लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

पिछले चार पाँच महीनों से महरूम शेख़ अब्दुल्ला का परिवार कश्मीर घाटी में बहुत बैचेन हो उठा था । घाटी में अब जब महरूम शेख अब्दुल्ला के परिवार की बात चलती है तो उसमें केवल दो का नाम ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ पाता है । सर्वप्रथम शेख़ अब्दुल्ला के सुपुत्र फारुक अब्दुल्ला का और उसके बाद फारुक के पुत्र उमर अब्दुल्ला का । फारुक और उमर दोनों ही जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं । जब तक शेख़ अब्दुल्ला जीवित थे तब नैशनल कान्फ्रेंस का बजूद उनके अपने बजूद में ही सिमटा रहता था । उनके फौत हो जाने के बाद नैशनल कान्फ्रेंस फारुक-उमर के हाथों में आ गया । लेकिन इस बार इस पूरी प्रक्रिया में एक मौलिक अन्तर था । नैशनल कान्फ्रेंस घाटी के लोगों के हाथों में से निकल कर फारुक-उमर की जोड़ी के हाथ आया था जिसका अन्त पार्टी के हाथों सत्ता छिन जाने और श्रीनगर से फारुक अब्दुल्ला के पराजित हो जाने में हुआ । अब्दुल्ला परिवार की एक फ़ितरत है । सत्ता के बिना नहीं रह सकते । लेकिन सत्ता का एक ही रास्ता है और वह है आम लोगों के बीच चले जाना । वह रास्ता लम्बा है । इस रास्ते पर फारुक अपनी बढ़ती उम्र के कारण और छोटे अब्दुल्ला अपनी विरासत के कारण नहीं चल सकते । तब दूसरा शॉर्टकट क्या है ? उसका संकेत की माओ ने किया था । उसने कहा था कि सत्ता बंदूक़ की नली में से निकलती है । यह रास्ता लोकतंत्र विरोधी तो है ही मानवता विरोधी भी है । लेकिन अब्दुल्ला परिवार ने घाटी में शुरु से यही रास्ता चुना है । बड़े अब्दुल्ला यानि शेख़ अब्दुल्ला ने तो अपने समय में कम्युनिस्ट साथियों को आगे करके पीस ब्रिगेड के नाम पर सशस्त्र क्रान्ति सेना का गठन ही किया हुआ था लेकिन वे फिर भी लोकतंत्र में विश्वास दिखाने के लिए जनता के बीच जाने की औपचारिकता जरुर निभाते थे । उनके इस दुनिया से चले जाने के बाद यह औपचारिकता फारुक और उमर भी निभाते रहे लेकिन भारतीय राजनीति के क्षितिज पर नरेन्द्र मोदी के उभर आने के बाद स्पष्ट हो गया कि कश्मीर घाटी में महज़ औपचारिकता से काम चलने वाला नहीं है । आगे से जम्मू कश्मीर में भी निर्णय दिल्ली नहीं बल्कि जनता ही किया करेगी । जनता ने निर्णय अब्दुल्ला परिवार के पक्ष में नहीं किया । नबम्वर-दिसम्बर २०१४ के चुनावों में जम्मू कश्मीर की ८७ सदस्यीय विधान सभा में पीडीपी को २८ , भाजपा को २५ , नैशनल कान्फ्रेंस को १५ और सोनिया कांग्रेस को १२ सीटें मिलीं । लोक सभा के चुनावों में तो श्रीनगर की सीट भी फारुक अब्दुल्ला हार गए थे ।
सत्ता छिन जाने के बाद अब्दुल्ला परिवार के पास एक ही रास्ता बचा था । वह जनता का विश्वास जीतने के लिए पुनः घाटी की जनता के पास जाता । लेकिन उसने जनता के पास जाने का लम्बा और कष्टसाध्य रास्ता चुनने की बजाए सरल और शॉर्टकट रास्ता ही चुनना ही बेहतर समझा । वह हुर्रियत कान्फ्रेंस की गोद में जाकर बैठ गया । हुर्रियत कान्फ्रेंस का मानना है कि आतंकवादी कश्मीर में आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं । जल्द ही कश्मीर आज़ाद हो जाएगा । हुर्रियत कान्फ्रेंस के लोगों में थोड़ी बहुत नोंकझोंक इस बात को लेकर होती रहती है कि लड़ाई जीत लेने के बाद कश्मीर आज़ाद रहेगा या पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा । सैयद अली शाह गिलानी की गोद में बैठे फारुक अब्दुल्ला ।
जब धीरे धीरे एक एक क़दम साधते फारुक अब्दुल्ला , गिलानी की ओर बढ़ रहे थे तो बहुत से लोगों को हैरानी होती थी । क्योंकि वहाँ तो चौबीस घंटे आज़ादी की पुकार मची रहती थी । अपने बुढ़ापे को सुरक्षित रखने के लिए गिलानी साहिब कश्मीर की जवानियाँ आग की भट्टी में झोंक रहे थे । अब फारुक मियाँ भी उसी ओर खिंचे चले जा रहे थे । अभी लोगबाग कुछ समझ पाते , तब तक अब्दुल्ला गिलानी की गोद में उछल कूद कर रहे थे । गिलानी और फारुक की भाषा एक हो गई । पहला बोलता था तो दूसरे का भ्रम पैदा होता था और दूसरा बोलता था तो पहले का भ्रम होता था । आज़ादी । आज़ादी । गिलानी की गोद में बैठ कर फारुक अब्दुल्ला ने फ़रमाया कि घाटी