देवीभक्त लांगुरा का उपहास करते लांगुरिया गीत

                 आत्माराम यादव पीव

       जहां-जहां मानव का अस्तित्व है वहाँ-वहाँ उसके विकास ओर प्रस्फुटन से अनेक मार्ग बनते गए है जो अनादि भी है ओर अनंत भी है। जो मार्ग अनादि ओर अनंत है वे सनातन परंपरा के ऋषिओ द्वारा अन्वेषित है जिन्हे धर्म के रूप में महत्व मिला हुआ है। कुछ मार्ग थोड़ा सा चलने के बाद आनंद देकर समाप्त हो जाते है तो कुछ मार्ग कदम दो कदम चलने का स्वाद देकर आत्मविभोर कर देते है। आर्यावर्त के लोग सारी दुनिया पर यह मार्ग बनाकर अपने पदचाप छोड़ आए है ओर समय के थपेड़ों से उभरा भारतदेश भी इन मार्गों से सम्पन्न हुआ है जहा स्वंय कई युगों में अवतरित देवी देवताओ ने इन मार्गों कि धुरी रोपी है जिसपर संसार चल रहा है ओर भारत अपनी इस सनातनी विरासत को पाकर विश्व में ऊंचा स्थान बनाए हुये है।  

       देवीभक्ति के मार्ग पर “”लांगुर”” का बड़ा महत्व है ओर देश के विभिन्न प्रांतों, क्षैत्रो, देवी स्थानों पर लांगुर के रूप को लेकर विभिन्नताए देखी जा सकती है जिसमें जहा कुछ लोग शिव को लांगुर मानते है, कुछ भैरव को तो कोई हनुमान को यह स्थान देते है, जबकि वास्तव में बटुक, भैरव,वीर, बेताल आदि देवी के लांगुर है। लांगुर का शाब्दिक अर्थ पुत्र माना गया है ओर शिव-शक्ति पति पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित होने से शिव के लांगुर होने की बात लोकमान्यता में उचित प्रतीत नही होती। भैरव को भवानी के पुत्र के रूप में पूजा जाता है इसलिए भैरव के लांगुर होने को सहज ही स्वीकारोकित मिली हुई है ओर अनेक देवी गीत में लांगुर के रूप में भैरव का गुणगान होने से भैरव देवी के लांगुर होने व जनसामान्य के देव के रूप में विशेष स्थान रखते है। ऐसे ही सीता को देवी का स्वरूप मानकर उनके लांगुर के रूप में हनुमान को सर्वोच्च स्थान मिला हुआ है। देवी की भक्ति में लांगुरिया गीत में लांगुर को पूरा सम्मान देकर गीतकारों ने देवी माँ की सच्ची आराधना की है परंतु आज कुछ व्यावसायिक लोगों ने लांगुरियागीत में विकृत मानसिकता का परिचय देकर लांगुर की भक्ति का उपहास करते हुये गंदे ओर अश्लील गायन ओर अभिनय से  भोंडापन दिखाकर वास्तविक लांगुरिया गीत के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है।

