‘ईश्वर का न्याय आदर्श न्याय है जिसमें सभी मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल मिलता हैः डा. नवदीप कुमार’

-मनमोहन कुमार आर्य,

आर्यसमाज धामावाला, देहरादून ऋषि दयानन्द के कर कमलों से स्थापित आर्यसमाज है जिसकी स्थापना सन् 1879 में हुई थी। विश्व की प्रथम शुद्धि इसी आर्यसमाज में हुई थी। मुहम्मद ऊमर नामक एक मुस्लिम बन्धु वैदिक धर्म की विशेषताओं एवं महत्व को जानकर स्वेच्छा से आर्य बने थे और उन्होंने अलखधारी नाम ग्रहण किया था। इस आर्यसमाज के दिनांक 1-7-2018 के रविवारीय साप्ताहिक सत्संग में प्रथम देवयज्ञ अग्निहोत्र आर्यसमाज के प्रधान डा. महेश चन्द्र शर्मा जी के पौरोहित्य में हुआ। डा. महेशचन्द्र शर्मा आज आर्यसमाज अपने अमेरिकावासी पुत्र श्री मनीष शर्मा, पुत्र वधु, पौत्र एवं पौत्री सहित सपरिवार उपस्थित हुए थे। यज्ञ में मुख्य यजमानों में श्री मुकेश शर्मा, एजीएम, पीएनबी, डा. विनीत कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष एफआरआई एवं प्राध्यापक श्री समर्थ बडोला सहित स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बालक बालिकायें भी सम्मिलित थे। यज्ञ सम्पन्न होने के बाद यज्ञ प्रार्थना एवं यजमानों को आशीर्वाद की परम्परा का वैदिक रीति से निर्वाह किया गया। इसके बाद आर्यसमाज के सभागार में भजन हुए। पहला भजन श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम की चार बालिकाओं ने गाया जिसके बोल थे ‘भगवान तेरी महिमा क्या खूब निराली है, एक घर में अंधेरा है एक घर में दीवाली है।’ आश्रम की 5 बड़ी बालिकाओं ने दो भजन गाये। पहला भजन था ‘कण कण में बसा प्रभु देख रहा, चाहे पुण्य करो चाहे पाप करो। कोई उसकी नजर से बच न सका चाहे पुण्य करो चाहे पाप करो।’ दूसरा भजन था ‘होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से, होते हैं जल्दी प्रसन्न भगवान यज्ञ से।’ भजनों की प्रस्तुतियों के बाद सामूहिक प्रार्थना हुई जिसे आश्रम के ही एक छोटे बालक शिवम् द्वारा प्रस्तुत की गई। प्रार्थना काफी लम्बी थी। उन्होंने जो प्रार्थना की उसमें यह भी शामिल था कि ‘ईश्वर के तुल्य ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है। वह ईश्वर सर्वव्यापक है। सृष्टि की आदि में वह वेदों का ज्ञान देता है। वह मनुष्यों के पाप व पुण्य कर्मों का फल देने वाला है। हमें ईश्वर की उपासना करके अपनी उन्नति करनी चाहिये।’ बालक शुभम् ने लम्बी सामूहिक प्रार्थना को एकरस व एकगति से पूरा किया। वह कहीं अटके नहीं और न कहीं रूके।

सत्संग का मुख्य प्रवचन डीएवी महाविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डा. नवदीप कुमार जी का हुआ। उन्होंने अपने व्याख्यान के आरम्भ में कहा कि कि 1 जुलाई का दिवस कभी न भूलने वाला इतिहासिक दिवस है। 109 वर्ष पहले सन् 1909 में 1 जुलाई के दिन लन्दन में एक घटना हुई थी। इस घटना ने अंग्रेज साम्राज्य को हिला कर रख दिया था। डा. नवदीप कुमार ने ऋषि दयानन्द की चर्चा की और बताया कि पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा उनके एक मुख्य शिष्य थे। वह भारत की कुछ रिसायतों में दीवान के पद पर भी कार्यरत रहे। ऋषि दयानन्द की प्रेरणा से पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा इंग्लैण्ड चले गये। वह वहां संस्कृत के प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। डा. नवदीप जी ने कहा कि सन् 1905 में पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंग्लैण्ड में इण्डिया हाऊस की स्थापना की। वह भारतीयों को इंग्लैण्ड आकर अध्ययन करने वाले युवकों को छात्रवृत्ती सहित इण्डिया हाऊस में निवास की सुविधा देते थे। महान देशभक्त और हिन्दू जाति के गौरव वीर सावरकर सन् 1906 में उनसे छात्रवृत्ति प्राप्त कर वहां अध्ययन करने पहुंचे थे। छात्रवृत्ति की एक शर्त यह होती थी कि इसे प्राप्त करने वाला युवक यह घोषणा करें कि वह अंग्रेजों की नौकरी नहीं करेगा। वीर सावरकर जी ने इसका पालन किया था। वीर सावरकर जी ने इंग्लैण्ड में रहकर ‘बार एट ला’ किया परन्तु अंग्रेजों के प्रति वफादारी की शपथ न लेने के कारण उनको उापाधि प्रदान नहीं की गई थी। अन्य लोगों ने जिनकों उपाधियां मिली, उन्होंने अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने की शपथ ली थी।

