गणेश चतुर्थी व्रत करने पर कृष्ण हुये स्वयमंतक मणि चोरी के कलंक से मुक्त

आत्माराम यादव पीव

एक समय भादों कृष्ण की चतुर्थी के दिन महादेव जी कहीं गये हुये थे तब पार्वती जी घर पर अकेली थी और उनके स्नान का समय हो रहा था। स्नान के दरम्यान कोई स्नानागार में प्रवेश न करें इस लिये उन्होंने सुरक्षा के लिये किसी गण के न होने पर अपने शरीर से मिट्टी निकालकर एक पुतला बनाकर उसमें प्राणसंचार कर उसे द्वार पर खड़ा कर दिया। कुछ समय बाद शिवजी लौटे और द्वार में प्रवेश करने को हुये तब उस पुतले ने उन्हें भीतर जाने से रोका। शिवजी नाराज हो गये और उसका सिर काटकर भीतर चले गये। शिवजी को भीतर आया देख पार्वती जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा क्या तुम्हें द्वार पर किसी ने रोका नहीं? शिवजी ने विस्तार से बताया कि मुझे रोका था मैंने उसका सिर काट दिया। पार्वती जी दुखी होने के साथ क्रोधित हो गयी बोली, वह मेरे पुत्र समान था जब तक उसे जीवित न करोंगे मैं शांत नहीं होने वाली। शिवजी बाहर आये तो देखा उनका असली सिर कहीं गायब हो गया है तो उन्हें बड़ी असुविधा हुई। उन्होंने देखा जंगल में एक हाथी का बच्चा है उसका सिर उन्होंने काटकर जोड़़ दिया इस प्रकार गणपति की उत्पत्ति हुई। जिस समय शिवजी ने हाथी के बच्चे का सिर जोड़कर प्राण संचार किये वह दिन भादौ की चैदस के दिन के 12 बजे का था, तभी से उनके जन्म का समय यह तय हो गया।गणेश जी मंगल करने वाले और हर काम को सिद्ध करने वाले देवता के रूप में पूज्य हुये तब से किसी को भी कोई संकट या चोरी का अपवाद से बचने के लिये गणेश चतुर्थी का विधिवत व्रत करने एवं चान्दी, ताम्बे की गणेश प्रतिमा को दान करने का विधान है।
स्कन्ध पुराण में उल्लेख किया गया है कि इस दुनिया में इस गणेश चतुर्थी का व्रत सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने किया था इसके बाद युधिष्ठिर ने यह व्रत करके कुरूक्षेत्र के रण में विजय प्राप्त की थी। श्रीकृष्ण द्वारा गणेश चतुर्थी व्रत करने के सम्बन्ध में कहा गया है कि द्वारकापुरी में निवास करने वाले अग्रसेन के पुत्र सत्रजीत के पास स्यमंतक मणि के चोरी हो जाने और उनके दूसरे बेटे प्रसेन की हत्या किये जाने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा था तब उन्होंने यह व्रत किया था और इसके करने के बाद स्यमंतक मणि खोजकर सत्रजीत को लौटा दी थी। कथानुसार सत्रजीत ने सूर्यदेवता की कठोर पूजा के बाद स्यमंत मणि वरदान में दी और कहा कि जो पवित्र है वही इस मणि को धारण कर सकता है और कोई अपवित्र व्यक्ति इसे धारण करेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। सत्रजीत सूर्य देवता से मणि प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण से मिला और पूरी बात सुनाई और उन्हें मणि पहनने को दिखाई। तब भगवान ने प्रसन्न होकर कहा कि यह मणि मुझे पहनने को मिलती तो अच्छी लगती यह बात सुनकर सत्रजीत भयभीत हो गया कि कहीं श्रीकृष्ण मुझसे यह मणि जबजस्ती न छीन ले। कृष्ण की बात सुन उनसे मणि वापिस लेकर सत्रजीत अपने घर आ गया और प्रतिदिन सुबह पूजन के बाद मणि के वजन का आठ गुना सोना प्राप्त कर दान देने लगा जिससे आसपास उसकी कीर्ति फैलने लगी। इस बात की जानकारी यादवों को मिलने पर वे महामंत्री अक्रूर के साथ सत्रजीत के पास वह मणि राजकोष के लिये माॅगने गये थे लेकिन सत्रजीत और प्रसेन ने वह मणि देने से इंकार कर दिया। अगले ही दिन सत्रजीत का छोटा भाई प्रसेन जंगल में शिकार के लिये निकला तब उसने अपने बड़े भाई से वह स्यमंतक मणि सुरक्षा की दृष्टि से घर में न रखकर अपने पास रखने की माॅग की जिसे सत्रजीत ने स्वीकार कर वह मणि उसे सौप दी। देर रात तक प्रसेन शिकार से नहीं लौटा तब सत्रजीत को आशंका हुई और उसने अपने पडौसियों को सारा अक्रूर द्वारा मणि माॅगने और उसके न देने का वृतांत सुनाया और कहा इसलिये उन्हें मणि न देने से उनके द्वारा मेरे छोटे भाई से मणि छीन कर उसकी हत्या कर दी गयी है। इसी अनुमान वे भाई को खोजने जंगल में पहुॅचे तब उन्हें उसके अंगवस्त्र मिले तब सबको विश्वास हो गया कि उनके भाई प्रसेन से मणि छीनकर हत्या कर दी है और यह आरोप श्रीकृष्ण के ऊपर लगे।
द्वारकापुरी में हर व्यक्ति स्यमंतक मणि को छीनकर प्रसेन की हत्या के लिये कृष्ण को दोषी मानने लगा। तब कृष्ण सत्रजीत और गाॅववालों को लेकर उस स्थान तक पहुॅचे जहाॅ प्रसेन के अंगवस्त्र मिले थें । वे जंगल में आगे बढ़े तो उन्हें प्रसेन का धनुषबाण, मुकुट आदि प्राप्त हुये। कुछ दूर जाने पर उन्हें प्रसेन के शरीर के कुछ भाग मिले जिसे देख लगता था किसी जानवर ने उसके शरीर को अपना भोजन बनाया है। थोड़ी ही दूर बाद एक मृत शेर मिला और वहाॅ शेर और किसी रीछ की लड़ाई के पदचिन्ह दिखे। थोड़ी ही दूरी बार एक गुफा दिखी कृष्ण ने अपने संगी-साथियों को वही छोड़ गुफा में प्रवेश किया। गुफा काफी गहरी और लम्बी थी। गुफा के आखिरी छोर पर एक महलनुमा भवन दिखा जहाॅ एक झूले पर एक सुकुमार युवती झूला झूल रही थी और उसके हाथों में मणि थी जो गाना गाते और झूलते समय नीचे गिर गयी। वह मणि को उठाने बढ़ी कि श्रीकृष्ण ने तत्काल उस मणि को उठा ली। श्रीकृष्ण और उस युवती की नजरें मिली तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये, तब युवती ने कहा कि मेरे पिताजी आये उसके पूर्व आप यह मणि लेकर चले जाये नहीं तो वे आपको जीवित नहीं छोड़ेगे। कृष्ण ने अपना शंख बजाया तब जामवंत जी आये और कृृष्ण और जामबंत में भिडन्त हो गयी जो 21 दिनों तक चली। गुफा के बाहर लोगों ने समझा कृष्ण मारे गये इसलिये वे वापिस लौट गये। 21 दिन बाद जामबंत युद्ध में हार गये तब उन्होंने श्रीकृष्ण को रामरूप में पहचान कर अपनी कन्या जामबंती का विवाह श्रीकृष्ण से कर उक्त मणि दहेज मंें दे दी। कृष्ण ने जामवंत से प्राप्त स्यंमतक मणि सत्रजीत को लौटा दी किन्तु सत्रजीत ने मणि न लेकर भगवान कृष्ण को अपनी पुत्री सत्यभामा का हाथ थमाकर वह मणि उन्हें सप्रेम भेंट कर दी।
श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगने और उनकी सभी ओर निंदा होने पर स्कंद पुराण में नारद जी द्वारा बताया गया कि यह सब कलंक इसलिये लगा क्योंकि भगवान कृष्ण ने चैथ का चन्द्रमा देखा था। तब भगवान ने नारद जी से पूछा कि भादों की चैथ को चन्द्रमा देख लेने से कलंक क्यों लगता है? नारद जी ने बताया कि एक समय गणेश जी लडडू हाथों में लिये स्वर्ग जा रहे थे कि रास्ते में चन्द्रलोक पड़ा जहाॅ वे ठोकर खाकर गिर गये। उन्हें गिरा देख चन्द्रमा जोरों से हॅसा, गणेश जी को क्रोध आया, उन्होंने श्राप दे दिया तेरा मुॅह देखेगा कलंगी कहलायेगा। चन्द्रमा अपना मुॅह छिपाकर बैठ गया जिससे जगत में हाहाकार मच गया, सभी देवताओं ने ब्रम्हा जी की वस्तुस्थिति बतलाई। ब्रम्हा जी ने कहा कि गणेशजी की स्तुति करने के अलावा चन्द्रमा का श्राप और इस कलक को मिटाने का कोई मार्ग नहीं है। चन्द्रमा ने गणेश जी की विधिवत पूजा की तब गणेश जी प्रसन्न हुये किन्तु उन्होंने अपना पूरा श्राप वापिस नही ंलिया परन्तु उसे सीमित कर दिया कि जो केवल एक रोज गणेश चतुथी को चन्द्रमा को देखेगा वही कलंकित होगा। साथ ही उन्होंने नारद जी और देवताओं की प्रार्थना पर यह कहा कि अगर कोई गणेश चतुर्थी को विधिवत मेरी पूजा अर्चना करेगा वह इस कलंक से मुक्त होगा, जैसे की भगवान श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि की चोरी के कलंक से मुक्त हुये थे।

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