कौन ‘अल्पसंख्यक’ असुरक्षित है?

– आशीष रावत

मोहम्मद हामिद अंसारी ने उपराष्ट्रपति पद से विदाई लेते-लेते एक विवाद खड़ा कर दिया था। हामिद अंसारी ने कहा था कि देश के मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा और घबराहट का माहौल है। अंसारी ने राज्यसभा टीवी को दिए अपने आखिरी इंटरव्यू में कई ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें नरेन्द्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाला माना जा सकता है। हामिद अंसारी ने अपने इंटरव्यू में कहा, ‘ये आंकलन सही है कि देश के मुस्लिम समुदाय में आज घबराहट और असुरक्षा का भाव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मुझे ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं। भारत का समाज सदियों से बहुलतावादी रहा है, लेकिन सबके लिए स्वीकार्यता का ये माहौल अब खतरे में है। लोगों की भारतीयता पर प्रश्न खड़े करने की प्रवृत्ति भी बेहद चिन्ताजनक है।’ हामिद अंसारी ने इंटरव्यू के दौरान ये भी कहा, ’लोगों पर भीड़ के बढ़ते हमले, अंधविश्वास का विरोध करने वालों की हत्याएं और कथित घर वापसी के मामले भारतीय मूल्यों में आ रहे विघटन के उदाहरण हैं। इससे ये भी पता चलता है कि कानून-व्यवस्था को लागू करने की सरकारी अधिकारियों की क्षमता भी अलग-अलग स्तरों पर खत्म हो रही है।’ अंसारी ने आगे कहा कि वो देश में बढ़ती असहनशीलता का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सरकार के अन्य मंत्रियों के सामने भी उठा चुके हैं।

भारत में अल्पसंख्यक कौन? यह प्रश्न बार-बार उठता रहता है लेकिन इसका माकूल जवाब अभी तक नहीं मिल पाया। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों में मुताबिक जम्मू-कश्मीर में 68 फीसदी जनसंख्या मुसलमानों की है। अतः जनसंख्या के आधार पर इस राज्य में मुसलमान किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते। अल्पसंख्यक समुदाय को चिन्हित नहीं करने की वजह से जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यकों को दिया जाने वाला हर लाभ मुसलमानों को मिल रहा है जबकि वहां जो समुदाय वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, वो उन सुविधाओं से महरूम हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 में अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप का फायदा जिन छात्रों को मिला है उनमें 1,05,000 से अधिक छात्र मुसलमान समुदाय से आते हैं जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के पांच हजार छात्रों को इसका फायदा मिल पाया। इसमें भी हिन्दू समुदाय के किसी भी छात्र को इसका फायदा नहीं मिला है जबकि जनसंख्या के आधार पर जम्मू-कश्मीर में हिन्दू मुसलमानों से बहुत कम हैं। वहीं इन्हीं मानदंडों पर अगर हिन्दू समुदायों के वृद्धि दर की बात करें तो कुल जनसंख्या के वृद्धि दर की तुलना में हिन्दुओं की जनसंख्या 0.9 फीसदी की कमी के साथ 16.8 फीसदी की वृद्धि दर से बढ़ी है। इसके इतर भी कुछ अन्य आंकड़े वर्गीकृत हुए हैं जैसे देश में लगभग 29 लाख लोग किसी धर्म को नहीं मानने वाले हैं जो कि कुल जनसंख्या का बहुत छोटा हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में मुस्लिम आबादी तुलनात्मक रूप से अधिक है। उत्तर प्रदेश के 21 जिले ऐसे हैं जहां मुसलमानों की हिस्सेदारी बीस फीसदी से अधिक है। उत्तर प्रदेश के ही 6 जिले ऐसे हैं जहां मुसलमान समुदाय हिन्दू समुदाय के बराबर अथवा अधिक भी हैं।

भारत में अल्पसंख्यक शब्द की अवधारणा पुरानी है। सन् 1899 में तत्कालीन ब्रिटिश जनगणना आयुक्त द्वारा कहा गया था कि भारत में सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम को छोड़कर हिन्दू बहुसंख्यक हैं। जिसके बाद अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के विमर्श को बल मिलने लगा। ब्रिटिश नियामकों से एक कदम आगे बढ़कर भारत में जब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया तो सर्वोच्च नयायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर. एस लाहोटी ने अपने एक निर्णय में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भंग करने का सुझाव तक दिया था लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में मुस्लिम 138 करोड़ (13.4 प्रतिशत), ईसाई की जनसंख्या 24 करोड़ (2.3 प्रतिशत), सिख 19 करोड़ (1.9 प्रतिशत), बौद्ध 8 करोड़ (0.80 प्रतिशत) और जैन 4 करोड़ (0.4 प्रतिशत) जनसंख्या थी। वहीं दूसरी ओर, वर्ष 2011 की जनगणना देश की 121.09 करोड़ की आबादी में मुस्लिम 17.22 करोड़ (14.2 प्रतिशत), ईसाई 2.78 करोड़ (2.3 प्रतिशत), सिख 2.08 करोड़ (1.7 प्रतिशत), बौद्ध 0.84 करोड़ (0.7 प्रतिशत) और जैन 0.45 करोड़ (0.4 प्रतिशत) जनसंख्या थी। इन आंकड़ों को पढ़ने-समझने के बाद अंसारी साहब को शायद पता चल जाए कि देश में असल रूप में अल्पसंख्यक कौन है।

आज लाखों कश्मीरी पंडित अपने देश में ही शरणार्थी की तरह रह रहे हैं। पूरे देश या विदेश में कोई भी नहीं है उनको देखने वाला। उनके लिए तो मीडिया भी नहीं है जो उनके साथ हुए अत्याचार को बताए। कोई भी सरकार या पार्टी या संस्था नहीं है जो कि विस्थापित कश्मीरियों को उनके पूर्वजों के भूमि में वापस ले जाने की बात करे। भारतीय और विश्व की मीडिया, मानवाधिकार संस्थाए गुजरात दंगो में मरे 750 मुस्लिमो (310 मारे गए हिन्दुओ को भूलकर) की बात करते हैं, लेकिन यहां तो कश्मीरी पंडितो की बात करने वाला कोई नहीं है क्योकि वो हिन्दू हैं। आज देश के लोगो को कश्मीरी पंडितो के मानवाधिकारों के बारे में भारतीय मीडिया नहीं बताती है लेकिन आंतकवादियों के मानवाधिकारों के बारे में जरुर बताती है। कश्मीर में अलगावादी संगठन मासूम लोगों की हत्या करते हैं और भारतीय सेना के जवान जब उन आतंकियों के खिलाफ कोई करवाई करते हैं, तो यह अलगावादी नेता अपने खरीदी हुई मीडिया की सहायता से चीखना-चिल्लाना शुरू कर देते हैं कि देखो हमारे ऊपर कितना अत्याचार हो रहा है। क्या हामिद अंसारी साहब को ये सब मालूम है कि कश्मीरी पंडित आज की तारीख में कहां हैं? हामिद अंसारी साहब ने कहा कि मुस्लिम समाज आज असुरक्षा का भाव महसूस कर रहा है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि कश्मीर में जो मुस्लिम समाज हमारी सेना पर पत्थरबाजी करके अलगाववादियों और आतंकवादियों को भगाने में सहायता कर रहा है क्या वो मुस्लिम समाज असुरक्षित है? देश में अल्पसंख्यक केवल मुस्लिम नहीं है सिख, बौैद्ध, ईसाई, जैन आदि धर्म को मानने वाले भी हैं। देश का बंटवारा हिन्दू-मुसलमान के आधार पर हुआ। नेताओं ने आज सत्ता में बने रहने के लिए 127 करोड़ भारतीयों की टीम इंडिया के वोटों के आधार पर बंटवारा कर उसे दलित, जाट, ब्राह्मण, अल्पसंख्यक आदि में बदल दिया।

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