विद्वान वक्ता ने बताया कि सर विलियम हट कर्जन वायली अंग्रेज अधिकारी था जो भारतीयों को अनावश्यक रूप से परेशान करता था। उसकी प्रेरणा से अंग्रेज अधिकरी भारतीयों पर अत्याचार करते थे जिससे हमारे देशभक्त क्रान्तिकारी दुःखी होते थे। अतः ऐसे व्यक्ति को उसके दुष्कर्मों का दण्ड दिया जाना आवश्यक था। डा. नवदीप कुमार जी ने देशभक्त मदनलाल ढ़ीगरा की चर्चा की। उन्होंने बताया कि मदनलाल ढ़ीगरा देशभक्त, सुन्दर, तेजस्वी, बुद्धिमान तथा बलवान प्रकृति का युवक था। वह इण्डिया हाऊस, लन्दन में वीर सावरकर जी के सम्पर्क में आये। डा. नवदीप कुमार ने ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश में लिखे उन शब्दों को स्मरण कराया जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि धर्मात्मा मनुष्य निर्बल भी हो तो उनकी अपनी सर्वसामथ्र्य से रक्षा, उन्नति व प्रियाचरण करना चाहिये। अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करें अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करें। इस काम में चाहे उस (धर्मात्मा, देशभक्त मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवें।

डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि भारतमाता के वीर सपूत मदनलाल ढ़ीगरा जी ने वीर सावरकर के साथ परामर्श कर कर्जन वायली को मारने की योजना बनाई। 1 सितम्बर सन् 1909 की शाम को इंग्लैण्ड में इण्डियन नेशनल एसोसिएशन के वार्षिकोत्सव के अवसर पर इम्पीरियल इंस्टटियूट के जहांगीर हाल में एक सभा हुई। इस सभा में भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकट्ठे हुए। जैसे ही भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलयम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हाल में घुसे, मदन लाल ढींगरा जी ने उनके चेहरे पर पांच गोलियां दागी। इसमें से चार सही निशाने पर लगी और उनकी मृत्यु हो गई। देशभक्त मदनलाल ढींगरा सभा स्थल से भागे नहीं। उन्होंने कहा कि मैंने भारत माता के पुत्र के रूप में अपना फर्ज निभाया है। अगले दिन इंग्लैण्ड के समाचार पत्रों में इस विषय के समाचार छपे। डा. नवदीप कुमार ने बताया कि इस घटना से पूर्व शेर की मांद में जाकर शेर को मारने का कार्य किसी ने नहीं किया था। उन्होंने कहा कि ढींगरा जी ने लन्दन जाकर अपने संकल्प को अंजाम देने का काम किया। विद्वान वक्ता ने कहा कि अंग्रेज हमारे क्रान्तिकारी देशभक्तों को आतंकवादी कहते थे जबकि हमारे यह वीर देशभक्त चींटी को मारने में भी डरते थे परन्तु देश के शत्रुओं का विनाश करने में डरते व हिचकते नहीं थे। डा. नवदीप कुमार ने बताया कि सन् 1942 में महात्मा गांधी का आन्दोलन फेल हो गया था। उसके बाद उनका आन्दोलन नहीं चला। विद्वान वक्ता ने कहा कि देश के विभाजन व पाकिस्तान बनने से रोकने में भी गांधी जी विफल रहे। पाकिस्तान के निर्माण को रोकने में असफल रहने पर उन्होंने कहा था कि प् ूंे इनतपमक ंसपअमण् डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि वीर सावरकर को देशभक्ति के कार्य करने के लिए दो जन्मों के कारावास की सजा दी गई थी। उन्हें कालापानी नामक पोर्टव्यलेयर की सेलुलर जेल में पशुओं की तरह सुबह से शाम तक बिना रूके तेल पीरना पड़ता था। अनेक बार उन पर कोड़ों की वर्षा भी की गई। इस देशभक्त के अहसानों का सारा देश ऋणी है। क्रान्तिकारियों के कारण ही हमारा देश आजाद हुआ। उन्होंने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भी क्रान्तिकारी थे।

