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    Homeधर्म-अध्यात्महमें अपनी आत्मा व इसके स्वरूप को जानने का प्रयत्न करना चाहिये

    हमें अपनी आत्मा व इसके स्वरूप को जानने का प्रयत्न करना चाहिये

    मनमोहन कुमार आर्य

                   हम मनुष्य हैं। हमारे पास मनन, चिन्तन, विचार, ध्यान सत्यासत्य का निर्णय करने के बुद्धि है। इन साधनों से हम स्वयं अर्थात् अपनी आत्मा को भी जान सकते हैं। हम एक चेतन सत्ता है। हमारा निवास हमारे शरीर के भीतर है। हमारा शरीर हम नहीं है। शरीर तो पांच भूतों पृथिवी, अग्नि, वायु, जल और आकाश के अंशों से बना हुआ है। यह पांच भूत चेतना संवेदनाओं से सर्वथा शून्य है। इन्हें जड़ कहा जाता है। शास्त्र बताते हैं कि हमारी आत्मा अनादि नित्य सत्ता है। अनादि उसे कहते हैं जिसका आरम्भ न हो अर्थात् जो सदा से है और सदा रहेगा। यह आत्मा किसी का बनाया हुआ नहीं है अपितु यह इस सृष्टि में हमेशा से अपने सत्यस्वरूप में विद्यमान है। इसी कारण से इसे अनादि कहा जाता है। आत्मा शरीर में किस स्थान पर है इसका निर्धारण भी ईश्वरीय ज्ञान परमात्मा के अनुसार हृदय के भीतर है। ऋषि दयानन्द जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में लिखा है कि आत्मा शरीर में कण्ठ के नीचे व उदर के के ऊपर हृदय में विद्यमान है। यहीं पर आत्मा द्वारा परमात्मा का ध्यान करने से ईश्वर की प्राप्ति व उसका साक्षात्कार होता है।

                   हमारा आत्मा अनादि है और इसी कारण से इसका नाश कभी नहीं होता। यह सदा से है और सदा रहेगा। इसी कारण से आत्मा का जन्म-मरण अथवा मुक्ति होती है। यह सिद्धान्त परमात्मा से वेदों के द्वारा हमें मिला है। आत्मा जन्म मरण धर्मा है। जन्म का कारण जीव के पूर्वजन्मों के वह कर्म होते हैं जिनका भोग करना शेष रहता है। इन प्रारब्ध कर्मों के कारण ही जीव के पुनर्जन्म से पूर्व मृत्यु होने पर उसके भावी जन्म की जाति, आयु भोग परमात्मा द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। जाति का अर्थ मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि विभिन्न जातियां होता है। समस्त मानव जाति एक जाति है। जन्मना जाति मनुष्यों का अज्ञानता से बनायी गयी व्यवस्था है। इससे आर्य हिन्दू समाज का घोर पतन हुआ है। मनुष्य जन्म से नहीं अपितु अपने ज्ञान व कर्मों से श्रेष्ठ बनता है। जो मनुष्य जितना ज्ञान अर्जित कर कर्म करता है उसी के अनुसार उसका वर्ण निर्धारित किया जा सकता है। ज्ञान प्रधान मनुष्य का वर्ण ब्राह्मण होता है जो अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करता व कराता तथा दान देता व दान लेता है। जो मनुष्य ज्ञानी हो और जिसमें बल विशेष हो, जिसकी प्रवृत्ति अन्य लोगों की अन्याय से रक्षा करना होती है तथा जो देश की सेना या पुलिस आदि बलों में सेवायें देता है, उसे क्षत्रिय कहते हैं। ज्ञानी मनुष्यों को जिनकी रुचि व्यापार व कृषि पालन में होती हैं उन्हें वैश्य कहा जाता है। जो मनुष्य ज्ञानी नहीं है वह उपर्युक्त तीन वर्णों में न आकर चतुर्थ वर्ण शूद्र के अन्र्तगत आते हैं जिनका काम देश में किये जाने विभिन्न प्रकार के सेवा के कार्य होते हैं। शूद्र को श्रमिक भी कहा जा सकता है जिसका कर्तव्य विद्वानों व ज्ञानी जनों की उनके सामाजिक व निजी कार्यों में सेवायें देना होता है।

