लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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मेरे घर के पास ही रविवार को पटरी बाजार लगता है। मैं अपनी जरूरत का अधिकांश सामान वहीं से खरीदने की कोशिश करता हूं। वहां से न मिले, तो फिर किसी छोटी दुकान को प्राथमिकता देता हूं। हो सकता है आप इसे सस्ते-महंगे या और किसी कसौटी पर परखें; पर इसके पीछे एक घटना है।

main-sari-sellerकई साल पुरानी बात है, मैं किसी काम से मेरठ गया था। काम में दो दिन लगने थे। वहां मेरा पुराना मित्र हरीश रहता है। घरेलू सम्बन्ध होने के कारण मेरठ जाने पर मैं वहीं रुकता हूं। इस बार भी ऐसा ही किया। दो दिन रुकना था, इसलिए कुछ जरूरी सामान और कपड़े साथ लाया था; पर न जाने कैसे तौलिया छूट गया। पहले दिन काम निबटा कर मैं हरीश के कार्यालय चला गया। वहां मैंने तौलिये की बात बताकर कहा कि आसपास कोई अच्छी दुकान हो, तो वहां से वापसी पर एक तौलिया लेते चलेंगे। हरीश ने कहा कि उसके घर के पास जो बाजार है, वहां से ले लेंगे।

हरीश के घर के पास कपड़े की कई दुकान हैं। कुछ बहुत पुरानी और बड़ी हैं, जबकि कुछ छोटी। मैंने बड़ी दुकान पर चढ़ना चाहा; पर हरीश ने छोटी दुकान से लेने का आग्रह किया। उसकी बात मानकर मैंने वहां से 50 रु. में एक तौलिया ले लिया। रात में भोजन करते हुए मैंने हरीश से पूछा कि उसने बड़ी और पुरानी दुकान की बजाय छोटी दुकान से तौलिया क्यों लिया ?

– देखो, तौलिये की कीमत 50 रु. है। ये दोनों जगह एक जैसी ही होती। फिर भी छोटे दुकानदार को इससे अधिक लाभ हुआ।

– वो कैसे ?

– माना उस बड़ी दुकान पर दिन भर में 50 हजार रु. की बिक्री होती है। इसमें हमारे 50 रु. का कोई खास महत्व नहीं है; पर छोटी दुकान की दिन भर की बिक्री पांच हजार रु. ही है। उसमें 50 रु. जुड़ते ही उसकी बिक्री काफी बढ़ गयी। हमारे 50 रु. से बड़ी दुकान की बिक्री 0.1 प्रतिशत, जबकि छोटी की एक प्रतिशत बढ़ी। तो अधिक लाभ किसे हुआ ?

– इस गणित को तुम ही समझो; पर हमें तो इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा। हमारी जेब से तो 50 रु. ही गये ?

– हां; पर इसने छोटे दुकानदार को अधिक खुशी दी। तुम प्रायः देखते होगे कि बड़े व्यापारी ग्राहक की ओर अधिक ध्यान नहीं देते। वे जानते हैं कि उनकी दुकान पुरानी है। वहां माल की वैरायटी अधिक है। इसलिए ग्राहक झक मार कर वहीं आयेगा। कई बार तो वे मोलभाव करने वालों को झिड़क भी देते हैं; पर छोटा व्यापारी बड़े प्यार से माल दिखाता है। आपको स्थायी ग्राहक बनाने के लिए वह कुछ पैसे कम भी कर देता है। बड़ी दुकान पर दो-चार नये ग्राहक बनने या टूटने से फर्क नहीं पड़ता; लेकिन छोटे दुकानदार पर इससे बहुत फर्क पड़ता है। हमारे 50 रु. से उसकी या उसके बच्चों की न जाने कौन सी जरूरत आज पूरी हो गयी हो। यदि आज उसे कुछ खुशी मिली, तो इसका कुछ पुण्य हमारे खाते में भी तो जुड़ेगा।

मुझे इस बात में तर्क से अधिक अध्यात्म का अंश दिखा। बस, तब से मेरी कोशिश रहती है कि पटरी बाजार या छोटी दुकान से सामान लेकर दुकानदार को कुछ अधिक खुशी दे सकूं।

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