जीवन्त हिन्दु मत

गंगानन्द झा

 रामकृष्ण मिशन के विद्वान संन्यासी स्वामी समर्पणानन्द से मेरा परिचय उनकी रचनाओं के जरिए हुआ है। समर्पण के नाम से उनकी लिखी कई एक किताबें मुझे पढ़ने को मिली। पंचतंत्र, हितोपदेश और जातक कथाओं की शैली में लिखी गई ये पुस्तकें आध्यात्मिकता की बातें करती है, पर धर्म, मत का जिक्र नहीं होता।
LIVING HINDUISM– Scriptures,Philosophy, Practice बिलकुल अलग मिजाज की किताब है। यह पुस्तक हिन्दु मत के धर्मशास्त्र, दर्शन और आचरण का विहंगावलोकन प्रस्तुत करती है। मौजूदा समय में हिन्दु मत की जो तस्वीर राजनेताओं के द्वारा उभाड़ी जा रही है, उससे इस महान एवम् अनोखे धर्म के बारे में भ्रान्ति की भरमार है। । हिन्दुत्व के हालिया आक्रामक स्वरुप ने भोजन, पहनावे , राष्ट्रीयता जैसे नगण्य मुद्दों के साथ इस महान आध्यात्मिक मत की पहचान कायम कर इसे विकृत कर रखा है। सामान्य लोग तुच्छ बातों को दरकिनार कर मूल तत्व तक पहुँचने में कामयाब नहीं हो पाते कमजोर लोगों के लिए यह भयावह स्थिति है जबकि तटस्थ लोग इसे हास्य़ास्पद समझते हैं।इस सन्दर्भ में इस पुस्तक के इस समय प्रकाशन की एक तात्कालिक भूमिका है। इस महान धर्म की सही तस्वीर को प्रस्तुत करने की भूमिका यह पुस्तक बहुत सार्थक रुप से निभा सकती है। व्यवस्थित और सुगम, सहज रुप में धर्म तथा हिन्दु मत की प्रस्तुति इस पुस्तक के जरिे की गई है।
सामान्यतः हिन्दु देवियों. देवताओं, आचार- विचार. मन्दिर, तीर्थ और ढौंगी बाबाओं के साथ अपने धर्म को जोड़ा करते हैं। गाय और जात पात हिन्दु धर्म के साथ अभिन्न समझे जाते हैं। इस किताब के जरिए कहा गया है कि इनमें से एक का भी हिन्दु मत में कोई महत्व नहीं है। ये हिन्दु मत के सामाजिक आयाम हैं, धार्मिकता एवम्आध्यात्मिकता से इनका कोई सरोकार नहीं ।धर्म के साथ आध्यात्मिकता का चोलीदामन रिश्ता है. लेकिन रुढ़िवादिता, अन्धविश्वास, असहिष्णुताऔर साम्प्रदायिकता भी अनुयायियों को अपनी गिरफ्त में ले ले लेते हैं। इस पहलू की चर्चा इस पुस्तक में नहीं की गई है। हिन्दु मत के धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष का वर्णन बहुत ही वैज्ञानिक एवम् सहज तरह से इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है।
” सार्वभौम अस्तित्व की उपलब्धि के लिए संघर्ष धर्म की पहचान होता है. यह समय और स्थान द्वारा सीमाबद्ध वैयक्तिक उपस्थिति से निर्वैयक्तिक अस्तित्व की ओर की यात्रा है। यह इन परिधियों के परे होती है।” इस अवलोकन को लेखक की दो कृतियों Carving a sky), एवम् (Junglezen Sheru) में प्रतिपादित तथ्यों के आलोक में समझा जा सकता है। व्यक्ति की आकांक्षा अपने अस्तित्व को प्रसारित करने की होती है। मनुष्य इस मायनी में अन्य प्राणियों से विशिष्ठ है। मानवेतर प्राणी एक निर्दिष्ट क्षेत्र तक सीमित रहा करते हैं, लेकिन मनुष्य वृहत्तर क्षेत्र में प्रसारित होते रहने की आकांक्षा रखता है.। वह अमरत्व की कामना रखता है। शक्ति संचय के द्वारा उसकी वृद्धि होती है। वृद्धि होने से उसके अस्तित्व का प्रसार है। किन्तु अस्तित्व का प्रसार सार्थक रुप से तभी होता है जब व्यक्ति को अपनी शक्ति के सार की पहचान हो, अपना अनोखापन जाने बगैर वह अपने अस्तित्व का प्रसार करने में समर्थ नहीं हो सकता।
पुस्तक की रुपरेखा कुछ उद्धरणों के द्वारा समझी जा सकती है।

