कांच के रिश्ते इन्सानी रूह का खुदकुशी के रूप में कत्ल करते हैं

केवल कृष्ण पनगोत्रा 
कुछ रोज़ पहले सुशांत सिंह राजपूत ने खुदकुशी कर ली। इस खबर से आवाम हैरान हुआ। इसलिए हुअा कि जो नौजवान कल तक ‘छिछोरे’ फिल्म के माध्यम से लोगों को खुदकशी जैसे पाप के बारे में समझा रहा था आज खुद उसी पाप का शिकार हो गया। सुशांत सिंह राजपूत द्वारा की गई खुदकुशी पर ज्यादातर लोगों का नजरिया वही रहा जैसा अक्सर देखा-सुना जाता है। कि खुदकुशी पाप है और यह भी कि खुदकुशी किसी समस्या का समाधान नहीं होता और कानूनन खुदकुशी एक अपराध है। नैराश्य में खुदकुशी जैसा कदम कई लोग उठा लेते हैं मगर दुनिया की नजर में इस होनहार और भौतिक सुख-सुविधा से सम्पन्न नौजवान की खुदकुशी कई सवाल छोड़ गई, जिनका जवाब हमें तलाश करना ही होगा। खुदकुशी के पहलुओं की विचारणीय पड़ताल करनी होगी। 
कानूनी पहलू: मगर हकीकी बातों की अनुभूतियों का अनुमान भी हर किसी के पास नहीं होता। संभवत: कुछ ऐसे ही विचारों के चलते दिसंबर 2014 में सरकार ने खुदकुशी पर लगने वाली IPC की धारा 309 को समाप्त करने का फैसला किया था। खबरों के मुताबिक लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि सेक्शन 309 को अपराध की श्रेणी से हटा दिया जाना चाहिए। कमीशन ने कहा था कि यह कानून मानवीय दृष्टिकोण से सही नहीं है। इस कानून को हटाने से आत्महत्या की कोशिश के बाद मानसिक प्रताड़ना झेल रहे लोगों को कानूनी अड़चनों में फंसकर अलग से परेशान नहीं होना पड़ेगा।सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की बेंच ने भी संसद को सुझाव दिया था कि इस कानून को खत्म किया जाए। उन्होंने कहा था कि एक शख्स डिप्रेशन में आने के बाद आत्महत्या की कोशिश करता है, इसलिए उसे मदद की जरूरत है, न कि सजा की। जो लोग इस कानून को खत्म किए जाने का विरोध कर रहे थे, उनका तर्क था कि आत्महत्या एक अनैतिक काम है और इसे खत्म करने पर खुदकुशी के मामलों में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस कानून को हटाने की कोशिश काफी पहले से हो रही थी। 1978 में आईपीसी संशोधन बिल राज्यसभा में पास हो गया, जिसके जरिए सेक्शन 309 को खत्म किया जाना था। लेकिन इससे पहले कि यह बिल लोकसभा में पहुंचता, संसद भंग कर दी गई और बिल पास न हो सका। 1987 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि भारतीय संविधान के तहत मिलने वाले राइट टू लाइफ में जीने और जान देने, दोनों ही अधिकार समाहित हैं। इसके साथ ही, धारा 309 को खत्म कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को 1994 में बनाए रखा। हालांकि, 1996 में पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया कि संवैधानिक तौर पर मिलने वाले राइट टू लाइफ में जान देने का अधिकार शामिल नहीं है और धारा 309 वैध है। इसके बाद 2008 में लॉ कमीशन ने इसे हटाने का सुझाव दिया।
क्या है खुदकुशी: खुदकुशी मानसिक दुर्बलता से पैदा होने वाली दुर्घटना होती है। यह तब होता है जब क्रोध, अनिश्चतता या परेशानी के कारण किसी भी मनुष्य पर तनाव और अवसाद हावी हो जाता है। कई बार खुशी भी अवसाद का कारण बनती है। जब एक खुशी की खुमारी कमजोर पड़ती है तो दूसरी खुशी की आस में इन्सान तनाव मोल लेता है। ऐसे तनाव के लक्षणों को कोई मनोवैज्ञानिक या इन्सानी जिंदगी के उतार-चढ़ाव, दुखों व सुखों से या फिर नेकनीयती या बदनीयत के अच्छे-बुरे अनुभवों की जमीनी हकीकत से गुजर चुका व्यक्ति जान या पहचान सकता है। फिल्म निर्माता-निर्देशक मुकेश भट्ट को मुमकिन है कुछ आशंका भी हुई होगी। उन्होंने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा है, ‘मुझे एहसास हो रहा था कि ऐसा कुछ होने वाला है। राजपूत से मेरी बातचीत के दौरान, मुझे लगा कुछ गड़बड़ है। हम लोग सड़क 2 में एक साथ काम करने पर बात कर रहे थे।’