       सनातन धर्म में भक्ति का स्वरूप देश के हर गाँव.शहर में सभी समाज-वर्ग के लोगों में अपनी-अपनी कला प्रदर्शन में अभिव्यक्त होते देखा जा सकता है। मैंने बचपन से ही कला के विभिन्न आयाम देखे, उनका चिंतन किया ओर समय-समय पर पैनी नजर रखकर उसकी विवेचना के लिए मन की गहराइयो में गोते लगाए। बात मेरे बचपन की है तब साल 1975 से 1980 तक का वह दौर था जब मेरे बड़े भैया रामभरोस जी भजनों के बड़े शौकीन थे ओर वे घर में अकेले गीत, कवित्त, दोहा, सोरठा, सवैया, छंद, देवी जस ओर लांगुरिया को देर रात तक लालटेन के उजाले में अपनी डायरी से गाते थे ओर जहां भजन.जस का कार्यक्रम हो वहाँ अपनी पूरी प्रतिभा को निचोड़ देते थे। “”राम की पी लेना बूटी, तेरी काया रहे अलमस्त राम की पी लेना बूटी”” “”मेरी मोहिनी मैया तोपे चवर ढुरे””  “मोहे मैया के ले चल रे लांगुरिया, तुझसे विनती करू लांगुरिया। “केला मैया के भुवन में घुटुअन खेले लांगुरिया’ “नौने मढ़ के है दरबारे दर्शन करले लांगुरिया”  “झूलो झूलो री भवानी माई लंगुरिया झुला डरे है माई रेशम के”” जैसे भावपूर्ण गायन मेरे मन को तरंगित कर देते  ओर इस कला के प्रति मेरा रुझान बढ़ता गया किन्तु सार्वजनिक गायकी से मुझे रुचि न होने से मैं इस परंपरा का पथगामी नही बन सका। भैया रामभरोस दुबले पतले ओर लंबेकदकाठी के सीधे ओर सरल इंसान थे। मैं सालों तक भैया रामभरोस उनके मित्र पन्नालाल कछवाय, झब्बूलाल रियार, भोला रियार, आदि की गायकी सुनता जिसमें उनके गाये लांगुरिया-“बसंती रंग रंगवाय, दूँगी जा लांगुरिया को टोपी, “कारी चुंदरिया में दाग न लगइयो लांगुरिया” अरे कछु खाई कछु डसी लई ओर कछु मारी फुसकारी, लांगुरिया””  “केला मैया ने बुलाई तब आई लांगुरिया”, “करि लईओ दूसरों व्याह,लांगुरिया मेरे भरोसे मत रइयों” के अतिरिक्त एक लांगुरिया गीत पूरा उद्धत करना चाहता हूँ- “”अनोखी मालिनी मैना करे तो डरपे काए कू । तेरे हाथ को मुँदरा, लांगुर दियो गढ़ाई। तेरे सिर कि चूँदरी, मैना लांगुर दई रंगाई । तेरे गोद का लालुआ,गांगुर की उनहारि। ना काहू के घर गई, तो मैंने लियो बुलाई। रस को वीधों लांगुरा, आई गयो मेरी सेज। अनौखी मालिनी… भारत की नारिया अपने पति से अत्यंत प्रेम कर उनका पोषण इस प्रकार करती है जैसे बच्चे का किया जाता है। अनेक लांगुरिया गीतों में देवी के लिए पति ओर पुत्र दोनों में लांगुर के भाव देखने को मिलते है जिसमें यथार्थ में लांगुर के रूप में पति भाव विशेष होता है पर अनेक स्थानों पर दूसरे पुरुषों के रूप में भी लांगुर का आरोपण किया जाकर विनोदपूर्ण रूप से व्यंग, हास्य देखने को मिल जाता है पर आज जैसी फूहड़ता देखने को नही मिलती जो पैसे कमाने की होड में लांगुरिया गीत में अश्लील नृत्य, दोअर्थी भाव के गीत की नग्नता यूटूथ पर परोसी गई है वह माफीयोग्य नहीं है,जिसे देखकर युवा पीढ़ी भटकाव कि ओर चल पड़ी है ओर वास्तविक लांगुरियागीत उनसे कोसों दूर है।

