‘सत्यार्थ प्रकाश के प्रचार में शिथिलतायें दूर होनी चाहियें’

-मनमोहन कुमार आर्य,

महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ रचा है जो ‘भूतो न भविष्यति’ कथन को सार्थक सिद्ध करता है। ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य वेदों का प्रचार व प्रसार करना था। सत्यार्थप्रकाश वेदों के प्रचार व प्रसार का सबसे अधिक सशक्त माध्यम है। सत्यार्थप्रकाश का प्रचार और वेदों का प्रचार हमें समानार्थक लगते हैं। सत्यार्थप्रकाश अपने आप में वेदों की सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रमुख ग्रन्थ है जिसमें वेदों व ऋषियों के वेदानुकूल मान्यताओं को प्रस्तुत कर उसे युक्ति, तर्क व प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया गया है। महर्षि दयानन्द के समय में ईश्वर, जीवात्मा, ईश्वर की उपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र, गोपालन व गोरक्षा, नारी सम्मान, नारी व शूद्रों को शिक्षा व वेदाध्ययन का अधिकार, युवावस्था में विवाह, मनुष्य की एक ही जाति आदि का कोई निश्चित व युक्तिसंगत विधि-विधान नहीं था। सब अज्ञान व अन्धविश्वासयुक्त परम्परागत विधि-विधानों को मानते चले आ रहे थे। कोई यह नहीं देखता था कि वह जो मानते व करते हैं, वह सत्य व प्रामाणिक है भी अथवा नहीं? ऋषि दयानन्द ने किसी भी परम्परागत धार्मिक व सामाजिक कार्य को करने से पहले उसके औचीत्य व उपयोगिता पर विचार किया। यदि वह उपयोगी, औचैत्यपूर्ण एवं बुद्धिसंगत व सत्य था, तो उन्होंने उसे स्वीकार किया अन्यथा उस पर विचार कर वेदसम्मत वा बुद्धिसंगत स्वरूप व विधान को प्रस्तुत किया।

परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि इसीलिये दी है कि वह बुद्धि से तोल कर सत्य व असत्य को स्वीकार वा अस्वीकार करे। जो मनुष्य बुद्धि का उपयोग किये बिना परम्परागत विधि विधानों को स्वीकार कर लेता है वह अपने जीवन के लक्ष्य को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। ऋषि दयानन्द ने वेदों के आधार पर एक नियम यह भी दिया है कि मनुष्य को सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार कर करने चाहिये। ऋषि दयानन्द यह स्मरण कराते रहते हैं कि जो सत्य है उसको मानना धर्म और जो असत्य है वह अधर्म है। अतः हमें अपने सभी कार्य व कर्मकाण्ड सत्य व असत्य की कसौटी पर कसने चाहिये और उसके बाद ही उसका व्यवहार करना चाहिये। सत्य को स्वीकार व असत्य का त्याग की विशेषता संसार में केवल आर्यसमाज में ही देखी जाती है। इसे ऋषि दयानन्द जी ने समूचे सत्यार्थप्रकाश के साथ मुख्यतः ग्यारह से चैदह समुल्लासों में भी सप्रमाण प्रस्तुत किया है। वह चाहते थे कि मनुष्यों के सम्मुख सत्य व असत्य का स्वरूप रखा जाये। सभी मनुष्य व मतावलम्बी उन पर विचार करें और असत्य का त्याग कर सत्य को ग्रहण करें। बहुत से लोगों ने ऐसा किया भी परन्तु अधिकांश लोगों ने अपने किन्हीं स्वार्थों व उपेक्षा की प्रवृत्ति आदि कारणों से सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत सत्य के स्वरूप से लाभ नहीं उठाया। उन्होंने अपनी भी हानि की और देश को भी अज्ञान व अन्धविश्वासों के प्रचलित रहने के कारण हानि हुई है व हो रही है।

हम अनुभव करते हैं कि आर्यसमाज को सत्यार्थप्रकाश का जितना प्रभावशाली प्रचार करना था वह नहीं किया जा सका है। यद्यपि सत्यार्थप्रकाश का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद व प्रकाशन भी हुआ परन्तु यह कार्य बहुत सीमित संख्या में ही हुआ और अब तो यह सर्वथा शिथिल है। आर्यसमाज को सत्यार्थप्रकाश का प्रभावशाली प्रचार करने के उपायों की खोज कर उस योजना को विस्तार व सशक्त रूप देना चाहिये। आर्यसमाज में कुछ नेता भी हैं जो असत्य मार्ग पर चलने वालों के अधिक सहयोगी प्रतीत होते हैं। वह ऋषि दयानन्द के विरुद्ध विचार भी रखते हैं। उनके क्या स्वार्थ हैं यह तो वही जानें परन्तु हमें आश्चर्य होता है कि हमारे कुछ ऋषि भक्त विद्वान व नेता भी ऋषि दयानन्द की मान्यताओं के विरुद्ध कार्य करने वालों के सहयोगी व साथी हैं। ऐसे लोगों के कारण आर्यसमाज अधिक कमजोर हो रहा है। हमें ऋषि की विचारधारा के बाधक लोगों, विद्वानों, नेताओं व उनके सहयोगियों की पूर्ण उपेक्षा करनी चाहिये।

