● श्याम सुंदर भाटिया
सच मानिए, कश्मीरी आतंकवाद ने केसर की खुशबू को भी कैद कर रखा था। धारा 370 हटने के करीब डेढ़ साल बाद अब केसर की सुगंध भी आजाद होने लगी है, क्योंकि आख़िरकार टेररिस्ट टैक्स अलविदा हो गया है। तीन दशक में पहली बार दिल्ली समेत दीगर सूबों के केसर कारोबारी घाटी तक जाकर केसर के सौदे कर रहे हैं। टेररिस्ट टैक्स तकरीबन खत्म होने से केसर की कीमतें ऐतिहासिक रूप से घट गई हैं। ढाई लाख रुपए किलो बिकने वाला केसर 90 हजार के दाम तक आ गया है। देश में केसर का उत्पादन केवल कश्मीर में होता है। दुनियाभर में कश्मीरी केसर सर्वोत्तम मानी जाती है। इसके रंग और खुशबू का जलवा भारत के अलावा, यूरोप, अमेरिका, अरब मुल्क हर कहीं है। अस्सी के दशक से घाटी में आतंकी लगातार खून की होली खेल रहे थे, लिहाजा केसर भी जख्मी होकर रह गई थी। आतंकियों को भारी चौथ दिए बगैर केसर कारोबार नहीं होता था। ऐसे में किसी बाहरी कारोबारी के लिए यह कतई संभव नहीं था, वह कश्मीर में आकर खरीद-फिरोख्त की हिम्मत जुटा सके। केवल कश्मीरी कारोबारी के माध्यम से ही केसर घाटी से बाहर निकलती थी। केसर की खेती जम्मू-कश्मीर के बडगाम, पुलवामा, श्रीनगर और किश्तवाड़ में होती है। करीब 35 हजार कश्मीरी इसकी खेती से जुड़े हैं। ये चारों ही जिले आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित रहे हैं। यहां पैदा होने वाली केसर पर आतंकी अपना टैक्स वसूलते थे और रेट तय करते थे, इसीलिए केसर के भाव आसमां पर थे। जम्मू-कश्मीर का फिर से झंडा थामने की चाह रखने वालों खासकर गुपकार संगठन के लीडर्स के लिए भले ही 370 हटना अभिशाप साबित हो रहा हो, लेकिन केसर की खेती वाले हजारों धरतीपुत्रों के लिए यह किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रहा है।

आतंकियों के पहरे और टेररिस्ट टैक्स की वजह से केसर का भाव 2.25 लाख से 2.50 लाख रुपये किलो सामान्य तौर पर रहता था। लॉकडाउन के दौरान केसर इस भाव में बिक रही थी। नवरात्र में केसर 1.75 लाख रुपये में आ गिरी। दिसंबर के तीसरे हफ्ते से पहली बार केसर 90 हजार रुपये प्रति किलो आ गई। आतंकी फंड के कारण केसर के रेट अनाप-शनाप थे। मोलभाव करना गुनाह था। अब हालात बदले तो केसर का वास्तविक व्यापार प्रारम्भ हो गया है, जिसका सीधा-सीधा असर भाव पर पड़ा है। केसर कारोबारी मानते हैं, पहले केसर कई चैनल को पार करते हुए उनके पास पहुंचता था। इस साल माल का सौदा सीधे काश्तकारों से हो रहा है। केसर की फसल भी अच्छी है और घाटी में दूसरे प्रदेशों के बिजनेजमैनों की भी बिना रोक-टोक आवाजाही हो रही है। घाटी की फिज़ा में यह शुभ संकेत है। केसर की खेती को लेकर केंद्र शासित प्रदेश भी संजीदा है। जम्मू-कश्मीर के एलजी श्री मनोज सिन्हा ने केसर के खेतिहर और देश की करोड़ों -करोड़ अवाम को बड़ी सौगात दी है। कश्मीरी केसर अब आसानी से आम भारतीयों तक पहुँच सकेगा। केसर के सबसे बड़े उत्पादक इस केंद्र शासित प्रदेश ने केसर की फार्मिंग और ट्रेडिंग की खातिर जीआई टैगिंग-GI Tegging की सहूलियत प्रारम्भ कर दी है। इस नई तकनीक के जरिए इसकी पैदावार से लेकर बेचने तक की सारी सुविधा मुहैया होगी। कहने का अभिप्राय यह है, कश्मीरी केसर को अब देश की सभी मंडियों में पहुंचने के लिए ई-मार्केटिंग का श्रीगणेश हो गया है। केसर के चाहने वाले www.saffroneauctionindia.com पर ई-ट्रेडिंग के लिए रजिस्टर्ड कर सकेंगे। इस वेबसाइट पर केसर की फसल का पूरा रिकॉर्ड रहेगा। इससे केसर के काश्तकार सीधे मंडियों के सम्पर्क में रहेंगे और बिचौलियों की दाल नहीं गलेगी। इस वेबसाइट के जरिए देश का कोई भी आदमी कश्मीरी केसर खरीद सकता है। पहले जम्मू-कश्मीर में केसर उगाने वाले किसानों को माल बेचने के लिए बिचौलियों को कमीशन देना पड़ता था, जो धारा-370 की समाप्ति के बाद बीते कल की बात हो गई है। जम्मू-कश्मीर के 200 से अधिक गांव के हजारों किसान इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

साल 2014 में बाढ़ आने के बाद से ही और पत्थरबाजी की घटना के बाद राज्य के किसानों ने केसर की खेती छोड़ दी थी, लेकिन सरकार के ठोस आश्वासन और घाटी में बदली-बदली फ़िज़ा के बाद धरतीपुत्र फिर से केसर की खेती में रम गए हैं। दुनिया में केसर की सबसे ज्यादा पैदावार ईरान में होती है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर का नंबर आता है। यह लोगों के लिए यह अमृत के समान है, इसीलिए इसे लाल सोना भी कहते हैं। भारत में केसर को कई नामों से जाना जाता है… कहीं कुंकुम तो कहीं जाफरान तो कहीं सैफरॉन कहा जाता है. दुनिया में केसर की कीमत इसकी क्वालिटी पर आंकी जाती है। दुनिया के बाजारों में कश्मीरी केसर की कीमत 3 लाख से लेकर 5 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है। कश्मीरी केसर को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। ईरान की नागिन केसर ने भी बाजार में कदम रख दिए हैं। स्वाद और रंग में कश्मीरी केसर को चुनौती दे रही नागिन केसर महज 80 हजार रुपये किलो है। स्पेनिशन केसर भी नया विकल्प बनकर तैयार है। ये 1.35 लाख रुपये की एक किलो है। केसर के पौधों में अक्टूबर के पहले सप्ताह में फूल आने शुरू हो जाते हैं। नवंबर में यह फसल तैयार हो जाती है। भारत में केसर की सालाना मांग करीब 100 टन है, लेकिन हमारे देश में इसका औसत उत्पादन करीब छह-सात टन ही होता है। ऐसे में हर साल बड़ी मात्रा में केसर का आयात करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर में करीब 2,825 हेक्टेयर में केसर की खेती हो रही है। केसर का कटोरा भले ही अभी तक कश्मीर तक सीमित था, लेकिन अब इसका जल्द ही भारत के पूर्वोत्तर तक विस्तार हो रहा है। केसर के पौधे सिक्किम में रोप दिए गए हैं। ये पौधे पूर्वोत्तर राज्य के दक्षिण भाग स्थित यांगयांग में फल फूल रहे हैं। सीएसआईआर- आईएचबीटी ने केसर उत्पादन की तकनीक विकसित की है। इसका उपयोग उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के गौर-परम्परागत केसर उत्पादक क्षेत्रों में किया जा रहा है। सीएसआईआर- आईएचबीटी के निदेशक डॉ. संजय कुमार आशान्वित हैं, केसर की पैदावार बढ़ने से इम्पोर्ट पर निर्भरता कम होगी। उल्लेखनीय है, कश्मीर में सियासी अस्थिरता के चलते केसर का रकबा भी घट गया है। पहले केसर की खेती 3,715 हेक्टेयर में होती थी। 2010 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने नेशनल सैफरॉन मिशन लंच किया था ताकि केसर के प्रोडक्शन और रकबे में इजाफा हो सके, लेकिन निराशा ही मिली। दुनिया में केसर के उत्पादन में 90 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ईरान में 60 हजार हेक्टेयर जमीन में इसकी खेती होती है। केसर खाने में कड़वा होता है, लेकिन व्यंजनों के स्वाद को लाजवाब कर देता है। बताते हैं, डेढ़ लाख फूलों से करीब 1 किलो सूखा केसर प्राप्त होता है, इसीलिए दुनिया में इसे सोने के मानिंद बेशकीमती माना जाता है।

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