       होशंगाबाद नगर में गायकी का चलन ग्वालटोली के ग्वाल समाज में सबसे पहले देखने को मिला ओर मैं  इस गायकी को काली मंदिर में ओर लोगों के घरों में सुनता रहा ओर भजन, गीतों में रामायण, महाभारत के प्रसंगों ओर पात्रों के चरित्र पक्ष मुझे ओज से परिपूर्ण करते ओर मुझे भावनात्मक प्रस्तुति आँखों में अशुधार बहाने के साथ सभी प्रकार के रस देते किन्तु यह मेरा दुर्भाग्य था की तत्समय के मेरे आसपास.क्षैत्र के रहने वाले सभी उम्रदराज लोग मेरे मन के केनवास को सही रंगों से आकार देने में खुद को अंधकार में बताते। वे धर्म के सभी स्वरूपों को पूरी श्रद्धा ओर विश्वास से जीते, पर धर्म के नाम पर किए जाने वाले आयोजनों के मर्म को प्रगट करने के आग्रह को अस्वीकार कर देते। नवरात्रि में नवदुर्गा पूजन के समय देवी की विभिन्न स्वरूपों की पूजा ओर आराधना में देवी के गीतों में लांगुर अथवा लांगुरिया एक पात्र के रूप में पूर्ण श्रद्धा के साथ गीतों में स्मरण किया जाता है, यह मैंने ग्वालटोली के अपने ग्वाल समाज से जाना ओर मैंने जीवन में देवी आराधना.उपासना की सिद्धधी हेतु कन्या ओर लांगुरा को निमंत्रण दिया जाने के शुरुआत ग्वालटोली काली मंदिर से देखी थी जब मैं एक छोटा बालक था ओर तब कन्याभोज के साथ मुझे आमंत्रित कर कन्याओ के साथ बैठाकर भोजन कराया जातह था ओर कन्याभोज के बाद कन्याओं को तिलक लगाकर दी जाने वाली दक्षिणा के साथ मुझ लांगुर को भी दक्षिणा दी जाती जिसे पाकर मेरी आंखो में सपने सजने लगते थे। समाज के द्वारा पूजन के बाद कन्याभोज में कन्याओं को सम्मान के साथ लांगुर के सम्मान मैं खुद का सम्मान पाकर मेरा मन हवा हवाई होने लगता  ओर इसी सम्मान ने मुझे खुद को लांगुर के रूप में देवीभक्त की आस्था से भर दिया परंतु जब किशोरावस्था में आया तब लांगुर के सम्मान से वंचित होने पर मेरे मन में मेरे लांगुर होने से देवी की भक्ति ओर उनके प्रति आस्था टूट गई। तब मुझ लांगुर का आकर्षण कन्याभोज के बाद कन्याओं को मिलने वाली दक्षिणा में था जिससे में वंचित हो गया परंतु मेरी जिज्ञासा लांगुर गीतों के प्रति तीव्र होती गई। समाज की दृष्टि पर गहरी पकड़ में, तब मैंने पाया कि उम्र के साथ लांगुर ही नही कन्या का स्थान भी छिन जाता है।  “कन्या”  गोरी, गवरी, देवी या छोटी लड़की के ही नाम है ओर लांगुर में छोटे बालक ही माने गए है।  देवी मंदिरों में हमेशा याद किए जाने वाले या नवरात्रि पर्व पर याद किए जाने वाले लांगुर को लेकर संशय बना हुआ है कि यह लांगुर कौन है? शिवजी के प्रदेश हिमाचल में लांगुर को लोकड़ा भी कहा जाता है ओर लोकड़ा का अर्थ छोटे बच्चे होता है ओर नेपाली भाषा में लोका शब्द का अर्थ भी बच्चे होता है।

क्या हनुमान लांगुर है?-. “साहित्य संदेश” मई 1968 वर्ष 29 अंक 11 में प्रोफेसर इन्दुप्रकाश पांडे के लेख ने हनुमान को लांगुर माना है।  तभी से देवी के लांगुर के रूप में हनुमान को महत्व देने के प्रसंग बहुत है जो चलन में है किन्तु हनुमान राम के भक्त है देवी के वीर नहीं। राम की भक्ति में ही उन्होने देवी सीता की खोज की ओर उनसे अजर अमर होने का वरदान प्राप्त किया किन्तु वे देवी के वीर लांगुर हो यह प्रमाण कही नहीं मिलता। इसके बाद भी हनुमान की मूर्ति को ही वस्तुत: बिना किसी प्रामाणिक आधार पर समाज के अनेक वर्ग स्वप्रेरणा से लांगुर मानकर लांगुरिया शब्द की स्वीकारोक्ति देकर देवी को प्रसन्न करने में बहुत आगे है। लांगुर शब्द की व्युत्पत्ति लांगूल से हुई है ओर लांगुर गीत उद्दाम रसिकता लिए भक्ति या मनौती लिए होते है जिसमें दुर्दम पौरुष के रूप में कुवारे देवता के रूप में हनुमान को लांगुरिया का स्थान दिया हुआ है तो दूसरी ओर भैरव देवता को यह स्थान देवी ने दिया है तो कुछ क्षैत्रों में लोग देवी भक्त ज्ञानु भक्त को भी लांगुर मानकर पूजते है।

क्या शिव ही लांगुर है?- नवरात्रि पर दुर्गापूजन में कन्या लांगुर को भोजन कराने कि परंपरा है। कन्या दुर्गा को माना है, फिर लांगुर शिव कैसे हो सकते है? लोकवार्ता की पगडंडियों में डॉ॰ सत्येन्द्र लिखते है कि ”कन्या के साथ लांगुर का क्या अर्थ होगा?  इसका अर्थ शिव ही हो सकता है। तांत्रिक आवरण में कन्या =योनि ओर लांगुर = शिश्न या लिंग। इसका समर्थन संस्कृत कोश भी करते है। इसमें लांगुर का अर्थ पुंछ या लंगूर ही नही दिया शिश्न भी दिया है। वे अपनी बात सिद्ध करने के लिए उदाहरण देते है कि देवीपूजन में आठीयावरी में आंटे के लाठी ओर छ्ल्ले बनाकर कढ़ाई में तलकर चढ़ाए जाते है। ये योनि ओर लिंग के ही तांत्रिक प्रतीक है। दूसरी ओर डाक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते है कि-लांगुर छोटा बालक है तो वात्सल्य उमड़ता है, ओर लांगुर शिव है तब पुण्य भाव से शिव उभरता दिखता है। लकुट ओर लाठी भी साथ है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि लांगुर ओर शिव में आंतरिक अभिन्नता होते हुये भी लांगुर, लांगुर है ओर शिव, शिव है। इसलिए शिव लांगुर है इसकी प्रामाणिकता सिद्ध नही होती।

आखिर लांगूर कौन है ?- अवधी लोकगीत में हनुमान को लांगुर माना है तो ब्रज ओर बुन्देली लोकगीत में मान्यताए भैरवनाथ, बटुकनाथ सहित प्रथक-प्रथक पात्रों के प्रति गहरी निष्ठाओं के साथ भिन्नताए देखने को मिलती है। इससे उभरकर आए मतभेद में लांगुर के दो रूप देखे जा सकते है, एक वे जो वास्तविक लांगूर है ओर दूसरे वे जो आरोपित लांगूर है। शिव ओर हनुमान विशिष्ट है इसलिए इन्हे लोकगीत में मान्य लांगूर कि श्रेणी से हटकर वास्तविकता के अन्वेषण कि ओर बढ़ना ठीक होगा। श्रीमति मालती शर्मा के शोध ओर अनुसंधान के अनुसार. लांगुर में एक ओर चंडी का बटुक रूप तो दूसरी ओर दैत्यरूप समाया है, इन दोनों को मिलकर लांगुरा बना है। बटुकोत्पति में शिवपुराण कि कोटि रुद्रसहिंता की कथा का उल्लेख करते हुए वे बताती है कि दधीच ब्राम्ह्ण के दुष्ट पुत्र सुदर्शन की तपस्या से प्रसन्न हो, पार्वती सुदर्शन को पुत्र बनाकर शिव कि गोद में समर्पण करती है। शिव सुदर्शन को यज्ञोपित दे सदैव गोल तिलक लगाने का निर्देश दे देवीकार्य ओर ब्रह्मभोज में चंडी के बटुक कि मुख्यता का वरदान देते है। पार्वती सुदर्शन पुत्र  को  अपने निकट स्थापित करती है तथा अपने ओर अपने भक्तों के मध्य अपनी पूजा को बटुक पूजा ही मानती है।

       भगवान बिष्णु एक लीला से दैत्य सती का सतीत्व भ्रष्ट करते है तब दूसरी लीला से उनके पति का वध करते है। पति का कटा बाजू ओर कटा सिर देखकर सती को गर्भपात हो जाता है। जिससे बड़े बड़े दांतों वाला बालक रूप रख लेता है जिसे देख सती डर जाती है । भगवान बालक के दांत तोड़ देते है, तब बालक पूछता है.अब मैं खाउंगों काय से। तब भगवान कहते है रे बालक तू माँ देवी के पास जा ओर उनकी सेवा कर, माँ तुझे लपसी खिलावेगी । इस प्रकार दैत्य पुत्र जरासंध का यह बालक जो उसकी माँ वृन्दा से उत्पन्न हुआ लांगुर के रूप में पूजा जाता है। कोई वृन्दा के इस बालक से पुंछता है- भैया लांगुरा रे अपनी जाति तो बताए तब वह बताता है कि. “वम्मन के हम बालका, उपजे तुलसी पेड़।“  माता का सहायक यह लांगुर माँ को बहुत प्रिय है जो छ माह तक सोता ही नही ओर माँ  कि सेवा करता है। देवी आज्ञा दे तो वह असुर के भी नौ-नौ कीलें ठोक दे, उन्हे निकाल दे, माँ कही चली जाये तो व्याकुलता से उन्हे तलाश करे। देवी माँ का कृपापात्र इतना जो माँ के जस गाये भजन करे तो उनकी भी सेवा करे ओर उन्हे गांजे की चिलम भर-भर कर पिलाये।

देवी माँ के वीर- काला भैरव ओर गोरा खेतपाल चामुंडा माँ के अखाड़े के वीर है। माँ का परम भक्त राजा जयदेव परमार से काला भैरव जा भिड़ता है तब वह माँ के वीर काला भैरव को लंगडा कर बंदी बना लेता है जिसे माँ कंकाली भाटनी का रूप रखकर राजा से दान स्वरूप में छुड़ा कर लाती है तब यह काला भैरव लंगड़ा, लंगरा, लगुरा लंगूरवा कहलाया। इसके अलावा लोकड़ा वीर को भीमाकाली ने लांगुरवा माना। भीमाकाली का मंदिर हिमाचल प्रदेश के महासू जिले के सहारण स्थान पर है ओर इस देवी को बाणासुर की पुत्री ऊषा ने प्रसन्न कर प्रधूम्न को पति रूप में पाया। तांत्रिको को मानना है कि लांगुरों में 52 वीर भी आते है ओर उनका सरदार नाहरसिंह है जो पीपल के पेड़ में रहता है जिसका आव्हान करने पर सभी 52 लांगुरा उपस्थित होकर भूत प्रेत से मुक्ति दिलाते है। नाहरसिंह के साथ 5 वेताल वीर भी लांगूरे माने गए है जो गृह देवता के रूप में ज्यादा प्रतिष्ठित है ओर जो लोग इन्हे पूजने लगे तो ये प्रसन्न रहते है लेकिन जैसे ही इनकी पूजा बंद कर दे तो ये घर परिवार को नष्ट करने से भी नहीं चूकते है। कन्या पूजा के साथ लांगुर का सम्मान देवी पूजन में एक नए अध्याय को जोड़ता है जहा कन्या देवी तो है ही तभी देवी के भक्त ओर पुजारी देवी के रूप में कन्या की पूजा करके कन्यारूपी देवी को गीतों में गाकर झूमते हुये भक्ति करते है ओर देवी के सेवक लांगुर को देवी के साथ गीतों में याद करके लांगुरिया की तान छेड़ते है जो देवी स्वरूप कन्या ओर देवी भक्त लांगुर की अनन्य भक्ति ओर असीम कृपा पाने का सरलतम उपाय है जिसकी स्वरलहरियों में श्रोता गायक के साथ सारी रात लांगुरिया गीतों में सराबोर होते है। 

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