पुस्तक चार भागों में व्यवस्थित है। पहले भाग में हिन्दु धर्म की संक्षिप्त रुपरेखा पेश की गई है। दूसरे भाग में इस धर्म के धर्मग्रंथों का सिंहावलोकन पेश किया गया।तीसरा भाग हिन्दु मत के विभिन्न दर्शनों का वर्णन करता है और अन्तिम भाग में हिन्दु मत के भविष्य का अवलोकन किया गया है। मात्र 224 पन्नों में लेखक इन सारी बातों को सहज, बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत कर पाने में सफल हुए हैं।

ठेठ हिन्दु का जीवन अनगिनत देवी देवताओं और उतने ही अनुष्ठानों, परम्पराओं और रस्म-रिवाजों की छाँव में प्रवहमान रहा करता है। आधुनिक जीवन के द्वारा मनोगत किए हुए व्यक्तिगत लक्ष्यों ओर आकांक्षाओं को हासिल करने के लिए वह अपने बड़ों के पथ का अनुसरण करता है।
धर्म के बारे में साधारण.समझ यह है कि ऊपर बादलों में बैठा कोई ईश्वर है. जो वहाँ से हम पर नजर रखता है और हम पर खबरदारी कर रहा है। जब हम उसकी प्रार्थना करते हैं तो वह दयालु रॉबोट अथवा स्नेहशील दादा की तरह, हमारे पक्ष में सब कुछ लुटाने लगता है। हम इसे चमत्कार कहते हैं। और अगर हमें उनसे अनुकूल संकेत नहीं मिलता तो हम उन्हें भरपूर कोसने के हकदार होते हैं। वह भक्तों को वरदान और बुरे लोगों को दण्ड देता है। इसलिए जब हम उसकी वन्दना करें और चढ़ावा दें तो वे हमें अपने वरदान से धन्य करते रहेंगे। लेकिन वास्तविकता बिलकुल अलग है। धर्म बहुत ही गम्भीर तल पर प्रवहमान रहता है।
समावेशी धर्म होने के कारण हिन्दु धर्म को परिभाषित इस्लाम और ईसाई धर्मों की तरह करना बहुत कठिन है।
फिर भी हिन्दु में निम्नलिखित विश्वास अपेक्षित हैं—–
1, वेदों में वर्णित तथा हिन्दुओं के किसी भी पवित्र ग्रन्थ में वर्णित आध्यात्मिक सत्यों की स्वीकृति
2.आत्मा के मोक्ष-प्राप्ति के पहले तक शरीर बदलने वाली प्रकृति में विश्वास। यही जन्म-मृत्यु, अच्छा-बुरा- हर प्रकार के द्वन्द्व से स्वाधीन होने की अवस्था होती है।
3.विभिन्न धर्मों के पथों को पूर्णता प्राप्ति के पथ की स्वीकृति।

यह भ्रान्त धारणा है कि धर्म, खासकर हिन्दु मत, प्रतिकूल परिस्थितियों में सहारे के तौर पर उपयोग में आनेवाले विचार की प्रक्रिया के परिणाम स्वरुप विकसित होता है। धर्म एक जीवन्त अनुभूति है जो हमें विश्व-ब्रह्माण्ड की अन्तर्भूत प्रकृति से,, उसके अनुभवसिद्ध मूल्य के परे, अवगत करता है।
हिन्दु मत संसार में सार्थक जीवनयापन करने के पथ का संदेश देता है। वह संसार से मुक्त हो जाने का रास्ता भी सुझाता है। यों तो हर धर्म ही ऐसा करते हैं लेकिन हिन्दु धर्म दोनो रास्ते सुझाने के कारण विशिष्ट है। हिन्दु धर्म इस मायनी में अकेला है कि यह सम्पत्ति अर्जित करने और जीवन के सुख का उपभोग करने को, जब तक ये नैतिक अतिक्रमण नहीं करें, जीवन का सही लक्ष्य मानता है।
हिन्दु मत मानता है कि हर कोई विकास के समान स्तर पर नहीं होता. इसलिए प्रगति के लिए उन्हें अलग अलग रास्तों की जरूरत होती है। इसलिए आध्यात्मिक मुक्ति के प्राप्त करने के लिए असंख्य रास्तों को स्वीकृति दी गई है। इसलिए यह हर उस धर्म को मान्यता देता है, जो व्यक्ति को ज्ञान और शक्ति में विकसित होने में मदद करे, ताकि वह व्यक्ति भावनात्मक तथा आध्यात्मिक मुक्ति का भागीदार हो पाए। यह मान्यता अपने पड़ोसी को बर्दाश्त करने या उसकी उपस्थिति को मान लेना जैसा नहीं होकर उससे खुले रुप से मिलने जुलने और उसके सद्गुणों को ग्रहण करना होता है
सबों को स्वीकार और ग्रहण करने की मौलिक प्रकृति हिन्दु मत को समावेशी मत बना देती है।। इसकी तुलना में अन्य सारे धर्म एकान्तिक होते हैं। इसके कारण ये धर्म अक्सर दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं। केवल हिन्दु धर्म हीअतीत और भविष्य के सभी धर्मों को दिव्य तक पहुँचने का सही रास्ता मानता है और उनमें ,से प्रत्येक को अपना ही मानता है।
किसी भी धर्म की वाणी के चार पक्ष होते हैं ः दर्शन, पौराणिक कथाएँ,अनुष्ठान तथा नीति शास्त्र। दर्शन आध्याात्मिकता का पथप्रदर्शन करता है। पौराणिक कथाएँ इन विभिन्न दर्शनों को समझने में सहायक होती हैं।अनुष्ठान दर्शन के ऐसे ठोस स्वरुप होते हैं जिनका अभ्यास अपने आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाता है। नीति शास्त्र की भूमिका सांसारिक जीवन की आचार पद्धति की होती है।

