लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

जरा गंभीरता के साथ यह सोचें कि क्या भारतीय लोकतंत्र के अब तक  के इतिहास में ऐसा कभी भी हुआ है कि छोटे बड़े किसी भी राजनीतिक नेता ने अपना वाणी संयम खो कर देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग किया हो जैसा दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री ने पूरी बेहयाई के साथ किया है. उन्हें कायर कहना और अपनी भड़काऊ असभ्य भाषा पर अड़े रह कर तू और तुम की बचकाना और बेहूदा बोली बोलते हुए श्रीमान केजरीवाल ने अपने स्वयं के ही चरित्र का ऐसा चित्रण किया है जो आने वाले लम्बे समय तक भारत की राजनीति का सबसे बदनुमा दाग बन कर इतिहास  पन्नों पर अंकित रहेगा. भारत के लिए ये क्षण अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और विलक्षण हैं. एक तरफ यह  परिवर्तन के द्वार खटखटा रहा है. बहुमुखी विकास के लिए अंगडाई ले उठ खड़ा हुआ है. विश्व में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए कदम आगे बढ़ाने को उद्यत है. दूसरी तरफ देश के अंदर और बाहर से मिलने वाली चुनौतियों से भी दरपेश है जिनका सामना करने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व

को सतत सतर्क और सही समय पर सही कदम उठाने की सिद्धता बनाए रखने की आवश्यकता है.

 

परिवर्तन होगा और पूर्ण विश्वास है कि श्रेष्ठ परिवर्तन ही होगा. इस अवश्यम्भावी परिवर्तन को दिशा देने के लिए जैसे सुयोग्य, दृढ़संकल्प और राष्ट्र समर्पित, कार्यकुशल एवम जनप्रिय नायक की आवश्यकता है वह भी है. दुर्भाग्य यह है राष्ट्र रंगमंच पर कुछ विदूषक भी उतर आए हैं जो नाट्यकला में कुशल हैं. अपने लुभावने नारों से जनता का ध्यान आकर्षित करते हैं. देश के लिए अपना सर्वस्व स्वाहा कर देने की बातें करते हैं. ताम झाम से मुक्त सादा जीवन जीते हुए जनसेवा करने के आश्वासन देकर और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ देने के अपने संकल्प का दावा करते हुए आम आदमी का समर्थन जीतने में सफल हो जाते हैं. सत्ता की कुर्सियों के हत्थे थामते ही आम आदमी की सरकार ख़ास आदमी की सरकार बन कर अपना रंग दिखाने लगती है. पूर्ण बहुमत है इसलिए निर्विरोध निर्णय होता है और देखते ही देखते इन जनसेवकों के वेतन चार गुणा हो जाते हैं. मंत्री हैं उन्हें अच्छी कारें चाहिएं, रहने के लिए अच्छे बंगले चाहिएं. तो फिर क्या हुआ जनता को दिए वादों का? अब दिल्ली का आम आदमी अपने ही आम आदमियों की सरकार का विरोध क्यों करेगा?

 

दिल्ली की जनता उत्सुकता से क्रांति की प्रतीक्षा में है. लेकिन दिल्ली के उपराज्यपाल और केंद्र की सरकार के साथ मधुर सम्बन्ध रखने में आप मुख्यमंत्री साहब का विश्वास नहीं है. देश के प्रधानमंत्री श्री मोदी को नीचा दिखाना उन्हें भाता है. तीखी ज़ुबान, दूसरों को हर मामले में दोषी ठहराने और किसी के पद की मर्यादाओं की कोई परवाह न करते हुए उनका अपमान करने और स्वयम को सर्वगुणसंपन्न जतलाने की उनकी आदत है. कौन नहीं जान पा रहा कि आज देश की प्रगति से राष्ट्रीय नेतृत्त्व का ध्यान हटाने के लिए कौन तुला हुआ है? देश की जनता स्थितियों और व्यक्तियों दोनों का स्वतंत्र आकलन करने और लोकतंत्रीय माध्यम से अपना स्पष्ट निर्णय देने में उत्तरोत्तर अधिक साहसी और सही सिद्ध हुई है. उसके लिए सोचने की स्थिति बन रही है.

 

पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी देखने सुनने को मिला है उससे विदेश में बैठे मेरे जैसे विश्लेषकों और हज़ारों लाखों स्वाभमानी भारतीयों का सर शर्म से नीचा हुआ है. लगता है कि एक तरफ खड़ा है वह व्यक्ति जिसने इतने कम समय में भारत का नाम विश्व के दृश्यपटल पर एक सुयोग्य राजनेता के नाते स्वर्णाक्षरों में अंकित किया है. श्री नरेंद्र मोदी ने सभी देशों के साथ संपर्क सम्बन्ध सूत्र मज़बूत करते हुए वार्ताओं के माध्यम से भारत के हितवर्धन के मार्ग सुगम बनाने की तत्परता दिखाई है. उनकी चेष्ठाएं अंतर्राष्ट्रीय दृश्यपटल पर भारत की महत्वपूर्ण भविष्यक भूमिका सुनिश्चित करने का काम कर रहीं हैं. निश्चय ही देश के अन्दर भी अनेक ऐसी योजनाएं कार्यरूप ले रहीं हैं जिनका सीधा लाभ देश की जनता को मिलता नज़र आना शुरू हो रहा है. लेकिन जो राजनीति के दंगल में नए कूदे हैं या जिनकी नैया अभी भी डूब उतराव की स्थिति से उभर पाने में कठिनाई महसूस कर रही है वे तरह तरह की कारस्तानियाँ दिखाने करने में जुटे हैं. यह समझते हैं कि वे खुद तो दूध के धुले हैं और शेष सब भ्रष्ट और बेकार हैं. उछले फिरते हैं और गली मुहल्लों में अपने नुक्कड़ नाटक दिखाते भ्रम निर्माण करते देश को दिशा देने का दावा करते हैं. वाह!

 

देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य होगा यदि किसी भी राष्ट्रीय पद मर्यादा का इस प्रकार खुला उल्लंघन करने वाले और हर सांस में स्वयं को ही देश के कुशलतम राजनेता और जनता के हितचिन्तक होने का दावा करने वालों पर विश्वास कर देश के संसद तक को उनका बंधक बनने से रोका न गया. वे  किसी को भी गाली दें. देश के कानून और न्याय व्यवस्था को लागू करने वालों पर शंका की उँगली उठाएं. न्यायिक जाँच प्रक्रिया शुरू होते ही अनर्गल प्रलाप कर उसमें व्यवधान डालें. केन्द्रीय जांच विभाग को काम न करने दें.  स्पष्ट है, देश को अनेक वर्षों से भ्रष्टाचार की दलदल में धकेला जाता रहा है. जब कभी कोई मामला अदालत तक पहुंचता है उस पर न्याय प्रक्रिया शुरू भी नहीं होती कि मोदी सरकार को निशाना बनाया जाने लगता है. उस सरकार को जिसे देश की जनता ने भरपूर समर्थन देकर गत वर्ष चुना था. अब इस नटमण्डली ने एक नारा ही गढ़ लिया है कि “मोदी सरकार बदले की कार्यवाही कर रही है”. बताओ किस बदले की बात करते हो भाई? क्या यही कि दिल्ली में ‘आप’ को समर्थन मिला और भाजपा को आपने पराजित किया?

लोकतंत्रीय चुनावों में हार जीत का यह खेल खेलते हुए भाजपा को भी बहुत समय बीत गया है. अब यदि उन्हें अवसर मिला है तो योग्य प्रधानमंत्री के नेतृत्त्व में कुछ विशिष्ट कर दिखाने का. वे संसद में एक के बाद एक सर्व जन हितकारी विधेयक लाकर देश की दशा और दिशा में सुधार लाने के लिए सचेष्ट है. कोई भी अच्छी सरकार ऐसा ही करती. लेकिन इसके लिए एक ज़िम्मेदार विपक्ष का भी होना जरूरी होता है. विपक्ष में है वह कांग्रेस जो सत्ता खो देने से विचलित है और उसके साथ तथाकथित महाबंधन के उसके साथी जो संसद को नहीं चलने देने के लिए कृत संकल्प हैं. कांग्रेसियों का कहना है कि भले ही नेशनल हेराल्ड का मामला, जिसमें सोनिया और राहुल का निजी रूप से और कांग्रेस का भी सीधा उलझाव है, एक व्यक्ति श्री सुब्रमण्यम स्वामी मोदी के द्वारा अदालत तक पहुंचाया गया है, हो न हो यह काम मोदी सरकार ने ही किया या करवाया है. श्रीमती सोनिया गाँधी और युवराज राहुल गाँधी के प्रति वफादारी का इज़हार करते हुए उनके दरबारी कांग्रेसी सांसद देश के संसद के कामकाज को रोके हुए हैं. क्या इससे यह सिद्ध होता है कि कांग्रेस देश को  आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है? या यह सिद्ध होता है कि नेहरु गांधी परिवार का निजी हित राष्ट्र हित से ऊपर है. क्या कांग्रेसी नेतृत्व और आम आदमी पार्टी के केजरीवाल आज भ्रष्टाचार के आरोपियों को कटघरे में खड़ा किए जाने के प्रयासों में बाधक नहीं बन रहे? क्या कांग्रेस के शीर्ष नेता स्वयम को, अदालत से बाहर ही दोषमुक्त सिद्ध करने की चेष्टा नहीं कर रहे? वे भी क्यों नहीं आम लोगों की तरह चुपचाप अदालत का आदेश मान कर पेश होते? क्यों कर रहे हैं राजनीति और कर रहे हैं धूम धमाका? क्या ऐसा कर वे न्यायालय की अवमानना नहीं कर रहे? सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर क्या आप वास्तव में न्यायालय पर दबाव डालने की धृष्ठता नहीं कर रहे? यदि आप दोषी नहीं हैं तो सामना कीजिए और अदालत में अपने निरपराध होने के सबूत पेश कीजिए.

