लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

Posted On by &filed under कहानी, महत्वपूर्ण लेख.


आर. सिंह 

“अबे रूक. ”

कर्कश आवाज इतनी जोर से आयी थी कि उसे रूकना पड़ा. ऐसे वह जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था. क्योंकि डर उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. उसने देखा भी था कि कुछ लोग रास्तें में खड़े थे, पर उसने ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी थी. उसके बाल उलझे हुए और बेतरतीब थे. दाढ़ी भी बड़ी हुई थी. लगता था कि न बालों में कंघी की है, न बढे हुए दाढ़ी पर ही उसका ध्यान गया है. कुर्ते पैजामे में लिपटे इसके दुबले पतले शरीर को देखकर पता लगाना मुश्किल था कि वह किस मजहब या धर्म से सम्बन्ध रखता है. रूकने के बाद भी वह मुड़ना नहीं चाहता था, पर मुड़ना तो पड़ा ही, क्योंकि न जाने क्यों उसे लगा कि कर्कश आवाज अकेली नहीं है. मुड़ते ही उसने देखा कि वह तो खूंखार और खून के प्यासे शैतानों के बीच घिरा हुआ था.

“तू कौन है रे ? क्या नाम है तेरा?” उन्हीं शैतान चेहरे वालों में से किसी ने पूछा.

“स्वप्न”. ऐसा लग रहा था कि वह सचमुच भयानक सपना देख रहा था और उसी बीच उसके मुंह से आवाज निकली थी.

“तेरी माँ की. स्वप्न, स्वप्न क्या रे? साला,सपना देख रहा है क्या?”

वह बुरी तरह डर गया. उसे लगा कि घर तो निकट ही है. क्यों न दौड़ कर पहुँच जाये. पर उसे अब तक उन लोगों ने घेर लिया था. आसान नहीं था घेरे को तोड़ना. ऐसे वह अपने को बहुत साहसी मानता था, पर आज तो उसका साहस भी जबाब दे रहा था. न जाने यह कैसा संकट आ पड़ा था. उसके मुंह से आवाज नहीं निकली, पर उसने देखा कि सब प्रायः उसी के उम्र के है. पर उनके चेहरे. वे ऐसे भयानक नजर आ रहे थे कि उसका दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि वे लोग इसी इसी दुनिया के वाशिंदे थे. वे तो उसे शैतानों की औलाद लग रहे थे. पूरी तरह हथियारों से लैस थे वे लोग. मरने मारने को तैयार.

” बेटे,कुछ तो नाम होगा तेरा?यह स्वप्न, स्वप्न क्या लगा रखा है? आगे तो कुछ बोल. ”

वह सोच रहा था कि अपने इस बाप को आगे क्या कहे. तब तक दूसरे की आवाज सुनाई पडी, “साला कटुआ लगता है. देखते नहीं किस तरह दाढी बढाए हुए है. जरूर कोई मुल्ला है. अब घिर गया है तो बहाना बना रहा है. ”

वह दहल उठा. इस कटुआ शब्द की गाली के साथ जुड़े हुए सत्य से वह पूर्ण परिचित था. पर वह अभी भी समझ नहीं पा रहा था कि इन शैतानों के चंगुल से वह कैसे निकले? तभी उसके मोहल्ले की ओर से हर हर महादेव का जोरों का नारा सुनाई दिया. वह दहल उठा. वह सरकारी क्वार्टर में अपने माता पिता के साथ रहता था. उस छोटे से सेक्टर में पहले ज्यादा हिन्दू कर्मचारी रहते थे, पर मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या भी दूसरे सेक्टरों के अपेक्षा अधिक थी. फिर पता नहीं क्या हुआ, वहाँ धीरे धीरे मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या बढ़ने लगी और हिन्दू कर्मचारी वहाँ से हटने लगे. उसको तो पता भी नहीं चला और वह इलाका मुस्लिम बहुल हो गया. उसका परिवार उन गिने चुने हिन्दू परिवारों में था, जो अभी तक वहाँ डटे हुए थे. पर अभी यह सब सोचने का अवसर तो उसके पास था नहीं. उसे तो अपने आपको इन दरिंदों से बचाना था. तुर्रा यह कि उनमे से कुछ चेहरों को वह पहचानता था. वे वहीं के गुंडे थे. वे अपने को हिन्दू कहते थे और उसका दिखावा भी बहुत करते थे. हो सकता हैं कि दूसरे अवसर पर शायद वे भी उसे पहचान पाते, पर आज तो सब पहचान मिटता हुआ नजर आ रहा था. उसने अपना नाम भी बता दिया था. वह अपने को उसी नाम से जानता था. उसे कुछ याद सा आ रहा था कि स्वप्न के आगे भी कुछ था. शायद सेनगुप्ता, दासगुप्ता , बनर्जी या चटर्जी, पर वह तो यह सब कब का भूल चुका था. उसे तो आज इनसे सुनकर ध्यान आया था कि वह हिन्दू है, पर हिन्दू होने का क्या प्रमाण है , उसे तो यह भी ज्ञात नहीं था. स्वप्न ने जबसे होश संभाला है,वह अपने को केवल एक इन्सान मानता था,न कम न ज्यादा.

—————–

सबेरे सबेरे ही वह लाईब्रेरी चला गया था. लाइब्रेरी में पढने से ज्यादा वह शकुन की तलाश में जाता था. उस समय तो सब कुछ सामान्य था. सर्वत्र शान्ति थी. उसने जाते जाते निगाह डाली थी. लोग अपने अपने कार्यों में लगे हुए थे. लाइब्रेरी से निकला तो दिन ढलने ही वाला था. उसको तो पता भी नहीं चला कि इस बीच क्या हुआ है, उसने ध्यान नहीं दिया था. लाइब्रेरी धीरे-धीरे खाली होने लगी थी. जब वह निकला तो वह अकेला ही था. उसको आश्चर्य हुआ. ऐसा तो कभी नहीं होता था. हालाँकि सब उस जैसे लाईब्रेरी में समय बिताने वाले नहीं थे,पर पर प्रायः एक दूका लोग रहते ही थे. लाइब्रेरियन भी सबके बाद ही निकलता था, पर आज तो वह भी गायब हो चुका था. रह गया था,उसका यह सहायक. उसने पूछा था,”क्या बात है? इतना सन्नाटा क्यों है?

उसने बताया था,” शहर के दूसरे कोने में कुछ गड़बड़ी हुई है,शायद कुछ दंगा फसाद हुआ है,अतः लोग निकल गए हैं. मेरा घर तो पास ही है. आप भी तो पास ही रहते हैं. इधर तो कुछ है नहीं ,इसीसे मैं रूक गया था. अब मैं भी जल्दी से बंद करके निकल जाऊँगा. ”

वह थोडा सोचने पर मजबूर हुआ कि यह कैसे हो गया? यहाँ तो ऐसा कुछ होने की कोई उम्मीद नहीं है. फिर सोचा कि शायद छोटी मोटी कोई घटना घटी हो और अफवाह के कारण लोग भयभीत हो गए हों. यही सब सोचते सोचते वह बाहर निकल आया. पर बाहर निकलते ही उसे डर सा लगा उसे पता भी नहीं चल रहा था कि वह क्यों डर रहा है,फिर भी वह डर रहा था. वातावरण में कुछ् ऐसा अवश्य था, जो सामान्य नहीं था अजब की निस्तब्धता थी. एक गहरा सन्नाटा छाया हुआ था. अभी भी रोशनी थी, पर उसे तो अन्धेरा लगने लगा था. वह एक निर्भीक युवक था. अकारण ही डरने वाला नहीं था. पर आज निर्भीकता की जगह बेचैनी ने ले ली थी. न जाने क्यों कुछ अघटित के घटित होने की आशंका उसे परेशान कर रही थी. घर से पुस्तकालय की दूरी अधिक नहीं थी. वह अक्सर पैदल ही आता जाता था,पर आज उसे लगा कि रिक्शा मिल जाता तो अच्छा होता. पर रिक्शा की कौंन कहे, आदमी भी नहीं दिख रहे थे. वह तेज तेज क़दमों से पैदल ही घर की ओर चल पड़ा. वातावरण उसे परेशान कर रहा था, पर अब तो वह घर के निकट पहुँच रहा था.

————

आवाज गूंजी, “अबे तुम लोग चुपचाप क्यों खड़े हो?” बोलने वाला शख्स शायद उन लोगों का सरगना था. मन किया उसका कि नजर उठा कर देखे ,पर हिम्मत नहीं हुई. इसी बीच किसी ने उसपर छुरे से वार किया. उसने बाजू उठा कर रोकने का प्रयत्न किया. बाजू से खून की धारा निकल पडी. ,पर दूसरा वार होता,इससे पहले ही, न जाने क्यों, उनमें से एक बोला,” यार कहीं यह हिन्दू ही न हो. नाम तो किसी बंगाली का लगता है,पर ”

“यार. साला बंगाली होता तो नाम के आगे कुछ तो होता. “फिर वह स्वप्न की ओर मुड़कर बोला, “अबे बता तो सही कि तुम बनर्जी ,चटर्जी, दासगुप्ता, सेनगुप्ता, क्या हो?”

वह उन लोगों को क्या बताता? उसे तो स्वयं याद नहीं था कि वह क्या है? उसकी चुप्पी उन लोगों को असह्य हो रही थी. स्वप्न तो अब डर से कांपने लगा था. बाजू से निकलते खून से उसे कमजोरी भी महसूस हो रही थी.

तभी उसे एक आवाज सुनाई पडी. उन्ही में से कोई बोल रहा था, “साले के कपडे उतार डालो. अपने आप पता चल जाएगा. ”

स्वप्न को पता नहीं चल रहा था कि यह क्या बहशीपन है? कौन है ये सब? ये तो जानवर भी नहीं लग रहे हैं, क्योंकि जानवर भी ऐसा व्यवहार नहीं करते. आखिर इनका नस्ल क्या है? मन ही मन वह सोच रहा था कि आखिर कोई इनसे पूछता क्यों नहीं. उसको अब पक्का विश्वास हो गया था कि आज इन हैवानो के हाथों उसकी मौत निश्चित है. ऐसा विचार मन में आते ही गजब की शान्ति उसके दिलों दिमाग पर छा गयी.

उसी में से कोई चिल्ला रहा था, ”यार जल्दी से इसका काम निपटा,नहीं तो यहाँ भी गश्ती दल आ पहुंचा तो साला निकल जाएगा.”

वह जानता था कि अगर उसके कपडे खोल दिए गए तो वह नहीं बच सकता. वह मन ही मन प्रार्थना करने लगा कि कोई तो आ जाए, जो उसको बचा ले. दूर से बहुत सी आवाजें भी उसके कानों तक पहुँचने लगी थी, पर निकट में तो केवल वे लोग थे.

उन्होंने उसके कपडे़ खीचने शुरू किये. अब उसका पैजामा खुल चुका था, अंडरवीयर भी खुलने ही वाला था. उसने अपना पूरा जोर लगा दिया ,जिससे वे अंडरवीयर न खोल सकें, पर चार-चार लगे हुए थे उसके कपडे़ उतारने में अकेला वह क्या करता? अंत में उन लोगों की जीत हुई और अब वह उन दरिंदों के बीच नंगा खड़ा था. उस पर नजर पड़ते ही वे चिल्ला उठे, “साला कटुआ?अपने को हिन्दू बता रहा था. इसको मालूम नहीं कि हमारी नज़रों से छिपना इतना आसान नहीं है. ”

फिर तो क़यामत आ गई उसको सफाई देने का भी अवसर नहीं मिला कि उसका वास्तव में खतना नहीं हुआ है. वहाँ संकर्मण के कारण ऊपर का हिस्सा आपरेशन करके हटाना पड़ा था. अपने शिकार को बुरी तरह रौंद कर वे सब आगे बढ़ गए, स्वप्न मदद के लिए भी चिल्लाया था, पर जब तक कोई आता ,तब तक वे अपना काम करके जा चुके थे. जो लोग वहां पहुंचे वे स्वप्न को पहचानते थे. उन्हें उसके घायल किये जाने पर आश्चर्य भी हुआ, पर खून से लथपथ शरीर में उसकी वह निशानी दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी, जो इसके इस अवस्था का कारण बनी थी. उन्होंने उसके शरीर को ढंकने का प्रयत्न किया. गस्ती दल बाद में पहुंचा और उसे वे लोग मरणासन्न अवस्था में अस्पताल ले गए.

————–

दूसरे दिन समाचार पत्र में इसका विस्तृत समाचार इस तरह प्रकाशित हुआ था.

कल दोपहर को शहर के एक हिस्से में एक छोटी बात पर दो समुदायों के बीच मारकाट शुरू हो गयी,जब तक पुलिस हरकत में आती, तब तक दोनों समुदायों के चार पांच व्यक्ति मारे जा चुके थे और दर्जनों घायल हो गए थे. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहर के उस हिस्से में कर्फ्यू लगा दिया गया था.

शाम होते-होते शहर के दूसरे भाग में भी इसका असर दिखाई दिया,जहाँ एक समुदाय के चार व्यक्तियों की हत्या हो गयी. तब तक गस्ती दल वहाँ भी पहुंच गयी. वहां दूसरे समुदाय का केवल एक व्यक्ति बुरी तरह घायल हुआ था और मरणासन्न अवस्था में पड़ा था. उसे अस्पताल पहुंचाया गया, पर वहाँ उसने दम तोड़ दिया.

13 Responses to “खतना”

  1. RTyagi

    कहानी अच्छी थी… और अपना सन्देश देने में सफल हुई… पात्र किसी भी धर्म संप्रदाय के हो सकते थे… “छोटी मानसिकता” किसकी है.. अब यह कहने की ज़रुरत नहीं है… बुजुर्गो और बड़ो से किस तरह बात की जाती है.. यह सीखना पहले ज़रूरी है..

    आर सिंह जी, कहानी के लिए धन्यवाद्… प्लीज keep writing.

    Thanks,

    Reply
  2. RTyagi

    कहानी अच्छी थी… और अपना सन्देश देने में सफल हुई… पत्र किसी भी धर्म संप्रदाय के हो सकते थे… “छोटी मानसिकता” किसकी है.. अब यह कहने की ज़रुरत नहीं है… बुजुर्गो और बड़ो से किस तरह बात की जाती है.. यह सीखना पहले ज़रूरी है..

    आर सिंह जी, कहानी के लिए धन्यवाद्… प्लीज keep writing.

    Thanks,

    Reply
  3. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbalhindustani

    कहानी झूठी या सच्ची नही होती वेह एक संदेश देने के लिए होती है. आर सिंह जी की कहानी इस मकसद में कामयाब है. पात्र बदलने से भी वही संदेश जायेगा जो वे देना चाहते हैं.

    Reply
  4. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    आर सिंह जी धारा के विपरीत बहना अच्छी बात है किन्तु वहां आप सिर्फ अपनी जिन्दगी को खतरे में डालते हैं दूसरी तरफ आपने जो अपनी कहानी के पात्रों का इकतरफा चरित चित्रण किया है उससे आपने पूरे हिन्दू समाज को ही दोषी सिद्ध करने का प्रयास किया है जो किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, वो भी अभी हाल ही में हुए कोसी (मथुरा) के दंगों को देखते हुए तो बिलकुल भी नहीं जिसमे हजारों हिन्दू बर्बाद हो गए हैं….

    Reply
  5. आर. सिंह

    आर.सिंह

    मुकेश जी अभी आप युवा हैं.कुंठा से ग्रस्त होना क्या होता है,इसे समझने में आपको देर लगेगी.रह गयी बात मेरी तो अपने बारे में मैं कुछ नहीं कहता.जो कहना होता है,उसे मैं प्रवक्ता,फेसबुक,ट्विट्टर और देशी विदेशी पत्रों में टिप्पणियों के माध्यम से कहता हूँ.आपके टिप्पणी के पहले मेरी जो टिप्पणी है ,उसको शायद आपने पढ़ा नहीं .
    रह गयी. प्रसिद्धि पाने की बात ,तो उसकी इच्छा कभी नहीं रही.हाँ यह अवश्य है की धारा के साथ बहने को मैं जिन्दगी नहीं मानता.

    Reply
  6. dr dhanakar thakur

    मैं क्या हूँ वह प्रश्न नहीं है
    मैं आपकी उम्र की इज्जत करता हूँ पर आपके कहानी की समीक्षा मैंने जो की है उसे किसी समीक्षक से बता राय ले लेंगे.
    आपने कथानक से मुस्लिम दागे भीड़ का चित्र बनाना था हिन्दू का नहीं वैसे मैं किसी भी ऐसे बाँटनेवाली चीज के खिलफ हूँ जो भड़काऊ हो.
    ,
    मैं अपनी मातृभाषा का कथाकार aaur समीक्षक भी माना जाता हूँ.वैसे iskee jaroorat नहीं है

    Reply
  7. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    आर.सिंह जी किसी कुंठा से ग्रसित हैं, इनको सदा से हिन्दू ही गलत और अतिवादी गुंडे नजर आते हैं दूसरी तरफ तो सारे मानवता के पुजारी ही हैं ना….वैसे भी हिन्दू नाम रखकर यदि हिन्दुवों को ही बुरा भला कहेंगे तो जल्दी प्रसिद्धि मिल जायेगी ना

    Reply
  8. आर. सिंह

    आर.सिंह

    डाक्टर ठाकुर ,आपके नाम के आगे डाक्टर जुड़ा हुआ है,यह दर्शाता है कि आपने किसी क्षेत्र में रीसर्च किया हुआ है,पर पता नहीं की वह क्षेत्र कहानी है या नहीं.आपने यह भी लिखा है कि कहानी लिखी नहीं जाती ,पर लिख जाती है.अब आईये इस छोटी कहानी के मुद्दे पर.इसमें भडकाऊ क्या है?अब कृप्या आप मुझे शब्द चित्र की परिभाषा बतायेंगे?यह छोटी कहानी कहानी न होकर शब्द चित्र क्यों है?इसमें जिन पात्रों का उल्लेख है वे ऐसे पात्र हैं,जिनका एक कोई ख़ास रूप नहीं हैं.वे या तो आम दंगाई हैं या एक निरीह इंसान.वह तो कोई भी हो सकता है.मैंने लिखा है कि दंगों की विभीषिका और उसका घिनौना रूप मेरा देखा हुआ है.अब यह आप पूछ सकते हैं कि आज यह कहानी क्यों लिखी गयी ,पहले क्यों नहीं?तो उसका उत्तर यही है कि समय बदल गया है ,पृष्ट भूमि बदल गयी है,पर हमारी संकुचित विचार धारा आज भी कायम है.१९४७-४८ के दंगों के बारे में बहुत रचनाएं हैं,जिसमे से अधिकतर भुक्त भोगियो द्वारा लिखी गयीं हैं वे सब भी उपन्यास और कहानियों के रूप में हैं.उन्हें किसी ने शब्द चित्र नहीं कहा है.
    सही है कि मेरी उम्र ७० से ज्यादा है,पर आग अभी भी नहीं बुझी है.आज जब एक जूट होकर भारत निर्माण की आवश्कता है तो हम भंवर जाल में फंसे हुए हैं.
    मैंने अपनी पहली टिप्पणी की समाप्ति इस वाक्य से की थी कि “मैं मानता हूँ कि अगर यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर नहीं कर रही है तो इसका लिखा जाना और प्रकाशन दोनों बेकार है” और अब भी उस पर कायम हूँ..
    मैं यह भी बता दूं कि मैं फेसबुक पर जो टिप्पणी देता हूँ ,वह मेरी असल व्यग्रता दर्शाती है.उसमें से एक यहाँ उद्धृत है.
    “कल मैंने फेशबुक पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया के माध्यम से एक टिप्पणी दी थी.पता नहीं आपलोगों में से कितने लोगों ने उसे पढ़ा या देखा है.आज मैं वही टिप्पणी यहाँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ.
    I HAVE PANACEA FOR FOR ALL ECONOMICS ILLS OF INDIA.NOTHING IS INSURMOUNTABLE.THERE IS LACK OF KNOWLEDGE OF GROUND REALITY OF INDIA TOGETHER WITH ARROGANCE AND DISHONESTY.THERE IS NO WILL TO SOLVE THE PROBLEM AS WELL.IF YOU FIND MY CLAIM TO BE FALSE,I AM READY TO FACE GALLOWS.YOU CAN HANG ME IN FULL PUBLIC VIEW.

    Indian economy facing difficult times: Manmohan Singh – The Times of India
    timesofindia.indiatimes.कॉम”
    आप चाहे तो कह सकते हैं कि बूढ़े का दिमाग खराब हो गया है.

    Reply
  9. dr dhanakar thakur

    बंधुवर सिंघजी,
    फोटो से देखने में आप मुझे मुझसे बुजुर्ग लगते हैं.
    मैं आपकी इज्जत करता हूँ
    यथार्थ शब्दचित्र होते हैं कहानी नहीं

    आपने सच ही माना है की आप कोई कहानी लेखक नहीं मानता.
    पर आसपास केविचारों ,घटनाओं को आपने जो एक रूप दिया है वह एकपक्षीय है
    किसी लेखक को इससे बचना चाहिए
    हमें १९४६-४७ के दंगों की भी कहानियाँ पढी हैं? इसके पहले की भी नादिरशाह, अब्दाली, चंगेज खान तक की
    पर किसी भी संहार को उचित ठहरानेवाले गलत हैं
    दंगाई केवल दंगाई होते हैं पर आपने केवल एक तरफ़ा वह भी शब्द विन्यास के अनुरूप्प अलग प्रस्तुति की है
    इसका इस प्रकार लिखा जाना भड़काऊ है और प्रकाशन के नियमों के विरुद्ध है . आपको स्वयम इसे हटाने के लिए लिखना चाहिए और संतुलित कहानी प्रस्तुत करनी चाहिए वैसे आपकी जो इच्छा . मैं इस पर विवाद नहीं चाहता वैसे भी करीब १ओ दिन मैं बहार हूँ- दिल्ली, नाग्लोरे आदि

    Reply
  10. आर. सिंह

    आर.सिंह

    “बीमार मानसिकता’ का शिकार कौन?
    आगे मैं कुछ नहीं कहूँगा ,क्योंकि मुझे उस दार्शनिक की कहानी याद है,जो कारागार में बंद था.

    Reply
  11. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यह यथार्थ क्यों नहीं हो सकता?इसे कल्पना की उपज मानने का कारण?
    मैं तो अपने को कहानी लेखक भी नहीं मानता.मैं तो आसपास के कुछ विचारों ,कुछ घटनाओं को केवल एक रूप देता हूँ.दंगों की विभीषिका और उसका घिनौना रूप मेरा देखा हुआ है.अगर लोग इस यथार्थ को सहन नहीं कर पा रहे हैं तो अपने दिल से पूछें कि क्या यह केवल कल्पना की उपज ही हो सकती है? लोग जब १९८४ और २००२ के नर संहार को उचित ठहराने लगते हैं तो यह भूल जाते है कि दंगाई केवल दंगाई होते हैं.जिस तरह आतंक वादियों का कोई ईमान नहीं होता ,मेरेविचार से उसी तरह दंगाइयों का भी कोई ईमान,धर्म नहीं होता.
    मैं मानता हूँ कि अगर यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर नहीं कर रही है तो इसका लिखा जाना और प्रकाशन दोनों बेकार है.

    Reply
  12. dr dhanakar thakur

    संपादक को इसे अबिलम्ब हंटा देना चाहिए

    आपने गलत ढंग से अपने मनोभाव को एक झूठी कहानी का शक्ल दे दिया है
    मैं भी अपनी भाषा का एक माना हुआ कहानीकार हूँ
    कहानियाँ बनाई नहीं जाती बन जाती हैं
    हर कहने एमे कहानीकार अपने को कहता है आपने अपनी बात काफी गलत ढंग से रख दी है
    वैसे कोई चाहे तो इसे उलटे ढंग से भी रख सकता है पर वह भी गलत ही होगा
    आपकी कहाने एकी समीक्षा मैं कर ही देता हूँ संक्षेप में
    “अबे रूक ” से प्रम्भिस कहानी के अल्फाज किस भीड़ को बताते हैं?
    “दाढ़ी भी बड़ी हुई थी-” किसकी?

    “तू कौन है रे ? क्या नाम है तेरा?” जैसे शब्द में पूछनेवाले कौन हो सकते हैं?
    “स्वप्न”.
    “हर हर महादेव,” क्यों नहीं “अल्लाह हो अकबर ” सुनाई पडा ‘अबे बोलनेवालों को
    जबकि ” वहाँ धीरे धीरे मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या बढ़ने लगी और हिन्दू कर्मचारी वहाँ से हटने लगे”

    आपने एक गलत कहानी लिख डाली है वैउसे भी ऐसी झूटी उन्मादी दो सम्प्रदायों के बीच घृणा पैदा करनेवाली कहानियाँ न लिकी जानी चाहिए न ही प्रकाशित करनी चाहिए

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *