‘‘कह रहीम कैसे निभै, केर-बेर को संग’’

जहां तक गठबंधन धर्म का सवाल है तो यह लालू यादव की अहम जिम्मेदारी थी कि ऐसी स्थिति में तेजस्वी का मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दिलवाकर गठबंधन धर्म का निर्वहन करते, पर लालू यादव पुत्र मोह में धृतराष्ट्र के अवतार साबित हुए। वस्तुतः लालू यादव जैसे लोगों के पास न तो कोई नीति है और न सिद्धांत। उनका एकमात्र सिद्धांत सत्ता और उसका निर्बाध भोग है। ठीक जैसे राहुल गांधी के चलते कांग्रेस पार्टी भले रसातल में चली जाए, पर राहुल को किनारे नहीं किया जा सकता।


वीरेन्द्र सिंह परिहार
अंततः बिहार में महागठबंधन टूट गया। नीतीश कुमार ने एक बार फिर भाजपा के सहयोग से बिहार की सत्ता संभाल ली। लालू यादव का राजद प्रमुख विपक्षी दल बन गया। रहा सवाल कांग्रेस का तो वह सिर्फ हाथ मलती रह गई। इतना ही नहीं विपक्ष के नेता बनते ही लालू यादव के छोटे पुत्र एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए कहा कि बिहार की जनता महागठबंधन को पाॅच साल के लिए चुना था, लेकिन हमारे साथ, बिहार की जनता के साथ धोखा देकर महागठबंधन को तोड़ दिया गया। इसका जवाब देते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि सत्ता सेवा के लिए होती है, मेवा के लिए नहीं। मैंने गठबंधन धर्म का हमेशा पालन किया, लेकिन जब मेरे लिए मुश्किल आई तो इस्तीफा दे दिया। गठबंधन धर्म के सन्दर्भ में यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो फरवरी-2011 में तात्कालिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि गठबंधन सरकार की कई मजबूरियाॅ होती हैं और इनके कारण कई समझौते भी करने पड़ते हैं। गठबंधन सरकार में चीजें वैसी नहीं होती जैसा अन्य चाहते हैं, लेकिन गठबंधन धर्म का पालन करना पड़ता है। जब मनमोहन सिंह ऐसा कह रहे थे तो वह अपने राज में 2जी स्पेक्ट्रम समेत कई घोटाले के संबंध में एक तरह से सफाई दे रहे थे। निस्संदेह गठबंधन धर्म का पालन एक सीमा तक होना ही चाहिए, लेकिन गठबंधन धर्म का तात्पर्य यह तो नहीं कि सत्ता के माध्यम से गजनवी, गौरी, चंगेज और तैमूर की तरह देश को लूटा जाए। ऐसी स्थिति में गठबंधन धर्म की तुलना में राजधर्म को वरियता मिलनी चाहिए। जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 1998 से 2004 के मध्य किया था। जिसमें जयललिता की यह मांग की तामिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्खास्त किया जाए, श्री वाजपेयी ने संविधान विरोधी होने के कारण नहीं स्वीकार की थी, भले ही 13 महीनों में लोकसभा का मध्याविधि चुनाव कराना पड़ गया हो। इसी तरह से सुखराम और बूटा सिंह के खिलाफ जब अदालतों में चार्ज-शीट प्रस्तुत हुई तो श्री वाजपेयी ने उनका इस्तीफा लेने में कोई देर नहीं लगाई। इतना ही नहीं तहलका प्रकरण में रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज के विरुद्ध कोई ठोस आरोप न होने पर भी कई महीनों तक उन्हें मंत्री पद से मुक्त रखा था। वस्तुतः मनमोहन सिंह और तेजस्वी यादव जिस गठबंधन धर्म की बातें कर रहे हैं, उसे गठबंधन धर्म नहीं बल्कि बंदरबांट धर्म कहा जा सकता है। बिहार में भाजपा-जदयू का गठबंधन करीब 17 वर्ष चला, जिसमें 8 वर्ष तक दोनों सत्ता में साथ-साथ रहे। इस दौरान उनके बीच कोई ऐसी टकराहट और विषम स्थितियाॅ नहीं उत्पन्न हुईं, जिसको लेकर गठबंधन में कोई खास गतिरोध आया हो। इतना ही नहीं बिहार में इस गठबंधन के शासन में बिहार जंगल-राज के दौर से तो मुक्त हुआ ही, विकास की अभूतपूर्व गति भी देखने को मिली जो राजद-जदयू गठबंधन के राज में पुनः ठहर गई।