में कश्मीरी नौजवान आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं । कश्मीर के सभी लोगों को इनका साथ देना चाहिए । लेकिन यदि कश्मीर घाटी के सभी लोगों को फारुक अब्दुल्ला में इतना भरोसा होता तो वे लोकसभा और विधान सभा चुनावों में ही फारुक अब्दुल्ला का साथ देकर उन्हें सत्ता के आसन तक न पहुँचा देते ? फारुक भी अच्छी तरह जानते थे कि कश्मीर घाटी में उनकी यह नेक सलाह सुनने वाला कोई नहीं है । अलबत्ता फारुक अब्दुल्ला की यह नई अरबी भाषा गिलानियों को जरुर कर्ण प्रिय लग सकती है । तब क्या फारुक अब्दुल्ला अरबी भाषा का यह अभ्यास केवल गिलानी को रिझाने के लिए ही कर रहे थे ? डू इन रोम एज दी रोमनज डू ।
तब फारुक अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी नैशनल कान्फ्रेंस के नौजवानों को ललकारा । उन्होंने उनका आह्वान किया कि वे भी आज़ादी का केवल समर्थन ही नहीं बल्कि उसके लिए संघर्ष करें । फारुक अब्दुल्ला की रणनीति स्पष्ट थी । यदि घाटी की जनता स्वेच्छा से अब्दुल्ला परिवार का वरण नहीं करती तो उसे डराकर अपने पक्ष में लाना पड़ेगा । क्योंकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो एक बार जनता को तो सच्चा झूठ अपने साथ दिखाना ही पड़ेगा । यह भी थानेदार और कविता वाला पुराना क़िस्सा है । एक थानेदार को कविता लिखने की बीमारी लग गई । सुनने के लिए कोई श्रोता पकड़ में आ नहीं रहा था । साहित्यकार ख़ासकर कवि जानते हैं कि कविता लिखने की प्रक्रिया श्रोता के बिना पूरी नहीं होती । थानेदार ने भी एक भद्र पुरुष को थाने में बुला लिया । गुलाब जामुन , जलेबी और चाय वग़ैराह सामने सज़ा देने के उपरान्त अपनी कविता सुनानी शुरु कर दी । कविता कैसी थी , यह बताने की जरुरत नहीं । भद्र पुरुष भी कविता के पारखी थे , इसे थानेदार का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है । उसने कविता सुनने से एकदम इन्कार कर दिया । कुछ देर तक तो थानेदार कविता सुनने के लिए चिरौरी करता रहा लेकिन जब श्रोता नहीं माना तो थानेदार ने उसे उठाकर हवालात में बन्द कर दिया । हवालात के बाहर थानेदार ने कविता की पोथी खोल ली और बोला , कविता तो मैंने सुनानी ही थी , लेकिन लगता है तुम्हें दूध जलेबी खाते हुए कविता सुनने की बजाए हवालात में बैठकर कविता सुनना ही पसन्द है । गिलानी की गोद में बैठे फारुक अब्दुल्ला का भी , लगता है घाटी की जनता को यही संदेश है । वोट तो हमने आपका लेना ही है , लेकिन लगता है आपको हमारी कश्मीरी भाषा समझ नहीं आती , आपको अभी भी गिलान की भाषा ही समझ आती है । यदि ऐसा है तो वही सही । फारुक छलाँग लगा कर गिलानी की गोद में बैठ गए और वहाँ से आज़ादी आज़ादी चिल्लाने लगे ।
फारुक अब्दुल्ला की यह गिलानी नीति अब धीरे धीरे स्पष्ट होने लगी है । कश्मीर घाटी में श्रीनगर और अनन्तनाग के संसदीय क्षेत्रों से उपचुनावों की घोषणा हो गई है । यदि नैशनल कान्फ्रेंस और अब्दुल्ला परिवार को घाटी में अपनी खोई हुई साख फिर से प्राप्त करनी है तो फारुक अब्दुल्ला के लिए श्रीनगर की लोक सभा सीट जीतना बहुत जरुरी है । यह सीट कभी अब्दुल्ला परिवार की ख़ानदानी सीट मानी जाती थी । फारुक अब्दुल्ला भलीभाँति यह जानते हैं कि वे अपने बलबूते यह सीट वर्तमान परिसिथिति में नहीं जीत सकते । फिर यदि घाटी में सक्रिय आतंकवादियों की हाँ में हाँ मिला दी जाए तो उनके सहयोग से यह सीट निकाली भी जा सकती है । लेकिन आतंकवादी समूहों को यह संकेत कैसे दिया जाए कि आप संघर्ष करो हम आपके साथ हैं ? गिलानियों की गोद में बैठ कर आज़ादी आज़ादी चिल्लाने से बढ़िया तरीक़ा भला और कौन सा हो सकता है ? इसलिए फारुक ने वही तरीक़ा अपनाया । श्रीनगर से फारुक अब्दुल्ला ने पर्चा भर दिया है । कुछ महीने पहले ही गिलानी की गोद में बैठ कर उन्होंने अपना चुनाव घोषणा पत्र भी जारी कर दिया था । इससे बढ़िया चुनावी रणनीति भला क्या हो सकती है ? परन्तु यह सबकुछ करते हुए फारुक को कोफ़्त नहीं होती ? इसका उत्तर जानने के लिए जिज्ञासु पाठकों को शेख़ अब्दुल्ला परिवार का 1931 से लेकर आज तक का इतिहास पढ़ लेना चाहिए ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *