धार्मिकता का विपरीत नहीं है धर्मनिरपेक्षता

religionसाधारणतयाः हम यह समझते है कि धर्मिकता का विपरीत धर्मनिरपेक्षता है, परन्तु यह सही नहीं हैं। चलिये पहले कुछ शब्दों की व्याख्या कर लें ताकि हम इस जटिल प्रश्न को बडे ही साधारण ढंग से सुलझा सकें। प्रथम शब्द है निजकारी या निजहितवादी इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जो अपने निजी स्वार्थ को पहले रखता है तथा बाद में दूसरों के स्वार्थ को, ऐसा व्यक्ति अपने निजी हितों के लिए दूसरों के हितों को छीनने से भी पीछे नहीं हटता। शब्द संख्या दो परकारी या परहितवादी अर्थाथ वह व्यक्ति जो अपने हितों के बारे में न सोचकर दूसरों के हितों के लिए कार्य करता है। अब आते है तीसरे शब्द की ओर जो है सर्वकारी या सर्वहितवादी यह वह व्यक्ति है जो अपने और पराये में साधारणतया अन्तर नहीं करता और निजी हित तथा पर हित में कोई अन्तर नहीं समझता। ऐसा व्यक्ति जो सबके हित के बारे में सोचता है जिसमें उसका निजी हित भी सम्मलित है, आप इसे धर्मनिपेक्ष का समानार्थी भी कह सकते है।

अब जब हम इन तीन शब्दों से परिचित हो गए है, हमें कुछ और शब्दों की परिभाषाओं को भी आत्मसात कर लेना चाहिए। समूह, हमारा संसार समूहों में विभाजित है, और हम किसी न किसी समूह के अंग है अर्थात सदस्य है। इन समूहों के कुछ उदारहण इस प्रकार है व्यक्ति इस समूह में केवल एक ही सदस्य आता है वह मनुष्य स्वयं है, परिवार इसमें आपके निजी सम्बन्धी सम्मिलित है, इसी प्रकार जाति, समाज, धर्म (धर्म का यहॉ अर्थ आम भाषा मे प्रचलित शब्द जो एक विशेष समूह को दर्शाता है से लिया गया है, अर्थाथ हिन्दु, मुसलिम, ईसाई और इसका किसी अन्य व्याख्या से कोई समंबन्ध नहीं है), राष्ट्र तथा मानवता आती है। स्तर, इस शब्द का अर्थ है कि व्यक्ति किसको अपना धेय मानकर कार्य कर रहा है या सोच रहा है। अर्थात् एक धार्मिक व्यक्ति अपने धर्म तथा धर्म से जुडे लोगो के बारे में सोचता है, इसका मतलब यह हुआ कि उसकी सोच का स्तर धर्म है। इस स्तर के आधार पर शब्द बदल जाते है, अर्थात निजकारी व्यक्ति जब धार्मिक स्तर पर सोचता या कार्य करता है तो वह धार्मिक बन जाता है जब वह राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करता है तो वह राष्ट्रवादी बन जाता है और वह व्यक्ति जो धार्मिक स्तर पर सर्वकारी होता है वह धर्मनिरपेक्ष कहलाता है, राष्ट्रीय स्तर पर सर्वकारी व्यक्ति संसारिक (या कोस्मोपोलिटन) कहलाता है। हर भाषा मे कई शब्दों की कमी होती है, और यह कहा गया है कि शब्द हमारी सोच को विकसित करते है शायद इसी कारण से हम कई तरह के व्यवहारों को पूरी तरह से व्याख्यायित नहीं कर पाते है। जैसे की राष्ट्रीय तथा धार्मिक स्तर पर परकारी व्यक्ति को क्या कहते है। वह व्यक्ति जो अपने राष्ट्र के हित के बारे मे न सोचकर दूसरे राष्ट्रों के हित के बारे में सोचे, और उसे क्या कहेंगे जो अपने धर्म तथा उसके लोगो के बारे मे न सोचकर दूसरों के धर्म तथा उनके लोगों के बारे में सोचे। इसलिए हमें दो नऐ शब्दों की व्याख्या करनी होगी। प्रधार्मिक इस शब्द का अर्थ है वह व्यक्ति जो अपने धर्म तथा उसके लोगों के बारे मे न सोचकर दूसरे के धर्म तथा हितों के बारे में सोचे। प्रराष्ट्रवादी वह व्यक्ति जो अपने राष्ट्र के हित के बारे मे न सोचकर दूसरो के राष्ट्रहित का समर्थक हो।