किसी भी प्रकार की निराशा का भुक्तभोगी जब खुदकुशी की बात करता है तब उसकी मानसिक दुर्बलता को मनोवैज्ञानिक तौर पर सबल बनाने की आवश्यकता रहती है। उसे अपनी सहानुभूति की ठंडी बौछार चाहिए, बेगानी धमकी की तकरार नहीं। उसे उस रिश्ते का सामीप्य चाहिए जिसकी मिट्टी से अपनत्व की सौंधी खुशबू आती है। कांच की चमक में मिट्टी की ठनक का मिज़ाज नहीं झलकता है। इसलिए कांच के बाजार में जीने का सामान नहीं मिलता, मरने की मजबूरियां मिलती हैं। जो कांच के बाजार और कांच के रिश्तों की समझ रखते हैं, वो अवसाद के शिकार नहीं होते बल्कि प्रतिकूल को अनूकूल बनाने के हौसले रखते हैं। खुदकुशी के मामले वर्तमान समय में पेचीदा होते जा रहे हैं। करीब चालीस-पच्चास साल पहले खुदकुशी के कारक प्रत्यक्ष या परोक्ष समझ आ जाते थे मगर आज के समय शादाब और आबाद जिंदगी भी एक झटके में बर्बाद हो जाती है। भौतिक दृष्टि से देखें तो सुशांत सिंह राजपूत के पास किस वस्तु की कमी थी। फिल्मी दुनिया के बड़े पर्दे पर जो बहुतों को सात साल या सात दशकों में नहीं मिलता, उसे सात दिनों में हासिल हो गया। फिर कुछ तो था ही! क्या कोई महत्वाकांक्षा थी, जो पूरी नहीं हो पा रही थी? अकेलापन था, जो मानसिक घुटन देता था? या कहीं रिश्तों का खोखलापन था, जिसे कोई समझने और सुनने के लिए तैयार नहीं था। वैसे जिन नातों की डोरी के सहारे आज हम उड़ना चाहते हैं, वो कच्ची पड़ती जा रही हैं। कांच के रिश्तों में उस मिट्टी की खुशबू नहीं होती जिसे कुम्हार अपने खून-पसीने से सींचता है। मिट्टी बुनियाद है कांच धोखा है। यह मिट्टी क्या है? कांच और मिट्टी में अन्तर बताने वाले मिट्टी के रिश्ते भी कांच की चकाचौंध की माया से भयभीत हैं। कांच के तिलिस्म की आंच मिट्टी को मटियामेट कर रही है। जब आंख खुलती है तो मिट्टी की कीमत समझ आती है। इन्सान सोचता है मगर बेवक्त कि :कांच के रिश्तों से निजात मिलेगी!क्या मिट्टी के भाव मिट्टी मिलेगी!!
लोगों के करैक्टर अच्छे नहीं हैं मगर लोग अच्छे करैक्टर के एक्टर बहुत अच्छे हैं:
बुरा मत मनाना कांच के रिश्तों की भीड़ और चकाचौंध में लोगों के करैक्टर अच्छे नहीं है मगर लोग अच्छे करैक्टर के एक्टर बहुत अच्छे हैं। यह विडंबना भी है और नासमझी भी है। नासमझी में जो मिट्टी के रिश्तों की गरिमा नहीं रख सकते, उन्हें कांच के रिश्ते कई बार सब कुछ होते हुए भी सम्पन्नता के ऐसे तिलिस्मी जाल में उलझा लेते हैं जहाँ यकीनन जिंदा मौत मिलती है। उसी जिंदा मौत की माया में इन्सान असली काया से भी वंचित हो जाता है। मर जाता है, खुदकुशी करके। जिस कांच के संसार ने हमें मिट्टी से जुदा कर दिया, उसकी तासीर की नासमझी भी हमारी परेशानियों का जरिया बन जाता है। इसलिए मौजूदा समय की नजाक़त यह भी है कि अच्छे करैक्टर के मायावी एक्टर की पहचान की अलामतों से इन्सान परिचित रहे। ऐसी अलामतों की पहचान वही करा सकता है जिसे मिट्टी के मोह और कांच के धोखे का जमीनी तजुर्बा हो। मिट्टी बाप है, मिट्टी भाई है, मिट्टी सर है, मिट्टी सरपरस्ती है। मिट्टी जान है और मिट्टी ही जहान है। तभी तो कहता हूं कि:आंच न लगे घर की सरपरस्ती को!जो घर से गया वो जहां से गया!!घर की मिट्टी की खुशबू में जीने की तमन्ना है। इसलिए जहाँ भी जाओ मगर मिट्टी से बना घर साथ रखो। ठोकर पे रखिये उन कांच के रिश्तों को जो आपकी मिट्टी को आंच पे रखते हैं। यह कांच के वही हैवानी रिश्ते हैं जो किसी की भी इन्सानी रूह का खुदकुशी के रूप में कत्ल करते हैं। यही रिश्ते खुदकुशी के पेचीदा आलम के जिम्मेदार हैं। किसी ने सच ही कहा है कि:दिखाई न दे मगर शामिल जरूर होता है! खुदकुशी करने वाले का कातिल जरूर होता है!!•

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