क्या विपक्षी दलों की एकता साकार होगी?

ललित गर्ग

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणामों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के लिये एक सकारात्मक वातावरण बनता हुआ दिखाई दे रहा है। इन चुनावों से पहले तक राजनीतिक परिवेश में विपक्ष के सशक्त एवं प्रभावी होने की संभावनाओं पर सन्नाटा पसरा हुआ था। विगत 4 नवम्बर को राजधानी में 13 विभिन्न राजनीतिक दलों  की संयुक्त बैठक हुई। जिसमें इन दो राज्यों के चुनाव परिणामों पर चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि मतदाताओं का भाजपा को लेकर मुड एवं मन बदल रहा है, यह बदलाव विपक्षी दलों के भविष्य की राजनीति के लिये नवीन संभावनाओं का द्योतक हैं। नवीन बन रही स्थितियां जहां विपक्षी दलों के लिये खुशी का सबब है, वहीं भाजपा के लिये चिन्ता का कारण भी है। भाजपा के प्रति मतदाता की मानसिकता इस बात की स्वीकारोक्ति है कि वे समय पड़ने पर राजनीति को नई दिशा देने में समर्थ हैं मगर विपक्षी दल मतदाता के इस बदले मन के अनुरूप अपनी पात्रता विकसित करने को तत्पर है या नहीं? विपक्षी दलों का आगे का रास्ता क्या है? इस पर राजनैतिक दलों को ही विचार करना होगा एवं स्वयं की पात्रता को विकसित करना होगा।
इन दोनों प्रांतों के चुनावों ने सभी राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया है, मतदाताओं ने अपने हिस्से की जिम्मेदारी इस प्रकार निभाई है कि उन्होंने हरियाणा और महाराष्ट्र में पिछले पांच साल से सत्ता कर रही भाजपा को चेतावनी दी है कि उसकी केन्द्र की सरकार की सफलताओं को राज्यों में पार्टी एक सीमा तक ही भुना सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे इधर-उधर बिखरे विपक्ष को सद्बुद्धि आयेगी और वह संघीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम किसी ठोस वैकल्पिक नेतृत्व को उकेरेगा? केवल 13 समान विचार वाले दलों के एक साथ आने से तब तक कुछ हासिल होने वाला नहीं है जब तक कि आम जनता में यह विश्वास  पैदा न हो कि विपक्षी दल उसकी उन आकांक्षाओं पर खरा उतर सकते हैं जो किसी कारणवश वर्तमान सत्तापक्ष ने पूरी करने में कोताही बरती है।
बदले हालात में भी कांग्रेस लाभ लेने को तत्पर दिखाई नहीं दे रही है। उसकी दुर्बलता भाजपा की स्थिति मजबूत करती रही है। लेकिन मतदाता इन स्थितियों के बीच कोई नया नेतृत्व चुन ले तो कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन प्रश्न यहां भी खड़ा है कि केवल 13 समान विचार वाले दलों के एक साथ आने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। विपक्षी दलों को जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने की तैयारी करने होगी। महंगाई, बेरोजगारी, नारी अस्मिता पर मंडरा रहे खतरे, आर्थिक असंतुलन, गरीबी, भुखमरी, प्रदूषण जैसे विभिन्न ज्वलन्त विषयों पर वोट मांगने या किसी तरह का उजाला करने की बजाय पाकिस्तान का मामला हो या कश्मीर का अथवा एनआरसी का, इन्हीं राष्ट्रीय मुद्दों पर सामान्य व्यक्ति को भाजपा ने आकर्षित करने का यत्न किया, इन राष्ट्रोन्मुख मुद्दों के बावजूद महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने मोहभंग के वातावरण में जनादेश दिया है। कहीं-ना-कहीं भाजपा ने अपने इन चुनावी मुद्दों से आम जनता को लुभाने की कोशिश की, जो नाकामयाब रही।