                   जीव एक व्यापक सत्ता नहीं है। आत्मा एक चींटी के शरीर में भी होती है तथा हाथी के शरीर में भी। चींटी के शरीर में होने से अनुमान होता है कि यह चींटी से भी कहीं अधिक सूक्ष्म सत्ता है। जो शरीर के छिद्रों से शरीर मे ंप्रविष्ट हो सकती है और बाहर भी जा सकती है। आत्मा को एकदेशी कहा जाता है। एकदेशी चेतन होने से ही यह अल्पज्ञ कहाती है। एकदेशी और अल्पज्ञ आत्मा ससीम होती है। आत्मा चेतन होती है इस कारण से इसे सुख दुःख की अनुभूति किसी भी प्राणी योनी में जन्म लेकर होती है। सभी प्राणी सुख चाहते हैं। दुःख कोई प्राणी नहीं चाहता। दुःखों की निवृत्ति के लिये मनुष्य योनि रहकर जीवात्मा को धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करना होता है। सभी मनुष्यों का धर्म एक ही होता है। मुख्यतः उसे सत्य का आचरण करना कहते हैं। धर्म कर्तव्य कर्मों को कहते हैं। ईश्वर को जानना और उसकी उपासना मनुष्य का कर्तव्य होने से धर्म है। उपासना की अनेक विधियां नहीं हो सकती। उपासना में तो हमें ईश्वर का ध्यान करना होता है। ध्यान ईश्वर के सत्य गुणों, कर्मो व उसके स्वभाव का किया जाता है। ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का संक्षेप में वर्णन करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उस ईश्वर की उपासना करना ही मनुष्य का कर्तव्य है वही ईश्वर सभी मनुष्यों आदि के द्वारा उपासनीय है। ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य का अज्ञान दूर होता है, उसे बल की प्राप्ति होती है तथा सद्कर्मों को करने की प्रेरणा मिलती है। मुनष्य ईश्वर उपासना से अपने आप को सभी दोषों से बचाता हुआ आत्मा की उन्नति कर ईश्वर का साक्षात्कार कर मुक्ति को भी प्राप्त कर सकता है। यही मनुष्य की सर्वोत्तम गति व उन्नति है। इसी लिये परमात्मा हमें मनुष्य जन्म देते हैं। जो मनुष्य जीवन में आत्मा की उन्नति व वेद धर्म का पालन नहीं करते वह आत्मा को जन्म-मरण के चक्र में फंसा कर परजन्म में नीच योनियों में जन्म पाकर दुःख व क्लेशों को प्राप्त होते हैं। नीच योनियों में मनुष्य की आत्मा का जन्म होना ही नरक के समान होता है। अतः मनुष्य को ईश्वर को जानकर सद्कर्मों को करते हुए धर्म का पालन करना चाहिये और दूसरों को भी सत्यमार्ग पर चलने की प्रेरणा करनी चाहिये। इससे मनुष्य व उसके संगी साथियों का भी कल्याण होता है।

                   आत्मा और जीव पर्यायवाची शब्द हैं। जीव अपने कर्तव्य कर्मों को करने में ईश्वर की ओर से स्वतन्त्र है। जीव जो कर्म करता है उनका सुख दुःख रूपी फल भोगने में वह ईश्वर की व्यवस्था में परतन्त्र होता है। ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में जीव की स्वतन्त्रता की विस्तार से चर्चा कर बताया है कि जीव के आधीन शरीर, प्राण, इन्द्रिय और अन्तःकरणादि होते हैं। यदि जीव स्वतन्त्र हो तो उस को पाप पुण्य का फल कभी प्राप्त नहीं हो सकता। क्योंकि जैसे भृत्य अपने स्वामी, सेना, सेनाध्यक्ष आदि की आज्ञा व प्रेरणा से युद्ध में अनेक पुरुषों को मार करके अपराधी नहीं होते, वैसे परमेश्वर की प्रेरणा और आधीनता से काम सिद्ध हों तो जीव को पाप वा पुण्य न लगे। उस फल का भागी प्रेरक परमेश्वर ही होवे। स्वर्ग-नरक, अर्थात् सुख-दुःख की प्राप्ति भी परमेश्वर को होवे। जैसे किसी मनुष्य ने शस्त्र विशेष से किसी को मार डाला तो वही मारने वाला पकड़ा जाता है और वही दण्ड पाता है, शस्त्र नहीं। वैसे ही पराधीन जीव पाप पुण्य का भागी नहीं हो सकता। इसलिये अपने सामथ्र्यानुकूल कर्म करने में जीव स्वतन्त्र परन्तु जब वह पाप कर चुकता है तब ईश्वर की व्यवस्था में पराधीन होकर पाप के फल भोगता है। इसलिये कर्म करने में जीव स्वतन्त्र और पाप के दुःख रूप फल भोगने में परतन्त्र होता है। ऋषि दयानन्द ने एक अन्य शंका का समाधान भी किया है कि जीव जो कर्म करता है वह परमेश्वर की प्रेरणा से करता है। उनके अनुसार जीव ईश्वर की प्रेरणा मानने व न मानने में स्वतन्त्र है। जीव धर्म-अधर्म व पाप-पुण्य जो भी कर्म करता है उसका उसे उनका यथायोग्य पुरस्कार व दण्ड मिलता है क्योंकि परमात्मा किसी जीव को पाप करने की प्रेरणा नहीं करता अपितु वह तो जीव को पाप कर्म करते हुए उसमें भय, शंका व लज्जा उत्पन्न करता है जिससे जीव कोई बुरा काम न करे और इसके परिणामस्वरूप जीव को दुःख न भोगने पड़े।

