लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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tanzaniaडॉ. मधुसूदन

प्रवेश:
***संसार के सबसे पिछडे देश कौनसे ?
***उनके पिछडे रहने का, क्या कारण?
***ऐसे देशों को जानने से हमें क्या लाभ?
*** कितने देश है, ऐसे?

(एक )
अपनी भाषा, है एक मृदु मुलायम कपडा:
श्रोडिंजर कहते हैं, “परदेशी भाषा की कठिनाइयाँ उपेक्षणीय नहीं होती। अपनी भाषा एक मृदु-मुलायम और ठीक ठीक नाप के, कपडों जैसी होती है। जो पहनने पर आप बिलकुल स्वस्थ अनुभव करते हैं।” — कुछ ऐसा ही कहते हैं, अर्विन श्रोडिंजर–भौतिकी में नोबेल विजेता (१९३३)।

“The difficulties of language are not negligible. One’s native speech is a closely fitting garment, and one never feels quite at ease when it is not immediately available and has to be replaced by another.” –Erwin Schrodinger—Nobel Prize Winner for Physics in 1933
आप ने भी अनुभव किया होगा; कि दूसरों के कपडे, कितने भी बढिया हो, पर पहनने पर, उन कपडों में जकडा-जकडा, बंधा-बंधा अनुभव होता है। भाषा का भी कुछ ऐसा ही है।

(दो)
टान्ज़ानिया, अफ्रिका की शालामें शोध:
एक शोध पत्र पढा। उसके अनुसार, टान्ज़ानिया, (अफ्रिका) की शाला में भाषा माध्यम के विषय में, एक सच्चाई सामने आयी है। उस शाला के, छात्र काफी होनहार थे, पर परदेशी माध्यम द्वारा, वें अपने आप को व्यक्त कर नहीं पा रहे थे। एक ही परीक्षा के प्रश्नों को, किस्वाहिली में, और परदेशी (माध्यम )भाषा में, पूछा गया।

छात्र प्रश्नों के उत्तर, अपनी किस्वाहीलि भाषा में देकर, लगभग दोगुने गुणांक प्राप्त करते पाए गए। यह शोधपत्र ७ वी कक्षा के छात्रों के विषय में था। इसके अनुसार किस्वाहिली वहाँ की जन भाषा परदेशी माध्यम की अपेक्षा दूगुनी प्रभावी प्रमाणित हुयी।

इसी संदर्भ में अगला परिच्छेद भी संसार के पिछडे देशों के पिछडेपन के कारणों को, सुनिश्चित करता है।

(तीन)
संसार के सब से पिछडे देश:
संसार के सबसे पिछडे देश कौनसे और कितने ? और उनके पिछडे रहने का, कारण क्या ?उत्तर है;
ऐसे देश एक नहीं, दो नहीं, कुल अफ्रिका के ४६ देश, संसार में सबसे पिछडे हैं। एक ध्यान देने योग्य और मेरी दृष्टिमें, अवश्य विचारोत्तेजक तथ्य है; जो, भारत के हित-चिंतकों को अवश्य प्रभावित करेगा। वह तथ्य यह है, कि, ये अफ्रिका के ४६ देश ऐसे हैं; जो, सारे परदेशी माध्यमों में सीखते है।
(क) २१ देश फ्रांसीसी में सीखते हैं;
(ख)१८ देश अंग्रेज़ी में सीखते हैं;
(ग) ५ देश पुर्तगाली में,सीखते हैं; और,
(घ)२ देश स्पेनी में सीखते हैं।
ऐसे कुल ४६ देश हुए।
ये देश,अंग्रेज़ी,फ्रांसीसी,पुर्तगाली और स्पेनी में सीखते हैं; पर उनके लिए, ये सारे परदेशी माध्यम ही हैं।

(चार)
भारत को दिशा निर्देश:
मैं, इन अफ्रिका के देशों को भारत से अलग वर्ग में मानता हूँ।
पर फिर भी उनका अनुभव भारत को कुछ दिशा निर्देश लेने में काम अवश्य आएगा।
क्यों कि हमारी सांस्कृतिक परम्परा विशेष है। ऐसी विशेषताएँ भारत को, जाने-अनजाने परम्परा से-प्राप्त है। पर फिर भी भारत उनके अनुभव से, उनके तथ्यों से, लाभ उठाकर अपनी शिक्षा प्रणाली में सुधार पर विचार तो अवश्य कर ही सकता है।