दिल्ली में 13 विपक्षी दलों की संयुक्त बैठक में श्री शरद यादव ने यह स्वीकार जरूर किया है कि महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनावों ने नया रास्ता दिखाया है मगर इस रास्ते पर चलने के लिए क्या उनके पास ऐसा कोई विचार है, कार्यक्रम है, भविष्य का रोडमैप है, जिससे विपक्षी दल उस पर सरपट दौड़ते हुए अपनी कल की कलह से बाहर आ सकें और विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी अपने परिवारवाद की ऐंठ को छोड़कर सड़क की राजनीति करने के लिए तैयार हो सके। सभी विपक्षी दलों को चुनाव परिणामों की समीक्षा के पश्चात गलतियों को सुधारते हुए विपक्षी एकता को सफल बनाने में जुट जाना होगा। अनेक विरोधाभासों एवं विसंगतियों के बीच राजनीतिक उजालों को तलाशना होगा। सभी विपक्षी दलों के बीच राजनीति नहीं, स्वार्थ नीति देखने को मिलती रही है। शत्रुता एवं कड़वाहट भरे दौर को पीछे छोड़ते हुए विपक्षी दलों को एक-दूसरे से हाथ मिलाने के लिये तत्पर होना होगा। छोटे एवं क्षेत्रीय दलों को एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें मांजने की बजाय भारतीय राजनीति का परिवेश बदलने के लिये हाथ मिलाने को तत्पर होना होगा, अन्यथा अवसरवादिता, नकारात्मकता और सिद्धांतहीनता से बड़ी राजनीति नहीं चलाई जा सकती। पर इस रणनीति में पूर्ण अनुकूलता किसी को भी नहीं मिलेगी। अवसर का लाभ और अपनी मान्यताओं पर कायम रहना, दोनों बातें चाहते हैं, जो विपक्षी एकता की सबसे बड़ी बाधा है। कहावत है ”राजनीति में नामुमकिन शब्द नहीं होता।“ इसलिये भारत के लोकतांत्रिक धरातल में विपक्षी दल चाहे तों उनके सामने एक संभावनाओं भरा उजाला है।
भारतीय राजनीति की विडम्बना रही है कि यहां सत्ता हासिल करने के लिये सभी तरह के दांवपेंच चलते हैं, लेकिन जनता की परेशानियों को दूर करने, जनभावनाओं एवं जनता के विश्वास को जीतने के लिये कोई दांवपेंच नहीं चलता। सात दशकों से जनाकांक्षाओं को किनारे किया जाता रहा है और विस्मय है इस बात को लेकर कोई चिंतित भी नजर नहीं आता। उससे भी ज्यादा विस्मय यह है कि हम दूसरांे पर सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाते रहे हैं, उन्हीं को गलत बताते रहे हैं और हम उन्हें जगाने का मुखौटा पहने हाथ जोड़कर सेवक बनने का अभिनय करते रहे हैं। मानो छलनी बता रही है कि सूप (छाज) में छेद ही छेद हैं। एक झूठ सभी आसानी से बोल देते हैं कि गलत कार्यों की पहल दूसरा (पक्ष) कर रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए स्वयं कुछ भी कर गुजरने को तैयार हंै और इस तैयारी में विचारधाराएं, आदर्श हाशिए पर जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में दागदार चरित्रों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। एक गन्दी मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है, जबकि यहां तो गांव/नगर की हर गली के मोड़ पर हर दल का नेता दीयासलाई लिए खड़ा है, सभी कुछ नष्ट करने के लिए। इसलिये भविष्य का जो राजनीति चरित्र बन रहा है उसके प्रति भी लोगों को एहसास कराना होगा, जहां से राष्ट्रहित, ईमानदारी और नए मनुष्य की रचना, खबरदार भरी गुहार सुनाई दे। अगर ये एहसास नहीं जगाया तो कौन दिखाएगा उनको शीशा? कौन छीनेगा उनके हाथ से दियासलाई? कौन उतारेगा उनका दागदार चोला? कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि देश की सियासी फिजां को बदलने में विपक्षी दलों को अधिक ईमानदार एवं पारदर्शी होना होगा। भाजपा की तुलना में विपक्षी दलों पर दाग ज्यादा और लम्बे समय तक रहे हैं। विपक्षी दलों को न केवल अपने बेदाग होने के पुख्ता प्रमाण देना होगा, बल्कि जनता के दर्द-परेशानियों को कम करने का रोड मेप तैयार करना होगा। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि विपक्षी दल अपने को, समय को अपने भारत को, अपने पैरों के नीचे की जमीन को पहचानने वाला साबित नहीं कर पाये हैं। जिन्दा कौमें पांच वर्ष तक इन्तजार नहीं करतीं, हमने चैदह गुना इंतजार कर लिया है। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है, या सहिष्णुता कहें? जिसकी भी एक सीमा होती है, जो पानी की तरह गर्म होती-होती 50 डिग्री सेल्सियस पर भाप की शक्ति बन जाती है। देश को बांटने एवं तोड़ने वाले मुद्दे कब तक भाप बनते रहेेगे? भाजपा को चुनौती देनी है तो विपक्षी दलों को अपना चरित्र एवं साख दोनों को नये रूप में एवं सशक्त रूप में प्रस्तुति देनी होगी।प्रेषकः

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