इसके बाद डा. नवदीप कुमार जी ने विषय परिवर्तन करते हुए श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चों से प्रश्न किया कि ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना किस लिए की थी? एक बच्चे ने उत्तर दिया कि पूरे संसार से अज्ञान को दूर करने के लिए ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी। विद्वान वक्ता ने आर्यसमाज के छठे नियम की चर्चा की और कहा कि यह नियम कहता है ‘संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।’ डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि धर्म का साधन हमारा शरीर है। यह स्वस्थ, निरोग, बलवान व दीर्घायु होगा तभी हम धर्म-कर्म कर सकते हैं। अतः इसे हमें स्वस्थ, निरोग व बलवान बनाने सहित दीर्घायु रखना है और इसके साथ ही अन्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना है। आर्यसमाज के 6ठे नियम के अनुसार यह समाज का एक मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि आत्मिक उन्नति भी तभी सम्भव है जब कि हमारा शरीर निरोग हो। उन्होंने कहा कि आर्यसमाज के सभी सदस्यों वा अनुयायियों को अपने शरीर को स्वस्थ व बलवान रखने पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिये। उन्हें ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिये। उन्होंने कहा कि हममें यदि योग्यता व दक्षता होगी तभी हम दूसरों का उपकार कर पायेंगे। विद्वान आचार्य ने कहा कि छोटे बच्चों को मां का दूध मिलना चाहिये। उन्होंने कहा कि माताओं को अपने शिशुओं को कम से कम 6 माह तक तो अवश्य ही अपना दूध पिलाना चाहिये। चिकित्सा विज्ञान माता के दूध को शिशुओं के लिए सर्वोत्तम मानता है। उन्होंने कहा कि दूसरों का उपकार करने के लिए हमारे भीतर परहित की भावना व दृष्टि होनी चाहिये। हमारा जीवन गतिशील रहना चाहिये। सभी मनुष्यों के लिए आत्मिक उन्नति आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मानव का शरीर एक शक्ति है। इस शारीरिक शक्ति पर आत्मा का नियंत्रण होना आवश्यक है। नवदीप कुमार जी ने स्वस्थ जीवन व आत्म-रक्षा के लिए आजकल समाज में प्रचलित जिम व जूडो कराटे आदि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हमारे युवक इन जगहों पर ताकत प्राप्त करने के लिए जाते हैं। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि आत्मिक उन्नति शारीरिक शक्ति पर एक प्रकार का नियंत्रण करना व उसे अच्छे वेदोक्त कार्यों में लगाना है।

आचार्य डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि आर्यसमाज एक आस्तिक संगठन है जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता है। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान पाश्चात्य देशों का अनुकरण करके बनाया गया है। संविधान ने देशवासियों को छूट दी है कि वह चाहें आस्तिक बनें, चाहें नास्तिक बनें। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर की उपासना करना आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार ईश्वर का न्याय अच्युत है। ईश्वर का न्याय ही वस्तुतः आदर्श न्याय है जिसमें किसी के साथ अन्याय नहीं होता और न किसी के किसी कर्म के फल का न मिलना वा छूटना ही सम्भव है। मानवीय न्याय में यह विशेषता नहीं है। डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि ईश्वर सर्वव्यापक है जिसका अर्थ है कि ईश्वर हमारे सभी कर्मों को हर क्षण देखता व जानता है और यथासमय उसका न्याय करते हुए हम सबको सुख व दुःख रूपी फल देता है। ईश्वर के न्याय से हमें डरना चाहिये और कभी कोई पाप नहीं करना चाहिये। आचार्य नवदीप कुमार जी ने कहा कि यदि पाप से बचना है तो हमें सच्ची आस्तिकता का विकास व उसका प्रचार करना होगा। हमें ईश्वर के अस्तित्व को मानने सहित उसकी सर्वव्यापकता को भी मानना पड़ेगा।