अब आते है मूल प्रश्न पर क्या धर्मिकता का विपरीत है धर्मनिरपेक्षता, तो इसका उत्तर देने के लिए हम इसके मूल शब्दों का प्रयोग करते है धार्मिक का उद्भव निजकारी शब्द के धार्मिक स्तर पर प्रयोग होने से हुआ है और धर्मनिरपेक्षता का मूल सर्वकारी सोच का धार्मिक स्तर पर उपयुक्त होने से है। इसलिये हम निजकारी परकारी तथा सर्वकारी शब्दों द्वारा समझने का प्रयास करते हैं। यदि हम गणितीय तर्कशास्त्र का प्रयोग करें तो हमें यह ज्ञात होगा कि निजकारी का विपरित सर्वकारी नही है, निजकारी का विपरीत परकारी है तथा निजकारी तथा परकारी इन दोनों को यदि हम एक साथ रखे तो हम यह कह सकते है कि इन दोनो का विपरीत है सर्वकारी, यानि की सर्वकारी निकारी या परकारी का विपरित न हो कर इन दोनों के समूह का विपरीत है। इसे हम कुछ इस प्रकार से समझ सकते है कि शाकाहारी का उलटा होता है मासांहारी परन्तु सर्वाहारी न तो शाकाहारी का विपरीत है और न ही मासांहारी का, यह इन दोनो का एक साथ है। सरल भाषा में कहा जाऐ तो असर्वाहारी का अर्थ है कि या तो वह व्यक्ति शाकाहारी है या मासांहारी। इसका मतलब यह है कि यदि एक व्यक्ति सर्वकारी नही है तो वह या तो निजकारी है या परकारी है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक नहीं है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष है वह व्यक्ति प्रधार्मिक भी हो सकता है।

मौजूदा परिप्रेक्ष्‍य में यदि हम इन शब्दों के जंजाल पर प्रश्न उठाएं, तो हम पाएंगे कि हम धार्मिक स्तर पर निजकारी न होने को(प्रधार्मिक) धार्मिक स्तर पर सर्वकारी होने से लेते है(धर्मनिरपेक्ष) जबकि वह व्यक्ति धार्मिक स्तर पर परकारी भी हो सकता है(प्रधार्मिक)। आज के वातावरण में तो हर व्यक्ति अपने आपको धर्मनिरपेक्ष बताने मे देर नहीं लगाता है। क्या धर्मनिरपेक्ष होना इतना आसान है वो भी हमारे जैसे देश में जो कि विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है, और इतनी सारी विवि‍धता वाला देश है।

व्यक्ति परकारी कैसे बनता है, इसका कारण एक ही है वह है लोभ। व्यक्ति के पास कई प्रकार के लोभ होते है जिसमें एक लोभ दूसरे लोभ पर हावी हो जाता हैं। जैसे कि प्रसिद्धि का लोभ जो व्यक्ति को परोपकार करने पर मजबूर करता है, जिसमे उसका निजी हित सम्मलित नहीं होता हैं। कभी-कभार यह लोभ व्यक्ति को ले डूबता है ऐसे कितने ही हादसे आए दिन होते है जिसमे प्रसिद्धि पाने के लिए लोग ऐसे कार्य करने लगते है जो कभी-कभार उनको स्वयं इस दुनिया से उपर भेज देते है। राजनीति को ही ले लिजिए, इसमें वोट का लोभ होता है जो कि व्यक्ति को कई ऐसे कार्य करने पर मजबूर करता है जोकि शायद उसके जाति समाज और धर्म तथा कभी कभी राष्ट्र के हित से हटकर कार्य करने पर मजबूर करता है। ऐसी स्थिति में क्या ऐसे व्यक्तियों को धर्मनिरपेक्ष कहना सही होगा।

-अनूप शर्मा

6 thoughts on “धार्मिकता का विपरीत नहीं है धर्मनिरपेक्षता

  1. धार्मिक विषय पर लिखा गया गूढ़ लेख है. लेख का शीषक लेख के भाव को बिलकुल ठीक से बताता है. यह लेख उन रजनीतिक्यों के लिए है जो चिल्ला चिल्ला धर्म को बदनाम करते है. जिन्हें सेकुलर या धर्मनिरपेक्षता का मतलब नहीं पता होता है और इन्ही शब्दों पर अपनी रोटी सेकते है.

  2. लेखक सिर्फ शब्दों में उलझकर रह गया है ! आज कल धर्मके कट्टर लोग मरने -मारने पर उतारू हो रहे है ! जातीय हिंसा में इन्सान
    जानवर से बदत्तर हो जाता है ! आज कल इंसानियत से ज्यादा धर्मके पाखंड को ज्यादा अहमियत दी जाती है !धर्म एक ऐसा ब्लाक होल
    है उसमे सभी समाते जा रहे और वास्तविकता को दरकिनार कर दिया जा रहा है ! पुराणी कहानियां , चमत्कारी धार्मिक किस्से जिसका
    वास्तव से या सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है फिर भी लोग आंख मूंदकर उसपर विश्वास करते जा रहे है ! कुछ धर्म में लाखो धार्मिक
    दूत दुनियामे आकार गए ,ऐसा बताया जाता है ! लेकिन सभी दूत ,देव -देविया अपने अपने देशो में ही जन्म ले सके है ! इसका सीधा मतलब
    होता है की सब किस्से कहानिया मन गडंथ है और इसका वास्तविक ता से कोई लेना देना नहीं है ! विशिष्ठ धर्मके देवता गन सिर्फ उसी देश
    में क्यों जन्मे ? ऐसा किसी को सवाल किसीके मन में नहीं आता ? भैया आधुनिक दुनियामे जियो और पुराने विचार धर्मके भ्रामक कल्पना
    को तिलांजलि दे दो ! हमें आनेवाले समय में नयी बीमारियाँ से सिर्फ वैद्न्यानिक बचा सकते है कोई धर्मके पंडित या मौलवी नहीं !

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