कितना अच्छा था
जब हम बच्चे थे
तब घर के आँगन में
इकट्ठा हो जाता था पूरा परिवार।
कैलाश,शंकर, विनिया चन्दा
आँगन में खूब मस्ती करते थे
तब आँगन किसी खेल के
मैदान से कमतर नहीं था
जिसमें समा जाता था सारा मोहल्ला घर-द्वार।
मकान से जुड़ा हुआ आँगन
आँगन से बाहर तक घर का छोर
सब मिले थे,आपस में घुले-मिले थे।
पीव अब घरों से खो गये है आँगन
आँगन से दूर चला गया है घर
घर से दूर चले गये है घर के बच्चे।
काश फिर से घरों में आँगन हो जाये
काश फिर से आँगन में बच्चे खेले
काश फिर से आँगन में घर-परिवार मिले।

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