कांग्रेस देश की सर्वाधिक समय तक शासन करने वाली पार्टी रही हैं. एक बार लोकतंत्र की हत्या का पाप कर चुकी है. अब विपक्ष में पहुँच कर फिर से लोकतंत्र की हत्या करने का पाप मत कीजिए. श्रीमान केजरीवाल जिन्होंने अब तक की सर्वाधिक आपत्तिजनक और नितांत अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए देश के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री का अपमान किया है उन्हें यह भ्रम है कि श्री मोदी की सरकार इसलिए केजरीवाल को निशाना बना रही है क्योंकि भाजपा को दिल्ली विधानसभा के लिए चुनावों में आआपा ने करारी हार दी थी. श्रीमान राहुल गाँधी जिन्हें उनकी माता श्रीमती सोनिया गाँधी अभी भी देश का प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखती हैं उन्हें भी अपने इस लक्ष्य की पूर्ति में सबसे बड़े बाधक दिखाई देते हैं तो सिर्फ श्री मोदी, भाजपा और आर. एस. एस. इसलिए सोते जागते राहुल एक ही नफरत मन्त्र का जाप करने में जुटे हुए हैं. आँखें बंद कर इन्हें गाली देना और इनके विरुद्ध अपप्रचार करना ही उनका जीवन अभियान बन चुका है.

ऐसे में कौन कर रहा है देश की चिंता? कौन कर रहा है देश में सर्व व्याप्त भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए सही प्रयास? कौन देश के सर्वांगीण विकास के प्रति सचेत है और सचेष्ट है? कौन है जो देश में नागरिक समानता के आधार पर सर्वजन कल्याण योजनाओं को साकार करने के लिए प्रयत्नशील है? कौन है जो वैश्विक स्तर पर भारत को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है? कौन है जो आत्मविश्वास के साथ भारत को एक स्थिर, सुरक्षित और महान राष्ट्र बनाने के लिए संकल्प सिद्ध है? इसके विपरीत यह भी जाँच परख लें कि आज की स्थिति में सर्वश्री केजरीवाल, राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी इनमें से कौन सक्षम है जो देश को सही दिशा दे सके और दशा सुधार सके? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि देश के जन प्रतिनिधि मनन करें कि देश की जनता ने गत वर्ष क्या चाहा था और अब भी क्या चाहती है? क्या यह नहीं कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की कड़ाई  के साथ जांच पड़ताल हो? जल्दी हो, सिलसिलेवार हो, एक के बाद एक उन सबकी हो जिन पर भ्रष्टाचार करने का शक है? यदि जनता चाहती है कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो तो उसे ही यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच पड़ताल में रुकावटें खड़ी करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाए. ऐसे नुक्कड़ नाटकों की आवश्यकता नहीं है जिनमें विदूषक ही बार बार आगे आ खड़ा होता है.

श्री अन्ना हजारे ने श्री केजरीवाल से कहा है कि उन्हें अपने सक्रेटरी को नियुक्त करने से पहले उसकी जांच पड़ताल करनी चाहिए थी. सीबीआई ने अब स्वयम जांच शुरू की है. ऐसे प्रमाण भी दिए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री जी को इस व्यक्ति के सम्बन्ध में मई में सचेत किया गया था. लेकिन श्री केजरीवाल ने कोई कदम नहीं उठाया. कांग्रेस ने निजी हितों को महत्व देते हुए देश के संसद को बंधक बना रखा है. निर्णय देश की जनता को करना होगा कि देश की बागडोर सँभालने योग्य कौन है और जो नहीं है उसे वह क्षमा न करे.

2 Responses to “क्यों बंधक है देश का संसद?”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    पहले तो अपनी कमियों को विदेशियों के गले मढ़ना बंद कीजिये.रह गयी संसद चलने की बात,तो न भाजपा विपक्ष में रहते हुए इसे चलने देना चाहती थी और न कांग्रेस इसे विपक्ष में रहते हुए चलने देना चाहती है.जी.एस टी के लिए तो प्रत्यक्ष रूप से मोदी जी सबसे बड़े मुजरिम हैं.गुजरात के मुख्य मंत्री के रूप में इन्होने सुनिश्चित कर लिया था कि यह पास न हो.नहीं तो यह २०१२ में हीं क़ानून बन गया होता सर्वप्रथमतो मोदी जी को भाजपा के उस समय के सांसदों के साथ सम्मिलित रूप में इस और अन्य अड़चनों के लिए राष्ट्र और संसद से माफ़ी मांगनी चाहिए.उसके बाद उम्मीद की जानी, .चाहिए कि संसद सुचारू रूप से चलने लगेगा.

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  2. Himwant

    अमेरिका में लोकतन्त्र नही है। कानून का शाषण है। व्यक्ति को स्वतन्त्रता है। दो दल है जिनकी निति कमोबेस एक ही है। भारत का बहुलवाद और चरम लोकतन्त्र हमारे पिछड़ेपन एवं छद्म विदेशी हस्तक्षेप की मूल वजह तो नही ?

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