                   ईश्वर जीव दोनों चेतनस्वरूप हैं। दोनों का स्वभाव पवित्र, अविनाशी और धर्म करना आदि है। परमेश्वर के कर्म हैं सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सब जीवों संसार को नियम में रखना, जीवों को उनके पाप-पुण्यों के फल देना आदि। परमेश्वर के इन कामों को कोई जीव महापुरुष नहीं कर सकता। यह सभी कार्य ईश्वर बिना किसी की सहाय के अकेला करता है। जीव के कर्म हैं सन्तानोत्पत्ति व उनका पालन करना। शिल्पविद्या आदि अनेक अच्छे व बुरे कर्म भी जीव द्वारा अपने ज्ञान, विद्या व प्रवृत्ति के अनुसार किये जाते हैं। ईश्वर का ज्ञान नित्य है जो सदा उसमें बना रहता है। वह न्यूनाधिक नहीं होता। ईश्वर में हर समय आनन्द रहता है। उसमें अनन्त बल है जो उससे कभी पृथक नहीं होता।

                   जीवात्मा पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा करने वाला है। वह दुःख की इच्छा नहीं करता। वैर, पुरुषार्थ, बल, आनन्द, विलाप, अप्रसन्नता, विवेक व सत्यासत्य का ज्ञान आदि गुण सभी जीवों में तुल्य होते हैं। इसके अतिरिक्त जीव प्राणवायु को बाहर निकालते हैं। प्राण को बाहर से भीतर लेते हैं। आंख को मीचते हैं, आंख को खोलते हैं। प्राण का धारण करते हैं। मन कर्तव्य व अकर्तव्यों का निश्चय, उनका स्मरण और अहंकार करता है। जीवों में चलना, सब इन्द्रियों को चलाना, भिन्न-भिन्न क्षुधा, तृषा, हर्ष शोकादियुक्त आदि गुण हाते हैं। जीवात्मा के यह गुण परमात्मा से भिन्न हैं। जीवात्मा स्थूल नहीं है। इन्हीं गुणों से आत्मा की प्रतीती की जाती है। जब तक आत्मा देह में होता है तभी तक ये गुण प्रकाशित रहते हैं। जब आत्मा शरीर छोड़ कर चला जाता है तब ये गुण शरीर में नहीं रहते। जिस के होने से जो हों और होने से हों वे गुण उसी के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के होने से प्रकाशादि का होना और होने से होना है, वैसे ही जीव और परमात्मा का विज्ञान उनके गुणों के द्वारा होता है। ऋषि दयानन्द ने हमें यह भी समझाया है कि ईश्वर में त्रिकालदर्शिता जीवों के कर्मों की अपेक्षा से है। ईश्वर को जीवों के भूत व वर्तमान में किये कर्मों का ज्ञान होता है। जीव स्वतन्त्र है अतः परमात्मा को जीवों के भविष्य के कर्मों का ज्ञान नहीं होता। यदि इसके विपरीत मानेंगे तो जीव की स्वतन्त्रता भंग होती है और उस स्थिति में जीव अपने अशुभ कर्मों का दण्ड पाने का अधिकारी नहीं होता। ऋषि दयानन्द जी ने एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई है कि जीव शरीर में विभु वा व्यापक न होकर परिछिन्न अर्थात् एकदेशी होता है।

                   हमने इस लेख में आत्मा के विषय में चर्चा की है। यही ज्ञान हमें वेद, उपनिषद, दर्शन तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों से प्राप्त होता है। यह ज्ञान मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। जिस मनुष्य को यह ज्ञान नहीं है, उसका मनुष्य जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता। आत्मा विषयक यह ज्ञान देश के सभी स्कूलांे में सभी विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना चाहिये। इससे सभी को लाभ होगा। ओ३म् शम्।

    मनमोहन आर्य
    मनमोहन आर्यhttps://www.pravakta.com/author/manmohanarya
    स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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