धर्म का पालन तीन फॉर्मेट में से किसी एक फॉर्मेट में किया जाता है, अनुष्ठान, वादन और अनुभूति। हिन्दु धर्म शुद्ध रुप में अनुभूति का धर्म है। यह अनुभूति यहीं पर और अभी ही होनी चाहिए। यह अलग बात है किआध्यात्मिकता से सरोकार नहीं रखनेवाले हिन्दु मत के प्रवर्तक अपने अनुयायियों के पास इसे अनुष्ठान और वादन के मत के रुप में पेश करते हैं। यद्यपि ऐसी कोई भी आचार पद्धति नहीं है जो हिन्दु धर्म को परिभाषित कर सके।
हिन्दु मत में धर्म अथवा पथ समाज के वरिष्ठ लोगों द्वारा अनुसरित पथ पर आधारित होता है। सामान्यतः वे अनेक स्मृतियों में से किसी एक का अनुसरण करते हैं। किसी विशेष क्षेत्र से सम्बहन्ित कोई महान व्यक्ति जब नया पथ अपनाता है तो उसके अनुयायी भी ऐसा ही करते हैं।
हिन्दु धर्म में इकलौती एकीकृत संहिता नहीं हो सकती। इसलिए विविधता में एकता की अवधारणा भारतीय धर्म, दशन एवम् जीवनपद्धति का सार है। हिन्दु मत अपने द्वारा प्रतिपादितआध्यात्मिक सत्य के ऊपर एकाधिकार का दावा नहीं करता। इसका विश्वास है कि हम अपने आध्यात्मिक लक्ष्य तक किसी भी रास्ते से पहुँच सकते हैं।। इसलिए यह किसी भी मत को सम्मान के साथ स्वीकार करता है।
. किसी भी धार्मिक अथवा सामाजिक तंन्त्र केअनुष्ठान उसके सघन दर्शन (crystallised philosophy) होते हैं। अनुष्ठानों समारोहों वर्षिगाँठ और उत्सवो के माध्यम से व्यक्ति अपने समाझ से जुड़ा रहता है। इनके द्वारा विद्यार्थी अपने संस्थान और सैनिक अपने रेजिमेंट एवम् देश के साथ से घनिष्ठता महसूस करते हैं व्यक्ति के जीवन से अनुष्ठान निकल जाए तो वह विच्छिन्न महसूस करेगा और विभ्रान्त हो जा सकता है।
अध्यात्मविद्या के सिद्धान्त के रुप में हिन्दु मत में पाप की कोई भूमिका नहीं होती। इसके लिए सामान्य पद अधर्म है। अधर्म में लिप्त होने का अर्थ आचरण के विशेष संहिता का उल्लंघन होता है. चूँकि संहिता की प्रकृति स्थायी नहीं होती, उल्लंघन ईश्वर के प्रति नहीं हो सकते। इसलिए अधर्म को सामान्यतः एक भूल माना जाता है जिसका प्रायश्चित और सही आचरण के द्वारा निराकरण किया जा सकता है

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