(पाँच)
तथ्यात्मक सच्चाइयाँ:
पर इस आलेख में, कुछ ऐसी तथ्यात्मक सच्चाइयाँ सामने आ रही है; जो हमारे भाषा-चिंतकों, भाषा-वैज्ञानिकों को और विशेष शिक्षा से जुडे मंत्रालयों को, सोचने के लिए बाध्य करेंगी। नहीं, मैं सोचना अनिवार्य मानता हूँ।
जो विद्वान सोच से ऊपर हैं, पहले ही निर्णय कर चुके हैं, कि, “अंग्रेज़ी ही गाँव से लेकर महानगर तक समग्र भारत के लिए,शत प्रतिशत उद्धारक है;” उनके लिए इस आलेख का विशेष अर्थ नहीं है। बाकी पाठकों के लिए, कहना उचित है; कि, आज किसी निर्णय पर भले ना पहुंचा जाए; पर इन तथ्यांकों (डेटा)को निर्णय लेते समय ध्यान में रखना उचित होगा। ऐसी सतर्कता से इस विषय को आगे बढाना चाहता हूँ। एक ऑस्ट्रेलियाई विद्वान का उत्तर भी इसी सच्चाई को उजागर करता है।

(छः )
ऑस्ट्रेलियाई विद्वान का उत्तर:
जब, एक ऑस्ट्रेलियाई विद्वान से किसीने पूछा, कि अफ्रिका क्यों पिछडा है? उसका उत्तर था, जब वहाँ का शासन, न्याय व्यवस्था, शिक्षा इत्यादि सब परदेशी भाषाओं में संचालित होता है; तो वहाँ की प्रजा उस से कटी हुयी है। जब तक ऐसा होता रहेगा, तब तक उनकी उन्नति की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
दूसरी ओर, मैं ने, ऐसे भी, उदाहरण देखे हैं, कि, जहाँ एक ही परिवार में अंग्रेज़ी पढे सदस्य, अन्य अंग्रेज़ी ना पढें सद्स्यों से कटे रहते है।तो, प्रजाजनों में भी ऐसा कटाव देश में अलगाव पैदा करता है, दो अलग वर्ग बन जाते हैं। देश की एकता के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है।

(सात)
निष्कर्श:
हमें इस विषय पर विचार करना चाहिए। एक सच्चाई सुनिश्चित है।
*****” अंग्रेज़ी हमारा सर्वांगीण, समग्र उत्थान नहीं कर पाएगी।”
****” कुछ लोगों का आगे बढना सभी का आगे बढना नहीं माना जा सकता।”
****”समग्र, सर्वांगीण, और सर्वस्पर्शी उन्नति ही उद्देश्य होना चाहिए।”

इतना निष्कर्श अवश्य निकल सकता है। और, आज तक का अनुभव भी यही कहता है।
पर, मेरे विचार में, इस से अधिक निर्णय अभी निलम्बित रखा जाए।
पर, इस आलेख की जानकारी, भारत के हित में, आगे का निर्णायक पैंतरा लेने में अवश्य काम आएगी। हमें भारत के सर्वांगीण और समग्र सर्वस्पर्शी विकास की दृष्टि से ही सोचना है।
नए शासन से भी काफी कुछ अपेक्षाएँ हैं।
आप, प्रवक्ता के प्रबुद्ध पाठक क्या सोचते हैं?

8 Responses to “पिछडे देशों से क्या सीखें।”

  1. Mohan Gupta

    कुछ समय पहले एक राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्र ने लिखा के अंग्रेजी जानने वाले और न जानने वालो के मध्य बहुत बड़ा आर्थिक अंतर हैं। अंग्रेजी जानने वाले उच्च पदो पर आसीन होते हैं और अंग्रेजी न जानने वाले को छोटी मोती साधारण नौकरी मिलती हैं इसलिए इस अंतर को मिटाने के लिए लेखक ने सुझाब दिया के सारे भारत के सरकारी स्कूले में पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाना अनिवार्या कर दिया जाये। यह एक ऐसा सुझाब हैं के भारत हमेशा के लिए दास देश बना रहे। और कभी स्वन्तंत्र होने का पर्यतन ना करे। भारतीया नेता और कुछ अन्या लोग थॉमस मैकॉले द्वारा सन १८३५ में अंग्रेजी द्वारा भारत को हमेशा के लिए मानसिक रूप से दास बनाये रखने की नीति का समर्थन करते हैं। भारत में कई लोग ऐसे हैं जो भारतीय भाषायों वाला देश नहीं चाहते बल्कि अंग्रेजी बोलने वाला , अंग्रेजी प्रयोग करने वाला भारत चाहते हैं। जब बच्चे अंग्रेजी बोलने वाले वातावरण में रहते हैं तो अंग्रेजी सीखना आसान हो जाता हैं और जो लोग अंग्रेजी बोलने वाले वातावरण में नही रहते रहते उनके लिए अंग्रेजी सीखना कठिन हो जाता हैं। भारत में कई ऐसे उदहारण देखने को मिलते हैं के जो जो बच्चे अंग्रेजी बोलने वाले वातावरण में नहीं रहते किन्तु प्रखर बुद्धि के होते हैं बह अच्छी अंग्रेजी नही सीख पाते और जैसे ही उन्हें अंग्रेजी भाषा में परीक्षा देनी होती हैं बैसे ही पिछड़ जाते हैं। एक विदेशी भाषा सीखना आसान नहीं हैं जबकि वातावरण बह भाषा न बोलता हो। इस अंग्रेजी भाषा के कारन निर्धन बच्चे पिछड़ जाते हैं क्योंकि उन्हें विषय की बजाय अंग्रेजी भाषा सिखने में बहुत अधिक समय खर्च करना पड़ता हैं भारत के लोगो को अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार बहुत काम मिलते हैं। पुरस्कार न मिलने का एक मुख्या कारन भारत में शिक्षा अंग्रेजी भाषा में होती हैं। डॉ मधुसूदन जी ने अपने लेख में बहुत अच्छे ढंग से यह बात सिद्ध की हैं।

