यह किसान आंदोलन है या कुछ और?

रीता सिंह

महीनों से किसान के नाम पर आंदोलन चल रहा है। इसके चलते किसानों की भीड़ ने आसपास के जनजीवन को भी प्रभावित किया है। सब जगह रास्ते रास्ते बन्द, लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक तो फिर भी गनीमत थी, लेकिन किसान आंदोलन की आड़ में 26 जनवरी को जिस प्रकार राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हुआ, उसे राष्ट्रीयता के मापदंडों के आधार पर बेहद गिरी हुई हरकत कहा जा सकता है। किसानों को बदनाम करके कुछ देश विरोधी लोग इस देश की एकता और अखंडता को तोड़ रहे हैं। यह स्वाभाविक रूप से कहा जा सकता है कि राष्ट्र ध्वज का अपमान किसी को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। आंदोलन की आड़ में जो लोग अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। उनसे पूरे देश की अखंडता को नुकसान पहुंच रहा है।
जिन किसानों को लोग अन्नदाता कहते हैं, उनके प्रति समाज के बड़े हिस्से के मानसिक सोच में व्यापक परिवर्तन आया है। कुछ लोग आज आंदोलन करने वाले किसानों को लोग नफरत की नजर से देख रहे हैं। सवाल यह है कि इस प्रकार की स्थिति बनाने के लिए जिम्मेदार कौन हैं। गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा में पुलिस के उन जवानों पर और उनके परिजनों पर क्या बीती होगी, जो भीड़ की हिंसा का शिकार बन गए। वह तो किसानों की सुरक्षा के लिए ही तैनात थे। अगर किसानों को पुलिस की जरूरत होती है तो पुलिस उनकी मदद के लिए भी पहुंचती है। और कितने ही पुलिस के जवान खुद भी किसानों के परिवार से होंगे । फिर पुलिस पर करना किसी सोची समझी साजिश का हिस्सा ही ज्यादा लगती है। यह कृत्य देश का किसान तो कदापि नहीं कर सकता।जो किसानों की नहीं हो सकती।
एक परिवार का मुखिया अपने परिवार के सदस्यों के लिए अगर अच्छा खाना ले कर आता है और उस परिवार के सदस्यों को समझ नहीं आता। तब परिवार के कुछ सदस्य अपने मुखिया के खिलाफ खड़े हो जाए और परिवार को नुकसान पहुंचाने की सोचें तो मुखिया क्या करेगा? क्या वह अपने ही परिवार के लोगों से हेल्दी खाना वापस ले लेगा? मेरे विचार से कोई भी ऐसा नहीं करेगा। परिवार के सभी सदस्यों की भलाई में ही उसकी भलाई है। एक मुखिया कभी अपने परिवार का बुरा नहीं चाहेगा। चाहे परिवार के लोग कितना ही उसके खिलाफ क्यों ना खड़े हो जाएं। यही हाल देश का है। कुछ लोग सिर्फ मोदी जी के विरोध में किसानों की आड़ में देश की शांति भंग करना चाहते हैं। अब ये किसानों की दूरदर्शिता पर निर्भर है कि वो कितना समझ पाते हैं ओर देश के अहम नागरिक होने का फर्ज कितना निभा पाते हैं। इस आंदोलन को समाप्त करने के लिए सभी को शांति से बैठ कर सोचना चाहिए कि इस बिल से किसको फायदा है और किसको नुकसान? दूसरों के बहकावे में न आकर अपने दिमाग का इस्तेमाल करने से ही कोई समाधान निकल सकता है। अगर आपको ये बिल समझ में नहीं आता तो दो साल इंतजार कीजिए। जिस पर आपको भरोसा है उसे वोट देकर जिताएं। और फिर देखें कि वो आपके विचारों पर कितना खरा उतरता है, लेकिन किसी देश विरोधी व्यक्ति के साथ मिल कर अपने ही देश की अखंडता को मत तोड़िए। अपने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान मत कीजिए। अपनी ही पुलिस पर हमला मत कीजिए। देश की संपत्ति को नुक्सान मत पहुंचाइए। ये देश हम सबका है। इस देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि हम सबकी है। जरा सोचिये एक किसान का बेटा अगर पुलिस में है तो उन पिता और बेटे की मानसिक स्थिति क्या होगी? जिन लोगों ने भी किसानों की आड़ में राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया है। क्या इस देश के किसानों को ये देख कर अच्छा लगा होगा? इस देश का किसान देश का एक अहम व्यक्ति है और वह कम से कम अपने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कभी बर्दाश्त नही कर सकता। फिर क्यों अपनी ही मातृभूमि के वीर शहीदों के बलिदान का अपमान सहन किया? जो अभी तक हुआ उसे भूल कर अपने और अपने परिवार, अपने देश की भलाई के बारे में सोचें और देश विरोधी लोगों से दूर रहें। इसी में हम सबकी भलाई है।

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