यह तो सभी को पता है कि जदयू और भाजपा का गठबंधन भी भाजपा ने नहीं बल्कि नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने के कारण मार्च-2013 को तोड़ा था। निस्संदेह इसके पीछे जो कारण माना जा सकता है कि नीतीश कुमार को ऐसा लगा होगा कि यदि वह मोदी के विरोध में खड़े होते हैं, तो एक तो उनकी मुस्लिम समुदाय में स्वीकृति ब में यह आ गया कि भविष्य में ऐसा संभव नहीं दिखता, क्योंकि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता दिनोदिन बदारी दिखाई। इतना ही नहीं, नोटबंदी, जी.एस.टी. और राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने खुलकर मोदी सरकार का समर्थन किया। यह तो तस्वीर का एक पहलू है, जहां तक लालू यादव के साथ का प्रश्न है, यह नीतीश कुमार के लिए बड़ा ही असहज और आकस्मिक दौर था। आखिर में इन्हीं लालू यादव के जंगल-राज के विरुद्ध नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। लालू यादव के घोटाले और उनके अभियोजन तथा जेल जाने सभी से नीतीश कुमार बेहतर रुप से परिचित थे। पर नीतीश कुमार की मजबूरी यह थी कि जब वर्ष 2014 में लोकसभा का चुनाव वह बुरी तरह हारे और उनकी पार्टी को मात्र दो सीटें प्राप्त हुई तो तत्काल बाद उनका भाजपा से जुड़ जाना संभव नहीं था, अगर वह ऐसा प्रयास करते तो भाजपा उस समय वैसा (पूर्व स्थिति जैसा) भाव न देती। फलतः राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए लालू यादव से गठबंधन करना उनकी मजबूरी हो गई। यहां तक कि लालू के छोटे बेटे तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री भी बनाना पड़ा। लेकिन जब लालू और उनके परिवार के लोगों के ‘जमीन हड़पो’ घोटाले सामने आने लगे। यहां तक कि सी.बी.आई. ने उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के विरुद्ध भी एफ.आई.आर. दर्ज कर लिया तो ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार यदि कोई समझौता करते तो उनकी साफ-सुथरी और ईमानदार छवि पर तो ग्रहण ही लग जाता। दूसरे ऐसे लोगों के साथ खडे़ होकर राजनीतिक रूप से डूबने का भी खतरा पैदा हो गया था, जिससे मुक्ति पाने में ही उन्होंने भलाई समझी। लालू यादव का कहना है कि तेजस्वी जो सफाई देगा जांच एजेन्सी को देगा कोई और कौन होता है सफाई मांगने वाला? जबकि मुख्यमंत्री को अपने मंत्रियों से जवाब मांगने का पूरा अधिकार है, फिर लोकतंत्र में तो ऐसे सवालों का जवाब जनता को दिया ही जाना चाहिए। पर लालू के कुतर्क का सही जवाब नीतीश ने अपने कदमों से दे दिया।
जहां तक गठबंधन धर्म का सवाल है तो यह लालू यादव की अहम जिम्मेदारी थी कि ऐसी स्थिति में तेजस्वी का मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दिलवाकर गठबंधन धर्म का निर्वहन करते, पर लालू यादव पुत्र मोह में धृतराष्ट्र के अवतार साबित हुए। वस्तुतः लालू यादव जैसे लोगों के पास न तो कोई नीति है और न सिद्धांत। उनका एकमात्र सिद्धांत सत्ता और उसका निर्बाध भोग है। ठीक जैसे राहुल गांधी के चलते कांग्रेस पार्टी भले रसातल में चली जाए, पर राहुल को किनारे नहीं किया जा सकता। ऐसे ही लालू यादव जैसे लोगों के लिए पार्टी सिर्फ उनके और परिवार के लिए है। तभी तो वह एक तरफ अपने अस्तित्व रक्षा के लिए मोदी सरकार से भी सांठ-गांठ का असफल प्रयास करते हुए नीतीश सरकार गिराने का प्रस्ताव भी दे चुके थे। इस तरह से लालू यादव अपने स्वार्थों के लिए पूरे कुनबे को अपने कारनामों से जेल से बचाने के लिए गठबंधन तोड़ने का उपक्रम कर रहे थे, तो नीतीश कुमार ने राजनीति में शुचिता बनाए रखने के लिए इस गठबंधन को तोड़ा। इस तरह से हकीकत यही है कि यह विषम स्वभाव वालों का गठबंधन था, जिसे एक-न-एक दिन टूटना ही था। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है- ‘‘कह रहीम कैसे निभै, केर-बेर का संग।’’

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