अमेरिका में बर्बरता पर उतरे आतंकी

संदर्भः- अमेरिका के लास वेगास में आतंकवादी हमला-

प्रमोद भार्गव

अमेरिका के लास वेगास शहर में म्यूजिक कंसर्ट में आए संगीत प्रेमियों पर की गई गोलीबारी में 58 लोग मारे गए है, जबकि 400 से ज्यादा घायल हैं। इस आतंकी घटना के वक्त सभागर में करीब 22 हजार लोग मौजूद थे। इस घटना की जुम्मेबारी आतंकवादी संगठन आईएस ने ले ली है। आतंकवाद का यह घिनौना चेहरा यूरोप में इस्ताम्बुल से लेकर ओस्लो, मेड्रिड, लंदन, पेरिस और जर्मनी के बाद एक बार फिर लास वेगास में दिखाई दिया है। ऐसा ही हमला पिछले साल बांग्लादेश के एक रेस्तरां में भी घटा था। भारत तो आतंक की चपेट में रोज ही आता रहता है। लास वेगास के अगले दिन ही श्री नगर के हवाई अड्डे के पास बीएसएफ के शिविर पर आतंकी हमला हुआ है। इसमें सुरक्षाबलों ने तीन जैस-ए-मोहम्मद के तीन आतंकियों को ढेर कर पांच किलोग्राम विस्फोटक बरामद किया है। अमेरिका में हुए इस ताजा हमले के बाद अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने बयान दिया है कि कतर, तुर्की और पाकिस्तान को तुरंत अमेरिका को आतंकवादी देश घोषित कर देना चाहिए।

अमेरिका के राष्ट्रपति डाॅनाल्ड ट्रंप ने दुनिया से इस्लामिक आतंकवाद समाप्त करने की जो इच्छा-शक्ति जताई थी, उसे अब सख्ती से अमल में लाने की जरूरत है। इसी सख्ती की ओर पैंटागन के पूर्व अधिकारी ने इशारा किया है। वैसे भी अमेरिका में यह पहला हमला नहीं है। 11 सितंबर 2001 के बाद अप्रैल 2007 में वर्जीनिया टेक विश्व विद्यालय में एक बंदूकधारी ने 32 लोगों को भूंन दिया था। दिसंबर 2012 में कनेक्टिकट के न्यू टाउन स्थित विद्यालय में एक व्यक्ति ने 26 छात्रों और 3 शिक्षकों की हत्या कर दी थी। जून 2016 में आॅरलैंडो के एक नईट क्लब में 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। आॅरलैंडों का हमलावर भी स्टीफन क्रैग की तरह आईएस से जुड़ा था। इन हमलों से साफ होता है कि अमेरिका में चरमपंथी युवक और मानसिक रूप से त्रस्त नस्लवादी स्वचालित हथियारों से खून-खराबा करने को बेताव हुए जा रहे हैं। एक तरह से वहां ईसाई बनाम मुस्लिम धर्मयुद्ध छिड़ सा गया है।

धार्मिक आतंकी मानसिकता से ग्रस्त मुसलमान हों या चरमपंथी राष्ट्रीयता से पीड़ित प्रतिक्रियावादी हों, इनका खात्मा जरूरी है, क्योंकि इनके प्रभाव और विस्तार के चलते दुनिया की व्यापक सोच का दायरा सिमटने लगा हैं आज दुनिया का हरेक देश आतंकी हमले की आशंका से ग्रसित है। यूरोप हो या एशिया आंतकी हमलों के हमलावर मुस्लिम निकल रहे हैं। आंतक के फैलते दायरे के चलते यह समझ से परे लग रहा है कि आखिर इसका अंत कहां है ? कहीं भी आतंकी घटना घटने के बाद अकसर यह सुनने को मिलता है कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन हकीकत यह है कि हर हमले का हमलावर मुस्लिम निकलता है, जो  इस्लाम का कट्टर अनुयायी होता है। इस लिहाज से ट्रंप ने ठीक ही कहा था कि दुनिया से इस्लामिक आतंकवाद नेस्तनाबूद करना है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैश्विक आतंकवाद पर शिकंजा कसने के नजरिए से अहम् मुहिम चलाई हुई है। हालांकि लास वेगास के हमलावर स्टीफन कै्रग व उसकी महिला सहयोगी मैरीलो डैनली के संबंध में यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि वाकई में इनका आतंकी संगठन आईएस से संबंध था। यह अंदाजा केवल आईएस द्वारा हमले की जिम्मेदारी लेने के कारण जताया जा रहा है। अमेरिका में बढ़ते राजनीतिक और नस्लीय धु्रवीकरण से प्रेरित शख्स भी स्टीफन क्रैग हो सकता है। वैसे भी अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद श्वेत और अश्वेत चरमपंथियों में टकराव बढ़ा है। ट्रंप स्वयं श्वेत समूहों को गोलबंद करते दिखाई दे रहे हैं।

