गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-24

राकेश कुमार आर्य



गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज
अभी तक हमारे विश्व नेता वह नहीं बोल रहे हैं जो उन्हें बोलना चाहिए। उनके बोलने में कितनी ही गांठें लगी रहती हैं। बोलने में स्पष्टता नहीं है। छल नीति है। इसीलिए विश्वशान्ति के मार्ग में अनेकों बाधाएं हैं। इन बाधाओं को गीता ज्ञान समाप्त करा सकता है। विश्व नेताओं की नसों में जैसे ही निष्काम कर्मयोग का रक्त चढ़ाया जाएगा वैसे ही उनका खराब रक्त साफ होता जाएगा, और हम देखेंगे कि विश्व में वास्तव में शान्ति की बयार बह चलेगी। निष्काम कर्मयोग में सर्वकल्याण की स्पष्ट भावना समाहित होती है।

निश्छल हो बहती सदा कर्मयोग की बयार।
शान्ति जग में व्यापती होय दूर अंधकार।।
इसमें किसी प्रकार की छलनीति का आश्रय नहीं लिया जाता है। इसमें पापी को संरक्षण नहीं दिया जाता, अपितु पापी को हर व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के सार्वजनिक करने का उत्कृष्ट कार्य करता है। गीता की दृष्टि में ऐसा उत्कृष्ट कार्य ही मानवता की सच्ची सेवा है। चीन भारत के लिए वांछित एक अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी को आतंकवादी न मानकर संयुक्त राष्ट्र में भारत का विरोध कर रहा है। वास्तव में वह ऐसा करके अपनी विशेष शक्ति का जहां दुरूपयोग कर रहा है, वहीं वह मानवता का अहित भी कर रहा है। यह कैसी विडम्बना है कि विश्व के बड़े क्षेत्र 21वीं सदी तक भी मानवता के हित और अहित में अंतर नहीं कर पाए हैं।
संसार में अधर्म ना फैले और धर्म की सदा वृद्घि होती रहे अर्थात अनैतिकता का हृास और नैतिकता की उन्नति होती रहे, यही गीता का सार है। इसी के लिए हर महापुरूष को संघर्ष करना चाहिए। जिससे कि उसका मानव जीवन सफल हो सके। यदि राजभवनों में आतंकी ठहरेंगे, या वहां घोटाले होंगे, या वहां असामाजिक लोगों को किसी प्रकार का संरक्षण मिलेगा तो राजभवन लोकविनाश के कारण बन जाएंगे।
श्रीकृष्णजी कहते हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानाम् सृजाम्महम्।।
अर्थात ”हे भरत कुलोत्पन्न अर्जुन! इस संसार में जब-जब धर्म की हानि होती है उसका हृास या पतन होता है और अधर्म के प्रति लोगों में रूचि बढ़ती है-अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं (अधर्म के विनाश के लिए और धर्म की रक्षा के लिए) जन्म लेता हूं।”
श्रीकृष्णजी ने यहां पुन: भारतीय संस्कृति के एक सनातन सत्य को प्रकट किया है। योगेश्वर कह रहे हैं कि अधर्म की वृद्घि और धर्म का नाश या पतन जीवन्मुक्त आत्माओं के लिए व्याकुल करने वाला होता है। ऐसी जीवात्माएं मोक्ष में रहकर भी इस बात के लिए तड़प उठती हैं कि अब हमें संसार में चलकर धर्म के हो रहे हृास को रोकने के लिए विशेष उद्यम करना चाहिए। यहां श्रीकृष्ण जी यह संकेत भी कर रहे हैं कि संसार में रहने वाले हम सब लोगों को भी धर्म की हानि नहीं होने देनी चाहिए। यदि अधर्म की वृद्घि और धर्म का हृास हो गया तो संसार में सज्जन प्रकृति के लोगों का जीवन ही कठिन हो जाएगा। जबकि संसार में प्रकृति का यह नियम है कि वह सज्जनों का कल्याण चाहती है। सज्जन वही है जो प्रकृति के मित्र हैं, प्रकृति के नियमों में जिनकी आस्था है और जो अपने जीवन को ईश्वरीय व्यवस्था में रखकर जीने के अभ्यासी हो गये हैं, जो प्रकृति के जर्रे-जर्रे में ईश्वर का दर्शन करते हैं और हर प्राणी में उसी की ज्योति देखते हैं, -जो अपने इसी दिव्य गुण के कारण दूसरे लोगों के अधिकारों का तनिक सा भी हनन करने में विश्वास नहीं रखते हैं, जिनके जीवन व्रत आत्मोद्वार और संसार के कल्याण के लिए धारे जाते हैं। ऐसे लोगों के बने रहने से ही संसार में धर्म की रक्षा हो पाना सम्भव है। यदि संसार से ऐसे लोग चले गये या संसार ऐसे लोगों से वंचित हो गया तो संसार की जीवनचक्र बाधित हो जाएगा।
