क्या अभी एक और बड़ा पलायन देखना बाकी है

अपने आस पास और दूरदराज़ मित्रों और रिश्तेदारों से फोन पर बात करके एक बात सामने आई है कि घरेलू सहायकों ने पलायन नहीं किया है। मार्च और अप्रैल में लगभग सभी को पूरी तनख्वाह और सरकार से अनाज वगैरह मिल गया था। तीसरे लाक डाउन में केंद्र सरकार ने घरेलू सहायकों को काम करने की इजाज़त दे दी थी परन्तु उमसे RWA को हस्तक्षेप की इजाजत देदी थी। दिल्ली सरकार ने RWA के हस्तक्षेप को निरस्त कर दिया था और लोगों को अपनी मर्जी से काम पर सहायकों को लाने की छूट दी।

दिल्ली में RWA कुछ ढीली पड़ी परंतु जगह जगह से RWA के अजीब अजीब नियमों के बारे में जानकारी मिली है,जो अख़बारों में भी आती रही थी। छोटे शहरों में RWA इतनी महत्वपूर्ण नहीं है इसलिये वहाँ कंटेनमैंट ज़ोन को छोड़कर सामान्य रूप से काम होना  तीसरे लाकडाउन में शुरू हो गया था। मुंबई में ये लोकल ट्रेन पर निर्भर हैं इसलिये वहाँ से तो यही ख़बर है कि ये सहायिकायें काम पर नहीं आ रही हैं। बंगलूरू के कुछ इलाकों में आने लगी हैं कहीं RWA ने, कहीं लोगों ने स्वयं प्रतिबंधित कर रखा है।

दिल्ली NCR में भी कुछ लोग डरे हुए हैं कुछ RWA के प्रतिबंध भी हैं इसलिये बहुत कम सहायिकायें काम पर लौटी हैं। गौतम  बुध नगर के जिला अधिकारी  ने नॉएडा RWA  को किसी प्रकार से काम करने आने वालों को रोकने के अधिकार से वंचित कर दिया है  तब भी व मनमाने नियम बना रही है।.  गुरुग्राम में भी यही स्थिति है।

इस लाकडाउन ने उन लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है जो एक गिलास पानी भी उठकर नहीं पीते थे पर बुजुर्गों और बीमारों को जो काफी हद पर इन पर निर्भर थे बहुत मुश्किलों का सामना  करना  पड़ा है।

अब एक सवाल यह ज़रूर उठता है कि जिन लोगों ने अपने डर से या RWA की नियमावली से या  अपनी बढ़ी हुई कार्य क्षमता की वजह से इन्हें काम पर आने से रोका हुआ है वो कितने समय तक इन्हें तनख्वाह देंगे..  ज़्यादा से ज्यादा कुछ  मदद कर दें पर पूरी तनख्वाह लोग देंगे ऐसी संभावना नहीं है। महानगरों में ये  कामगार भी स्थानीय नहीं है इनकी बहुत  बढ़ी संख्या है तो क्या  अभी एक और बड़ा पलायन देखना बाकी है!

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