सत्यार्थप्रकाश का प्रचार ईश्वर द्वारा वेद के द्वारा प्रदत्त सत्य मान्यताओं का प्रचार है। जिस प्रकार से सूर्य अन्धकार का निवारण करता है उसी प्रकार से सत्यार्थप्रकाश भी धर्म का प्रकाश व अधर्म से परिचय कराने के साथ अधर्म से पृथक होने की प्रेरणा करता है। आर्यसमाज को अपने प्रचार को केवल आर्यसमाज मन्दिर तक ही सीमित नहीं रखना चाहिये अपितु आर्यसमाज मन्दिरों की चारदीवारी से बाहर निकाल कर जन जन में प्रचार करने की योजना बनानी चाहिये जैसा कि ईसाई व दूसरे सम्प्रदायों के लोग करते हैं। आज यह देखकर आश्चर्य होता है कि ढ़ोग व पाखण्ड तो फल फूल रहे हैं और सच्चा वैदिक धर्म, वेद व उसका प्रमुख प्रतिनिधि ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका को जन-जन में जो स्थान मिलना चाहिये था, उसे वह स्थान नहीं मिल रहा है। इस पर आर्यसमाज के सभी प्रमुख विद्वानों को विचार कर इसका समाधान करना चाहिये। क्या सत्यार्थ प्रकाश का जन-जन में प्रचार करना यह असम्भव कार्य है? यदि नहीं है, तो फिर हम प्रचार कर क्यों नहीं पा रहे हैं?

संसार में सर्वत्र भोगवादी परम्परायें अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। धर्म त्याग सिखाता है परन्तु लोगों की प्रवृत्ति अधिक से अधिक सुख भोगने की ओर है। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक धन, जिसकी कोई सीमा नहीं, उसे एकत्र कर सुखी होना चाहता है। इस कार्य में वह सारा जीवन व्यतीत कर देता है और समस्त धन बिना भोगे यहीं छोड़कर चला जाता है। जिन लोगों के पास अधिक धन है, वह सुविधा भोगी तो कहे जा सकते हैं परन्तु सुखी व सन्तुष्ट दिखाई नहीं देते। ऋषि दयानन्द का त्यागपूर्ण जीवन देखने पर वह सदैव सर्वत्र सुखी, आनन्दित व प्रसन्न दिखाई देते हैं। यह उनके वेदों के उत्कृष्ट ज्ञान व योग साधना में निपुणता के कारण था। उन्होंने दो समय सन्ध्या करने को भी महत्व दिया है। सन्ध्या ही वह कार्य व विधान है जो मनुष्य को आत्म निरीक्षण कर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने की प्रवृत्ति को विकसित करता है। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश पढ़कर व सन्ध्या आदि के द्वारा ही अपने जीवन व चरित्र का सुधार किया था और आदर्श जीवन व्यतीत किया। सत्यार्थप्रकाश एवं सन्ध्या की महत्ता निर्विवाद है। सत्यार्थप्रकाश को प्रकाशित हुए 143 वर्ष हो रहे हैं। इसकी सभी मान्यतायें अखण्डनीय है। बिना सत्यार्थप्रकाश के प्रचार से सब दुःखों का कारण अविद्या दूर नहीं की जा सकती। सत्यार्थप्रकाश मनुष्य की अविद्या दूर करने की प्रमुख ओषधि है। सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन व आचरण से दोनों जन्म सुधरते हैं। अतः अन्य बातों पर ध्यान न देकर सत्यार्थप्रकाश के प्रचार प्रसार पर ही सभी विद्वानों व नेताओं का ध्यान केन्द्रित होना चाहिये। सत्यार्थप्रकाश के प्रचार व प्रसार से हम ‘‘कृण्वन्तों विश्वर्मायम्’’ का लक्ष्य पूरा कर सकते हैं। यदि यह काम न किया गया तो देश व आर्य जाति के लिये इसके परिणाम भयंकर होंगे। अतः हमें समय रहते जाग जाना चाहिये और सत्यार्थप्रकाश व इसकी सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों के प्रचार को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बना लेना चाहिये। ऐसा करना किसी पुण्य से कम नहीं होगा। हम आर्यसमाज के एषणाओं से मुक्त ऋषिभक्त विद्वानों से प्रार्थना करते हैं कि वह सत्यार्थप्रकाश के प्रचार की योजना बनाकर आर्यों का मार्गदर्शन करें।

 

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