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  2. Rekha Singh

    हमारे हिन्दी के किसी प्रसिद्ध साहित्यकार ने बहुत पहले ही एक छोटे से वाक्य मे यह सब कह दिया था । मै फिर से उसी कथानक को दोहराती हूँ । ” निज भाषा उन्नति है , सब उन्नति का मूल ” सभी विकास की जड़ है है अपनी भाषा , मातृ भाषा । मातृ भाषा से उस देश , एवं उस भू खंड से जुड़े हुए लोगो का वह समूह का सम्बन्ध एक माता एवं शिशु जैसा होता है , जैसे एक शिशु को उसकी माता से अलग करके पालना । हमारे भारत मे माता और उसकी संतान का अटूट सम्बन्ध इस उन्नति की पराकाष्ठा है ।

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  3. डॉ. मधुसूदन

    Madhusudan

    Dear Madhu,

    Nice article!

    You have succeeded in looking at the problem in a different perspective.

    Raja Barve
    ——————————————————————————————————————

    Yah hai, Mere vishva vidyaalayeen Sah-pathi, ki pratikriya jo e patra se prapta huyi.

    madhusudan

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  4. मुकुल शुक्ल

    ये तथ्य की “पिछड़े देशों के पिछड़ेपन का एक कारण उनकी सरकारों द्वारा विदेशी भाषा में काम करना है” जान कर अपने देश की दुर्दशा का मूल कारण भी समझ आया | मेरी आप से विनम्र प्रार्थना है की कृपया आप भारत के प्रधानमंत्री को भी इन तथ्यों से अवगत कराएं ताकि वो भी हिंदी, संस्कृत आदि भाषाओँ को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए जनता के समक्ष इन तथ्यों को प्रस्तुत करें और देश में जनता के बीच हिंदी और संस्कृत के पक्ष में माहौल बना सकें | ये कार्य यदि आपके द्वारा किया जायेगा तो इसका असर कहीं अधिक होगा |

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  5. Abhishek Upadhyay

    Pranam,
    Sadar Charan Sparsh,

    Abhi-2 poora lekh padha. Atyant naveen samay anookool jaankari uplabdh karayi hai aapne african deshon ke shodh ke vishay me. Yahan par mera room-mate Tanzania ka hi hai, usase bhi maine sajha kiya, yah bilkul sach hai.

    Nischay hi kayi angrezidaan ki aankhen kholane me sahayak hoga yah lekh.

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  6. डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना

    प्रतिभा सक्सेना.

    ये सब प्रत्यक्ष प्रमाण हैें जिन पर विचार न करना आँखों पर पट्टी बाँध लेने जैसा होगा.दूसरों के अनुभवों से शिक्षा ले कर अपनी सामर्थ्य के समुचित उपयोग से ही प्रयासों के सफल होने की आशा की जा सकती है.
    आ. झवेरी जी,आपने ये तथ्य सामने रख कर स्पष्ट कर दिया कि अपनी भाषा जो कुछ बहुत आसानी से दे सकती है उसे परायी भाषा के द्वारा आत्मसात् कर लेना कठिन ही नहीं असंभव भी है क्यों कि माध्यम की असहजता सबसे पहली बाधा है,जो मन और मस्तिष्क को एकात्म नहीं होने देती..

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  7. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    तथ्यों पर आधृत,प्रामाणिक, प्रेरक एवं विचारोत्तेजक आलेख सदा की भाँति सराहनीय ,विचारणीय और आचरणीय है ।
    साभार एवं सादर,
    शकुन्तला बहादुर

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    • Vishwa Mohan Tiwari (retd), Air Vice Marshal

      ek videshee bhaasha ne hamen ya to goongaa banaa diyaa hai ya ek bandar!
      Iske wirodh men ek aandolan kee aawashyakataa hai.
      Iske wirodh men ham kuchh naheen kar rahe hain!
      tab kya ham bandar ban chuke hain?
      kam se kam, hamen apanee bhaashaa se prem to karanaa hee chaahiiye, uskaa jeewan men adhikaadhik upayog karanaa chaahiye.
      vmt

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