भंडाफोड़ किया था. गंभीर आरोप होने के बावजूद इनसे वैसे नहीं निपटा गया जैसे निपटा जाना चाहिए था. ज्यादातर सैन्य घोटालों में लीपापोती की ही कोशिश होती रही है. कभी सेना की छवि बचाने के नाम पर तो कभी किसी अघिकारी या नेता को बचाने के नाम पर सेना में घोटालों का पूरा सच सामने नहीं आ पाता है.

इस सनसनीखेज खुलासे के बीच कुछ सवाल अनुत्तरित रह गए हैं. यह खुलासा पहले क्यूँ नहीं किया गया? जनरल वी.के. सिंह ने रिश्वत की पेशकश करने वाले पर तत्काल कोई कार्रवाई क्यूँ नहीं की? जनरल सिंह का कहना है कि रिश्वत वाली बात उन्होंने रक्षा मंत्री को बताई थी. जिस समय जनरल ने रक्षा मंत्री को सूचित किया था, उस समय मंत्रालय की ओर से सीबीआई को जाँच के आदेश क्यूँ नहीं दिए गए?

देश की राजनीति आज जिस तरह भ्रष्टाचार और निहित स्वार्थों से संचालित है, वह सेना और प्रकान्तर से राष्ट्र के लिए की अशुभ संकेत लिए हुए है. भारत दुनिया के उन देशों में है जो अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षा पर खर्च करता है. रक्षा सौदों में अधिकाधिक पारदर्शिता बरतना और बिचौलियों को दूर रखना फिलहाल रक्षा मंत्रालय के सामने बड़ी चुनौती है.

Leave a Reply

%d bloggers like this: