किसान आंदोलन :: जातिवाद और राजनैतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति का जरिया बना आंदोलन

1
233

भगवत कौशिक।

पिछले आठ महीने से देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर तीन कृषि कानूनों के विरोध मे चल रहा किसान आंदोलन अब पूरी तरह से राजनैतिक व जातिवाद से प्रेरित हो चुका है।शुरुआत मे जहां सरकार की तरफ से बारह दौर की वार्ता करने के बाद भी किसान नेताओं का अडियल रूख नहीं बदला और 26 जनवरी को दिल्ली मे हिंसा होने के बाद सरकार ने बातचीत का दौर बंद कर दिया।जिसके बाद से आंदोलन को जिंदा रखने की चुनौती ने किसान नेताओं की चिंता बढा दी।आंदोलन की शुरुआत से ही आंदोलन के राजनैतिक होने के आरोप लगते रहे है लेकिन किसान नेताओं दवारा लगातार इन आरोपों को खारिज किया जाता रहा है।
किसान आंदोलन की शुरुआत जहां पंजाब से हुई वहीं इसका प्रभाव केवल तीन राज्यों पंजाब, हरियाणा एंव राजस्थान मे ही देखने को मिल रहा है,इसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। एक तरफ जहां पंजाब व राजस्थान मे कांग्रेस की सरकार है जो आंदोलन के लिए फंडिंग समेत सभी व्यवस्थाएं मुहैया करवा रही है तो वहीं हरियाणा मे बीजेपी के खिलाफ एक विशेष वर्ग खिलाफत का माहौल बनाने की कौशिश कर रह है।हरियाणा मे आंदोलन का प्रभाव जाट बहुल इलाकों व पंजाब के साथ लगते इलाकों मे ही ज्यादा है।इसके साथ साथ आंदोलन स्थलों पर कांग्रेस,कंम्यूनिस्ट पार्टियों सहित विपक्षी दलों दवारा सहयोग किया जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर आंदोलन को लीड कर रहे भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत का राजनैतिक रूझान सभी को पता है।वे निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा का चुनाव भी लड चुके है,लेकिन उनको करारी शिकस्त का सामना करना पडा था ।वहीं हाल ही मे संपन्न यूपी पंचायत समिति चुनाव मे भी राकेश टिकैत समर्थित प्रत्याशी को करारी हार का सामना करना पडा।अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी न होते देख राकेश टिकैत जहां आए दिन पागलों की तरह अनगर्लत ब्यानबाजी कर रहे है वही आज उन्होंने सरकार को देश मे गृहयुद्ध करवाने की धमकी देकर न केवल देशद्रोह का काम किया है अपितु दिखा दिया है कि आंदोलन तो केवल बहाना है,आंदोलन की आड मे बीजेपी व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ माहौल बनाकर राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना है।टिकैत ने कहा कि किसान पंचायत तक सरकार के पास 2 महीने हैं और सरकार मान नहीं रही है। टिकैत ने आगे कहा कि ऐसा लग रहा है कि देश में जंग होगी और गृहयुद्ध होगा।

आंदोलन के तथाकथित सभी किसान नेताओं का कंम्यूनिस्ट पार्टियों से रिश्ता रहा है।जिसके कारण आंदोलन पूरी तरह से किसानों के हाथों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धुमिल करने की कौशिश करने वाले वांमपंथियो के हाथों मे चला गया है।वांमपंथी दल जिनका कभी देश के सात राज्यों मे शासन होता था, अब केवल केरल तक सीमित हो गए है।किसान आंदोलन के जरिए अपने अस्त होते राजनैतिक अस्तित्व को बचाने के लिए इनका संघर्ष जारी है।

किसान आंदोलन अब जहां केवल और केवल भाजपा और सरकार के विरोध का जरिया बन गया है।जिन राज्यों मे भाजपा की सरकार है वहीं प्रदर्शन व भाजपा नेताओं का घेराव किया जा रहा है।जिन राज्यों मे अन्य दलों की सरकार है वहां किसानों की हालत दयनीय होने के बाद भी तथाकथित किसान नेता चुपी साधे हुए है।आंदोलन को चला रहे संगठनों मे सबसे ज्यादा संगठन पंजाब से तालूक रखते है।जब किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढुनी ने अन्य राज्यों की तर्ज पर पंजाब मे भी राजनैतिक तौर पर उतरने व पंजाब के किसानों की दयनीय स्थिति की बात उठाई तो उन्हें सयुंक्त किसान मोर्चे से निलंबित कर दिया गया।

भगवत कौशिक

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here