यह वैश्विक आतंकवाद की ही सह-उपज है कि पूरी दुनिया में धार्मिक, जातीय और नस्लीय कट्टरवाद की जड़े मजबूत हो रही हैं। बावजूद इस्लामिक आतंकवाद नियोजित ढंग से फल-फूल रहा है। इस्लाम में अन्य धर्म और संस्कृति को अपनाने की बात तो छोड़िए, इस्लाम से ही जुड़े भिन्न समुदायों में परस्पर इतना वैमन्स्य बढ़ गया है कि वे आपस में ही लड़-मर रहे हैं। शिया, सुन्नी, अहमदिया, कुर्द, रोहिंग्यार, पठान, उईगर और बलूच इसी प्रकृति का कू्ररतम पर्याय बने हुए हैं। इसी वजह से खाड़ी के देश इराक, सीरिया, ईरान, कुबैत, लीविया, मिश्र, फिलीस्तीन, व सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान और वजीरावाद में नागरिक विद्रोह शक्तिशाली हो रहे हैं। इसीलिए इनसे मुकाबला करने और इन्हें अपनी मांद में घेरे रखने में स्थानीय सरकारें नाकाम साबित हो रही हैं। नतीजतन कई देश अमेरिका के मित्र राष्ट्रों और रूस का दखल स्वीकारने को मजबूर हो रहे हैं। हालांकि परोक्ष रूप से इन अंतर्कलहों का लाभ उठाकर यही देश अपने हथियार भी इन देशों में खपा रहे हैं। इस कारण गोला-बारूद प्रदायक देश आतंकी हिंसा की आग को किसी न किसी रूप में सुलगाए भी रखना चाहते हैं। यह स्थिति आंतरिक सुरक्षा के लिए आतंक से पीड़ित देशों में चुनौती को बढ़ा रही है।

यही वजह रही कि एक समय इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम रूस, अमेरिका, चीन, पाकिस्तान और यूरोप के कुछ अन्य देशों ने भी किया। परंतु जब यही आतंकवाद इन देशों के लिए भी भस्मासुर साबित हुआ तो इनके कान खड़े हो गए। नतीजतन इस पर नियंत्रण के उपायों के लिए यही देश मजबूर हो गए। इस स्थिति के निर्माण में संयुक्त गणराज्य रूस के विघटन और अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस में हुए आतंकी हमलों ने पृष्ठभूमि तैयार की। एक समय चीन पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को सरंक्षण दे रहा था, लेकिन जब 2011 में चीन के सीक्यांग प्रांत में इस्लामिक आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया गया तो चीन सतर्क हो गया। ये आतंकी पाकिस्तान से प्रशिक्षित थे, गोया चीन ने पाक को परिणाम भुगतने की चेतावनी देते हुए, तुरंत लगाम लगाने का हुक्म दे दिया। चीन में उईगुर मुस्लिमों ने आतेकी वारदातें की थीं, जिन्हें पाक के वजीस्तिान में इस्लामिक मूवमेंट आॅफ ईस्टर्न तुर्किस्तान में प्रशिक्षण मिला था। चीन के सीक्यांग प्रांत में उईगुर मुस्लिमों की आबादी 37 फीसदी है, जो अपनी धार्मिक कट्टरता के चलते चीनी ‘हान‘ समुदाय पर भारी पड़ते हैं। हान बौद्ध धार्मावलंबी होने के कारण कमोबेश षांतिप्रिय हैं। अब चीन इन पर कुरान की आयतें पढ़ने पर भी अंकुश लगा रहा है।

वैश्विक भूगोल में जो अशांति हिंसा व अस्थिरता अंगड़ाई ले रही है, उसके दो प्रमुख कारण हैं। एक इस्लामिक कट्टरता, दूसरा नागरिक विद्रोह। साफ है, जो भी संघर्ष है, वह आंतरिक है। इन्हें गृह-युद्ध भी कह सकते हैं। इन देशों में ये हालात अलोकतांत्रिक धर्म आधारित सरकारों के वजूद के कारण बने। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इन अंतर्कलहों को उकसाने में एक समय अमेरिका की भी मुख्य भूमिका रही। अमेरिका ने परमाणु और जैविक हथियारों के बहाने पहले इराक पर हमला बोला और अपने बूते समर्थ हो रहे देश को बर्बाद किया। अफगानिस्तान, सीरिया और लीबीया का भी यही हश्र किया गया। जबकि इन देशों में बाहरी दखल के पहले कमोबेश उदारवादी सरकारें थीं। बाहरी हस्तक्षेपों के चलते पहले तो इनकी आंतरिक सरंचना ध्वस्त की गई। फिर राज्य-सत्ता की भरपाई के लिए चरपंथी इस्लामिक ताकतों को सत्ता पर काबिज करा दिया। जबकि इन देशों में निवार्चन के जरिए लोकतांत्रिक ढांचा विकसित करने की जरूरत थी। अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया और इराक इन्हीं गलत नीतियों का अभिशाप भोग रहे हैं। गोया, ज्यादातर इस्लामिक मध्य-पूर्वी देशों में चरमपंथी सरकारों की सेनाएं और नागरिक विद्रोही आपस में लड़ रहे हैं। दरअसल इनमें से ज्यादातर देशों में शासक तो सिया हैं, लेकिन इनकी आबादी में सुन्नियों का प्रतिशत ज्यादा है। इसीलिए बहुसंयक सुन्नी, शियाओं को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में आतंकवाद को लेकर संकट यह है कि 2011 से सीरिया में युद्ध चल रहा हैं, किंतु अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने इस संकट के लिए कोई प्रयास नहीं किया। भारत-पाक प्रयोजित आतंकवाद से पिछले तीन दशक से त्रस्त है, लेकिन अमेरिका और चीन हैं कि पाक पर कोई आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाते। इसके उलट वे सऊदी अरब, कतर, तुर्की और सीरिया में अलगाववादी विद्रोही गुटों को समर्थन दे रहे है। अरब में वर्चस्व की लड़ाई शिया बहुल ईरान और सुन्नी बहुल सऊदी अरब के बीच चल रही है। तुर्की के अपने हित हैं। इसने अपनी लंबी सीमा को खुला रखा है, ताकि यहां के लड़ाके सीरिया में प्रवेश कर सकें और सीरिया में असद विद्रोहियों को मजबूत करें। अमेरिका और ब्रिटेन भी असद सरकार को हटाने की मुहिम को ताकत देने के लिए असद विद्रोहियों की मदद करते रहे हैं। लेकिन जब इस्लामिक आतंक संगठन आईएसआईएस ने सीरिया के कई इलाकों पर कब्जा कर अपनी क्रूर प्रकृति दिखाई तो इन देशों के होश उड़ गए। सीरिया से असद को तो हटाया नहीं जा सका, उल्टे सीरिया अस्थिर हो गया। जब सीरिया के लोग यद्ध की विभीषिका से प्राण बचाने के लिए भागे तो यूरोपीय देश जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस व आस्ट्रिया ने इन्हें उदार एकजुटता दिखाते हुए शरणार्थी के रूप में शण दी। किंतु यही शरणार्थी अब इन देशों के लिए न केवल संकट का सबब बन रहे हैं, बल्कि आतंक का पर्याय भी बन रहे हैं। इस कारण इन देशों में मुस्लिमों के खिलाफ नाकारात्मक राय पनप रही है। यदि कालांतर में देशों में बढ़ती आंतरिक सुरक्षा को मजबूत नहीं किया गया तो आतंकवाद और आंतरिक सामसजिक तनावों पर नियंत्रण पाना कठिन होता चला जाएगा।

 

 

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