अगले ही श्लोक में श्री कृष्ण जी अपनी बात को और भी अधिक स्पष्ट करते हैं-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।।
अर्थात हे पार्थ! साधुओं की रक्षा के लिए, आत्मरत योगियों के कल्याण के लिए संसार के भले के कार्यों में लगे लोगों के कल्याण के लिए, धार्मिक कार्यों से संसार का उपकार करने वाले सज्जनों की रक्षा के लिए व दुष्टों को समाप्त करने के लिए अर्थात उनके विनाश के लिए और धर्म की संस्थापना के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूं।
कहने का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण जी अनन्त काल के लिए मोक्ष में भी पड़े रहना पसन्द नहीं करते, यदि संसार में अधर्म फैल रहा है तो वे मोक्षानन्द को भी छोडक़र संसार में आना पसन्द करेंगे। कहने का अभिप्राय है कि श्रीकृष्ण जी को संसार में धर्मानुकूल व्यवस्था हर स्थिति में चाहिए। इसके लिए उन्हें यदि मोक्षानन्द भी छोडऩा पड़े तो वह छोड़ देंगे। व्यक्ति की महानता का यही पैमाना है कि वह संसार के कल्याण के लिए निजी स्वार्थ को सदा तिलांजलि दे दे।
तभी तो योगेश्वर श्रीकृष्णजी अर्जुन को कह रहे हैं कितू भी किसी ऊहापोह में मत पड़, जब मैं मोक्षानन्द को भी त्यागने के लिए उद्यत हूं और हर स्थिति में संसार में धर्म की संस्थापना करना मेरा लक्ष्य है तो तुझे भी धर्म की संस्थापना को ही अपना जीवनव्रत मानकर उसकी रक्षा के लिए हथियार उठा लेने चाहिएं। यदि तू इसमें प्रमाद करेगा तो समझ लेना कि तू भी ऐसा करके संसार में अधर्म की वृद्घि के लिए ही कार्य कर रहा होगा, जो कि तेरे जैसे धर्म योद्घाओं के लिए शोभायमान नहीं होगा।
भारत में धर्म का राज्य उन प्रकृति मित्र और धर्मप्रेमी ऋषियों, सम्राटों, साधुओं और सज्जनों के कारण युगयुगों तक इसलिए बना रहा कि वे सभी धर्म का राज्य स्थापित किये रखने को पुण्य और अधर्म का राज्य स्थापित करने को पाप मानते थे। उनके जीवन में सत्य था, सादगी थी, सरलता थी और जीवन को उत्कृष्टता में जीने की इच्छा शक्ति थी।
आज के विश्व की समस्या यह है कि यहां अधिकांश लोग अधर्मानुकूल जीवन जी रहे हैं। हर एक व्यक्ति एक दूसरे के जीवन केे लिए बोझ बन रहा है। ऐसा करके संसार के लोग अपने जीवन के बोझ को हल्का करने की भ्रान्ति पाले रखते हैं। पर वास्तव में वे अपने जीवन को ही बोझिल बना रहे होते हैं। क्योंकि दूसरों के साथ किये गये छल, कपट, घात, अपघात सभी उल्टे लौटकर लोगों के पास आ रहे हैं और उनके अदृश्य बोझ के नीचे लोग दबे हुए मरे जा रहे हैं। इससे साधुओं का अकल्याण और दुष्टों की वृद्घि हो रही है। साधुओं का अकल्याण से हमारा अभिप्राय सज्जनशक्ति की हानि होने से है। साधु का अभिप्राय गेरूवे वस्त्रधारी और किसी जटाधारी बाबा से नहीं है। यहां साधु का अभिप्राय हर उस व्यक्ति से है जिसने जीवन को धर्मानुकूल बनाये रखने की पावन साधना की है और जो संसार के प्राणियों के कल्याण के कार्यों में लगा रहता है। उसके कपड़े सफेद भी हो सकते हैं और उसकी बेतरतीब बढ़ी हुई जटाएं भी हो सकती हैं।
क्रमश:

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