डा. नवदीप कुमार जी ने कहा कि सामाजिक उन्नति का अर्थ है कि हमें व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व की वैदिक मान्यताओं के अनुसार उन्नति करनी होगी। आर्यसमाज ने अपनी स्थापना से अब तक के 143 वर्षों में बहुत काम किये हैं। आर्यसमाज की स्थापना से लेकर 50 वर्षों का इतिहास विशेष महत्वपूर्ण हैं। इस अवधि में आर्यसमाज ने ईश्वर व आत्मा के सत्य स्वरूप का प्रचार करने के साथ समाज सुधार के अनेक कार्य किये। आर्यसमाज ने इस अवधि में बाल विवाह, बहुपत्नी प्रथा, सती प्रथा, सबको वेद पढ़ने का अधिकार देना व उसे गुरुकुल आदि स्थापित कर पढ़ाना, देश की आजादी, छुआछूत व ऊंच-नीच दूर करने, शिक्षा का प्रचार व प्रसार, शुद्धि आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण व समाज को शक्तिशाली बनाने का काम किया। वेदों की रक्षा का कार्य करने के साथ वेद व वैदिक धर्म को ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर सत्य सिद्ध किया है। देश में सामाजिक उन्नति में आर्यसमाज ने समाज सुधार के मौलिक सिद्धान्त दिये व उनका प्रचार प्रसार करने सहित समाज को मजबूत कर सामाजिक उन्नति का कार्य किया है। आर्यसमाज ने समाज में नमस्ते का भी प्रचार किया है। आर्यसमाज ने ईश्वर के सत्य स्वरुप, गायत्री मंत्र तथा यज्ञों का भी प्रचार किया है जिससे सामाजिक उन्नति में सहायता मिलती है। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि यदि आर्यसमाज में सिद्धान्त विरोधी लोग होंगे तो समाज उन्नति नहीं कर सकता। आर्यसमाज में प्रत्येक सप्ताह कोई महत्वपूर्ण विचार समाज के प्रधान जी के द्वारा श्रोताओं को सुनाया जाता है। आज उन्होंने कहा कि ‘ओ३म् का जप करने से उपासक परमानन्द को प्राप्त कर लेता है।’ आर्यसमाज के प्रधान डा. महेश चन्द्र शर्मा जी ने विलियम जेम्स दुरान्त के बारे में बताया और कहा कि वह इतिहासकार, अध्यापक व लेखक थे। उन्होंने थ्योरी आफ फिलासफी तथा थ्योरी आफ सिविलाईजेशन आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। वह 96 वर्ष की आयु तक जीवित रहे। उन्होंने ऋषि दयानन्द के बारे में कहा है कि ‘स्वामी दयानन्द ने भारतवासियों के लिए आर्यसमाज जैसा एक शक्तिशाली संगठन स्थापित किया जैसा संगठन वैदिक काल से अब तक किसी अन्य हिन्दू प्रचारक व नेता ने स्थापित नहीं किया।’

आर्यसमाज के प्रधान डा. महेश चन्द्र शर्मा जी के पुत्र अमेरिका में परिवार सहित निवास करते हैं। आज के सत्संग में उनके पुत्र मनीष शर्मा, पुत्र-वधु, पौत्री व पौत्र भी उपस्थित हुए। श्री मनीष शर्मा आजकल अपने पिता से मिलने भारत हुए आये हुए हैं। प्रधान श्री शर्मा जी की धर्मपत्नी भी नियमित रूप से सभी सत्संगों में सोत्साह भाग लेती हैं। आज सदस्यों को मिष्ठान्न आदि का प्रसाद भी श्री मनीष शर्मा जी की ओर से वितरित कराया गया। उन्होंने आर्यसमाज, श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम और रामप्यारी आर्य कन्या इण्टर कालेज संस्थाओं को दान भी दिया। आर्यसमाज के नियमों का पाठ तथा शान्ति पाठ के साथ आज के सत्संग का समपान हुआ। कार्यक्रम का संचालन बहुत ही योग्यता पूर्वक आर्यसमाज के युवा मंत्री श्री नवीन भट्ट जी ने किया। हम आर्यसमाज धामावाला से विगत 48 वर्षों से जुड़े हैं। एक योग्य युवक का आर्यसमाज का मन्त्री बनना हमने यहां पहली बार देखा है। मंत्री जी को हमारी हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई। उनके नेतृत्व में आर्यसमाज आगे बढें, ऐसी उनसे आशा रखते हैं।

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