लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

मुस्लिम समुदाय में पिछले 1400 वर्ष से प्रचलित तीन तलाक की कुरीति से पीड़ित सायरा बानो नाम की महिला ने सर्वोच्च न्यायालय में दस्तक देने का वीड़ा उठाया और समाज में व्याप्त बुराई को जमींदोज कर दिया। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत से माना कि एक झटके में तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की रवायत मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन है। साथ ही यह बहस भी आगे बढ़ी कि क्या यह प्रथा इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ? पीड़ित महिलाओं समेत मुस्लिम पुरुषों का एक बड़ा तबका यह मान रहा था कि तीन तलाक की रवायत मजहब या कुरान का बुनियादी हिस्सा नहीं है। इसी मान्यता की तस्दीक सुप्रीम कोर्ट ने कर दी है। अब इस फैसले को किसी एक पक्ष की जय-पराजय के रूप में देखने की बजाय इसे मुस्लिम समाज सहित अन्य धर्मावलंबी समुदायों में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन के रूप में देखने की जरूरत है, जिससे कुरीतियां तो दूर हों ही समान नागरिक संहिता बनाने की दिशा में भी उचित पहल हो। इस मामले में यह अच्छी बात रही कि नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन तलाक के विरुद्ध अपना पक्ष अदालत में मजबूती से रखा और तीन तलाक के विरोध में देशव्यापी माहौल भी बनाने का काम किया।   दरअसल संविधान में दर्ज नीति-निर्देशक सिद्धांत भी यही अपेक्षा रखता है कि समान नागरिकता लागू हो। जिससे देश में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए एक ही तरह का कानून वजूद में आ जाए, जो सभी धर्मों, संप्रदायों और जातियों पर लागू हो। आदिवासी और घूमंतू जातियां भी इसके दायरे में लाई जाएं।  किंतु इसमें सबसे बड़ी चुनौतियां बहुधर्मों के व्यक्तिगत कानून और वे जातीय मान्यताएं हैं,जो विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और गोद जैसे अधिकारों को दीर्घकाल से चली आ रही क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को कानूनी स्वरूप देती हैं। इनमें सबसे ज्यादा भेद महिलाओं से बरता जाता है। एक तरह से ये लोक प्रचलित मान्यताएं महिला को समान हक देने से खिलवाड़ करती हैं। लैंगिक भेद भी इनमें स्पष्ट परिलक्शित रहता है। मुस्लिमों के विवाह व तलाक कानून महिलाओं की अनदेखी करते हुए पूरी तरह पुरुशों के पक्ष में हैं। ऐसे में इन विरोधाभासी कानूनों के तहत न्यायपालिका को सबसे ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ता है। अदालत में जब पारिवारिक विवाद आते हैं तो अदालत को देखना पड़ता है कि पक्षकारों का धर्म कौनसा है और फिर उनके धार्मिक कानून के आधार पर विवाद का निराकरण करती है। इससे व्यक्ति का मानवीय पहलू तो प्रभावित होता ही है, अनुच्छेद 44 की भावना का भी अनादर होता है। दरअसल ब्रिटिशकालीन भारत में 1772 में सभी धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक और संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े अलग-अलग कानून बने थे, जो आजादी के बाद भी अस्तित्व में हैं।  वैसे तो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का बुनियादी मूल्य समानता है, लेकिन बहुलतावादी संस्कृति, पुरातन परंपराएं और धर्मनिरपेक्ष राज्य अंततःकानूनी असमानता को अक्शुण्ण बनाए रखने का काम कर रहे हैं। इसलिए समाज लोकतांत्रिक प्रणाली से सरकारें तो बदल देता है, लेकिन सरकारों को समान कानूनों के निर्माण में दिक्कतें आती हैं। इस जटिलता को सत्तारूढ़ सरकारें समझती हैं। हांलाकि संविधान के भाग-4 में उल्लेखित राज्य-निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य निर्धारित है। इसमें कहा गया है कि राज्य भारत के संपूर्ण क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता पर क्रियान्वयन कर सकता है। किंतु यह प्रावधान विरोधाभासी है, क्योंकि संविधान के ही अनुच्छेद-26 में विभिन्न धर्मावलंबियों को अपने व्यक्तिगत प्रकरणों में ऐसे मौलिक अधिकार मिले हुए हैं,जो धर्म-सम्मत कानून और लोक में प्रचलित मान्यताओं के हिसाब से मामलों के निराकरण की सुविधा धर्म संस्थाओं को देते हैं। इस्लाम और ईसाइयत से जुड़े लोग इस परिप्रेक्ष्य में यह आशंका भी व्यक्त करते हैं कि यदि कानूनों में समानता आती है तो इससे बहुसंख्यकों, मसलन हिंदुओं का दबदबा कायम हो जाएगा। जबकि यह परिस्थिति तब निर्मित हो सकती है,जब बहुसंख्यक समुदाय के कानूनों को एकपक्शीय नजरिया अपनाते हुए अल्पसंख्यकों पर थोप दिया जाए ? जो पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई संभव नहीं है। विभिन्न पर्सनल कानून बनाए रखने के पक्ष में यह तर्क भी दिया जाता है कि समान कानून उन्हीं समाजों में चल सकता है,जहां एक धर्म के लोग रहते हों। भारत जैसे बहुधर्मी देश में यह व्यवस्था इसलिए मुष्किल है,क्योंकि धर्मनिरपेक्षता के मायने हैं कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों को उनके धर्म के अनुसार जीवन जीने की छूट हो ? इसीलिए धर्मनिरपेक्ष षासन पद्धति, बहुधार्मिकता और बहुसांस्कृतिकता को बहुलतावादी समाज के अंग माने गए हैं। इस विविधता के अनुसार समान अपराध प्रणाली तो हो सकती है, किंतु समान नागरिक संहिता संभव नहीं है ? लिहाजा देश में समान‘दंड प्रक्रिया सांहिता‘ तो बिना किसी विवाद के आजादी के बाद से लागू है, लेकिन समान नागरिक संहिता के प्रयास अदालत के बार-बार निर्देश के बावजूद संभव नहीं हुए हैं। इसके विपरीत संसद निजी कानूनों को ही मजबूती देती रही है। इस बाबत सबसे अह्म 1985 में आया इंदौर का ‘मोहम्मद अहमद खान बनाम षाहबानो बेगम‘ मुकदमा है। इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पक्ष में सुनाया था। फैसले को सुनाते वक्त अदालत ने यह चिंता भी प्रगट की थी कि ‘संविधान का अनुच्छेद-44 अभी तक लागू नहीं किया गया।‘ अनुच्छेद-44 को लागू करने की बात तो छोड़िए,इस फैसले पर जब मुस्लिम समाज ने नाराजी जताई तो प्रचंड बहुमत से सत्तारूढ़ राजीव गांधी सरकार के हाथ-पांव फूल गए। गोया, आनन-फनन में मुस्लिम कट्टरपंथियों की मांग स्वीकारते हुए ‘मुस्मिल महिला विधेयक-1986‘ संसद से पारित कर दिया गया। इसके बाद से लेकर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला आने तक मौलवियों की ओर से एक रटा वाक्य बोला जाता रहा कि तीन तलाक अल्लाह का कानून है, इसलिए न तो इसमें अब तक बदलाव हुआ है और न ही इसे बदला जा सकता है। तथाकथित वामपंथी प्रगतिशीलों ने भी धार्मिक चरमपंथियों की राय में अपनी राय मिलाई। जबकि दुनिया के सउदी अरब, मलेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत 20 इस्लामिक देशों में तीन तलाक को अवैध करार दिया  जा चुका है।हालांकि कई सामाजिक और महिला संगठन अर्से से मुस्लिम पर्सनल लाॅ पर पुनर्विचार की जरूरत जता रहे थे। उनकी मांग है कि तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह पर रोक लगे। इस परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम संगठनों की प्रतिनिधि संस्था आॅल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ये-मुषावरत ने भी अपील की थी कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और उलेमा मुस्लिम पर्सनल लाॅ में सुधार किए जाएं। इस्लाम के अध्येता असगर अली इंजीनियर मानते थे कि भारत में प्रचलित मुस्लिम पर्सनल लाॅ दरअसल ‘ऐंग्लो मोहम्मडन लाॅ‘ है, जो फिरंगी हुकूमत के दौरान अंग्रेज जजों द्वारा दिए फैसलों पर आधारित है। लिहाजा इसे संविधान की कसौटी पर परखने की जरूरत है। लेकिन रूढ़िवादी समूह इसमें बाधा बनते रहे। लंबे समय तक देश पर काबिज रही कांग्रेस भी चरमपंथियों के पक्ष में दिखती रही। अब जरूर सलमान खुर्शीद को कहना पड़ा है कि जब अनेक मुस्लिम देशों में ऐसा नहीं है तो इसकी भारत में भी जरूरत नहीं है। किंतु हकीकत यह है कि खुर्शीद समेत उनकी पार्टी पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के नाम पर घड़ियाली आंसू तो बहाती रही, लेकिन मोदी सरकार की तरह तीन तलाक की कुरीति समाप्त करने के पक्ष में दृढ़ता से खड़ी नहीं हो पाई। इस मामले में अब अदालत ने स्थिति स्पष्ट कर दी है, इसीलिए अब संसद से स्पष्ट कानून की भी दरकार है।    दरअसल देश में जितने भी धर्म व जाति आधारित निजी कानून हैं,उनमें से ज्यादातर महिलाओं के साथ लैंगिक भेद बरतते हैं। बावजूद ये कानून विलक्षण संस्कृति और धार्मिक परंपरा के पोशक माने जाते हैं,इसलिए इन्हें वैधानिकता हासिल है। इनमें छेड़छाड़ नहीं करने का आधार संविधान का अनुच्छेद-25 बना है। इसमें सभी नागरिकों को अपने धर्म के पालन की छूट दी गई है। दरअसल संविधान निर्माताओं ने महसूस किया था कि विवाह और भरण-पोषण से जुड़े मामलों का संबंध किसी पूजा-पद्धति से न होकर इंसानियत से है। लिहाजा यदि कोई निसंतान व्यक्ति बच्चे को गोद लेकर अपनी वंश परंपरा को आगे बढ़ाना चाहता है अथवा इससे उसे सुरक्षा बोध का अहसास होता है तो यह किसी धर्म की अवमानना कैसे हो सकती है। यदि किसी कानून से किसी महिला को सामाजिक सुरक्षा मिलती है या पति से अलग होने के बाद उसे दरबदर भटकने की बजाय गुजारे भत्ते की व्यवस्था की जाती है तो इसमें उसका धर्म आड़े कहां आता है ? स्त्री-पुरुश के दांपत्य संबंधों में यदि समानता और स्थायित्व तय किया जाता है तो इससे किसी भी सभ्य समाज की गरिमा ही बढ़ेगी, न कि उसे लज्जित होना पड़ेगा ?  ईसाई समाज में युवक-युवती ने यदि चर्च में षादी की है, तो उनको चर्च में आपसी सहमति से संबंध-विच्छेद का अधिकार है। किंतु यही सुविधा ‘हिंदु विवाह अधिनियम‘में नहीं है। यदि हिंदु युगल मंदिर में स्वयंवर रचाते हैं और कालांतर में उनमें तालमेल नहीं बैठता है तो वे चर्च की तरह मंदिर में जाकर आपसी सहमति से तलाक नहीं ले सकते ? उन्हें परिवार न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही तलाक मिलता है। जबकि यदि हम परंपरा को कायम रखना चाहते हैं तो मंदिरों को तलाक का अधिकार भी देना चाहिए ? हिंदुओं में खाप पंचायतें एक गौत्र में शादी करने की प्रबल विरोधी हैं। कई जनजातियां अपनी लोक मन्यताओं के अनुसार गांव और जाति से बाहर विवाह को वर्जित मानती हैं। बहरहाल नए कानून का  प्रारूप तैयार करते वक्त व्यापक राय-मशविरे की जरूरत तो है ही, यत्र-तत्र-सर्वत्र फैली लोक-परंपराओं और मान्यताओं में समानताएं तलाषते हुए, उन्हें भी विधि-सम्मत एकरूपता में ढालने की जरूरत है। ऐसी तरलता बरती जाती है तो शायद निजी कानून और मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में अदालतों को जिन कानूनी विसंगतियों और जटिलताओं का सामना करना पड़ता है,वे दूर हो जाएं ?

प्रमोद भार्गव

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