पुस्तकालय व्यवसाय नहीं सेवा है 

डा. राधेश्याम द्विवेदी
एक व्यवसाय के रुप में पुस्तकालयाध्यक्षता (लाइब्रेरियनशिप) रोजगार के विविध अवसर प्रदान करती है। पुस्तकालय तथा सूचना.विज्ञान में आज करियर की अनेक संभावनाएं हैं। अर्हताप्राप्त लोगों को विभिन्न पुस्तकालयों तथा सूचना केन्द्रों में रोजगार दिया जाता है। प्रशिक्षित पुस्तकालय व्यक्ति अध्यापक तथा लाइब्रेरियन दोनों रूप में रोजगार के अवसर तलाश कर सकते हैं। वास्तव में अपनी रुचि तथा पृष्ठभूमि के अनुरूप पुस्तकालय की प्रकृति चयन करना संभव है। वास्तव में पुस्तकालय विशुद्ध व्यवसाय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। जीविका के साधन को यदि छोड़ दे तो यह एक साधना है, तपस्या है तथा सेवा करने का जुनून है। जिस व्यक्ति में ये सब सात्विक गुण होगें ,वहीं अच्छा पुस्तककर्मी बन सकता है। इसे अन्य व्यवसायों की तरह कदापि नहीं समझना चाहिए। यदि अधिकारी पाठक तथा व्यवस्थापक सभी का सहयोग रहेगा, तभी यह मिशन सफलता पूर्वक कामयाब हो सकता है। इसके लिए नियमों की शिथिलता तथा उदार भावना होना बहुत ही जरुरी होता है। एसा ना हो सकने पर सब कुछ यांत्रिक जैसा ही दिखाई पड़ेगा जो पुस्तकालय विज्ञान के सिद्धान्तों के अनुकूल कभी भी नहीं हो सकता है। पुस्तकालय वह स्थान है जहाँ विविध प्रकार के ज्ञान, सूचनाओं, स्रोतों, सेवाओं आदि का संग्रह रहता है। पुस्तकालय शब्द अंग्रेजी के लाइब्रेरी शब्द का हिंदी रूपांतर है। लाइबेरी शब्द की उत्पत्ति लेतिन शब्द ‘ लाइवर ‘ से हुई है, जिसका अर्थ है पुस्तक। पुस्तकालय का इतिहास लेखन प्रणाली पुस्तकों और दस्तावेज के स्वरूप को संरक्षित रखने की पद्धतियों और प्रणालियों से जुड़ा है।
पुस्तकालय विज्ञान वह विज्ञान है जो प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षाशास्त्र एवं अन्य विधाओं के औजारों का पुस्तकालय के सन्दर्भ में उपयोग करता है। पुस्तकालय विज्ञान वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत पुस्तकालयों में संपन्न किये जाने वाले कार्यप्रणालियों से सम्बंधित विशिष्ट प्रविधियों, तकनीकियों, एवं प्रक्रियायों का अध्ययन एवं अध्यापन किया जाता है। आधुनिक पुस्तकालय विज्ञान, ‘पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान’ कहलाता है क्योंकि यह केवल पुस्तकों के अर्जन, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, प्रसुचीकरण, फलक व्यस्थापन तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत सूचना की खोज, प्राप्ति, संसाधन, सम्प्रेषण, तथा पुनर्प्राप्ति भी सम्मिलित है। आधुनिक पुस्तकालय अद्यतन सूचना संचार प्रोद्योगिकी का बहुत अच्छा उपयोग कर रहें हैं। पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान की शिक्षा के माध्यम से ही पुस्तकालयों का व्यस्थापन तथा संचालन हेतु योग्य और कुशल कर्मचारियों को तैयार किया जाता है। पुस्तकालय विज्ञान तकनीकी विषयों की श्रेणी में आता है तथा एक सेवा सम्बन्धी व्यवसाय है। यह प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षाशास्त्र एवं अन्य विधाओं के सिद्धान्तो एवं उपकरणों का पुस्तकालय के सन्दर्भ में उपयोग करता है।
पुस्तकालय विकासशील संस्था है क्योंकि उसमें पुस्तकों और अन्य आवश्यक उपादानों की निरंतर वृद्धि होती रहती है। इस कारण इसकी स्थापना के समय ही इस तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक होता है। यह संचरण इकाइयों के इतिहास, संगठन, प्रबंधन, विभिन्न तकनीको, सेवाओं, समाज के प्रति उनके कर्तव्यों तथा सामान्य कार्य कलापों का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक अध्ययन पर आधारित एक वृहद् विषय है। इसका आकार-प्रकार तथा परिसीमा विषय व सूचना जगत के साथ निरंतर बदलता रहता है। इसलिए पुस्तकालय विज्ञान की शिक्षा में पुस्तकालय की विभिन्न तकनीकियों एवं प्रविधियों के साथ-साथ पुस्तकालय सम्बन्धी विभिन्न सेवाओं का भी पर्याप्त ज्ञान एवं जानकारी प्रदान की जाती है।
अनुसंधान या शोध पुस्तकालय :- उस संस्था को कहते हैं जो ऐसे लोगों की सहायता एवं मार्गदर्शन करती है जो ज्ञान की सीमाओं को विकसित करने में कार्यरत हैं। ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ हैं और उनकी पूर्ति विभिन्न प्रकार के संग्रहों से ही संभव हो सकती है, ऐसे पुस्तकालयों की कार्यपद्धति अन्य पुस्तकालयों से भिन्न होती है। यहाँ कार्य करनेवाले कार्मिकों का अत्यंत दक्ष एवं अपने विषय का पंडित होना अनिवार्य है, नहीं तो अनुसंधानकर्ताओं को ठीक मार्गदर्शन उपलब्ध न हो सकेगा। संग्रह की दृष्टि से भी यहाँ पर बहुत सतर्कतापूर्वक सामग्री क चुनाव करना चाहिए। संदर्भ संबंधी प्रश्नों का तत्काल उत्तर देने के लिए पुस्तकालय में विशेष उपादानों का होना और उनका रखरखाव भी ऐसा चाहिए कि अल्प समय में ही आवश्यक जानकारी सुलभ हो से। विभिन्न प्रकार की रिपोर्टे और विषय से संबंधि मुख्य-मुख्य पत्रिकाएँ, ग्रंथसूचियाँ, विश्वकोश, कोश और पत्रिकाओं की फाइलें संगृहीत की जानी चाहिए।
पुस्तकालय विज्ञान के पांच सूत्र :- पुस्तकालय विज्ञान के जनक रंगनाथन नें पुस्तकालय के कार्य एवं उद्देश्य भी स्पष्ट किये। रंगनाथन द्वारा 1931 में पुस्तकालय विज्ञान हेतु पांच सूत्र प्रतिपादित किये। इसके अनुसार :-
1. पुस्तक उपयोग के लिए हैं।
2. प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले।
3. प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले।
4. पाठक का समय बचाएं।
5. पुस्तकालय वर्धनशील संस्था है।
वस्तुत: भारत में पुस्तकालय विज्ञान की शिक्षा को स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य डॉक्टर रंगनाथन द्वारा ही किया गया। उन्हें भारतीय पुस्तकालय विज्ञान का जनक भी कहा जाता है। विस्तृत तथा विशेष ज्ञान प्रदान करने में पुस्तकालयों की भूमिका को व्यापक रूप में स्वीकार जाता है। आज के सन्दर्भ में पुस्तकालयों को दो विशिष्ट भूमिकाओं का निर्वहन करना है। पहली सूचना तथा ज्ञान के स्थानीय केंद्र के रूप में कार्य करने की और दूसरी राष्ट्रीय एवं विश्व ज्ञान के स्थानीय श्रोत के रूप में। इस सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति विभाग ने एक केन्द्रीय क्षेत्र योजना के रूप में एक राष्ट्रिय पुस्तकालय मिशन स्थापित करने का प्रस्ताव किया है। इसके अंतर्गत इन्टरनेट की सुविधा युक्त कंप्यूटर वाले 7000 पुस्तकालय भारत में स्थापित करने का प्रस्ताव है।
सूचनाओं का विस्तार :- ज्ञान के इस युग में सूचनाओं का विस्तार तीव्र गति से हो रहा है। जिसके फलस्वरूप वर्तमान समाज, ज्ञान समाज के रूप में परिवर्तित हो चुका है और पाठकों की सूचना आवश्यकता में व्यापक परिवर्तन आ रहा है जिसका प्रभाव पुस्तकालय विज्ञान के शिक्षण तथा प्रशिक्षण पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। सामाजिक एवं शैक्षिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु ही पुस्तकालयों की स्थापना प्राचीन काल से की जाती रही है। वस्तुत: ज्ञान का भण्डारण, सरक्षण और उपयोग हेतु उपलब्धता की सम्पूर्ण प्रक्रिया पुस्तकालयों द्वारा ही प्रदान की जाती रही है। विविध प्रकार की अध्ययन सामग्री का चयन, अर्जन, प्रक्रियाकरण और व्यस्थापन करने के पश्चात् ही पाठकों को उनकी आवश्यकतानुसार पठनीय सामग्री सुलभ करने का कार्य इसमें सम्मिलित है। पाठ्य सामग्री में निहित महत्वपूर्ण ज्ञान का सम्प्रेषण भी इन्हीं के द्वारा किया जाता है। व्यक्ति की सभ्यता, संस्कृति, तथा शिक्षा के उन्नयन में इन संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है तथा इनके द्वारा ही सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक विकास संभव है। समाज के बोद्धिक एवं मानसिक विकास का श्रेय इन्हें दिया जाता है।
आधुनिक पुस्तकालय के नवीन सिधान्त :- आधुनिक पुस्तकालय, पुस्तकालय विज्ञान के नवीन सिधान्तों तथा प्रक्रिया का पूर्ण उपयोग करते हैं। जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है की पुस्तकालय विज्ञानं आज के पुस्तकालयों के परिवर्तित परिवेश में उन सब गतिविधियों में सम्मिलित है जिसमें – सूचना प्रोद्योगिकी पर आधारित माध्यमों से प्रलेख सूचना संग्रहण, सूचना प्रक्रियाकरण, व् लक्ष्य प्रयोक्ता तक सम्प्रेषण, सूचना की खोज एवं मूल्याकन हेतु प्रोद्योगिकी का प्रयोग, पुस्तकालय प्रणाली के अनुरूप आवश्यक उपकरणों का प्रयोग, प्रणाली विश्लेषण एवं अभिकल्पन, डेटाबेस का उपयुक्त सॉफ्टवेर के माध्यम से सृजन, इलेक्ट्रोनिक माध्यमों पर सूचनाओं का भण्डारण, पुस्तकालय नेटवर्क द्वारा संघ प्रसुचियों का अभिगम, इन्टरनेट के द्वारा सूचना अभिगम एवं खोज, बाह्य पुस्तकालयों से पुस्तक प्राप्ति हेतु पुस्तकालय नेटवर्क का उपयोग, मुद्रित के स्थान पर डिजिटल सूचनाओं का आदान प्रदान, इन्टरनेट पर आधारित सूचनाओं का संकलन एवं प्रबंधन, प्राप्त सूचनाओं का मूल्यांकन एवं संग्रह को अद्यतन रखना, इ-मेल, वार्ता फोरम का निरंतर प्रयोग, डिजिटल पुस्तकालय, पुस्तकालय समूह, वेब साईट का सृजन तथा निरंतर अद्य्नता, विषय वास्तु प्रबंधन, पुस्तकालय तथा सूचना सेवाओं का विपणन, सूचना साक्षरता का प्रसार, प्रयोक्ता समूह की सूचना आवश्यकता की पहचान, सूचना के सृजन, संग्रहण, संगठन, पुनर्प्राप्ति तथा प्रसार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
पुस्तकालय व सूचना विज्ञान एक चुनौतीपूर्ण कॅरियर :- शिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि से पुस्तकालयों की आवश्यकता तथा महत्व में भी भारी वृद्धि हुई है। पुस्तकालयों द्वारा प्रदत्त सेवाओं को अब वर्तमान में उसकी सूचना सेवाओं की भूमिका के रूप में परंपरागत प्राचीन पुस्तकालय कार्यों से मिश्रित करते हुए पुस्तकालय और सूचना सेवाएँ के नाम से पुकारा जाता है। कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी ने भी सूचना सेवाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू कर दिया है।शिक्षण संस्थानों की संख्या में वृद्धि से पुस्तकालयों की आवश्यकता तथा महत्व में भी भारी वृद्धि हुई है। पुस्तकालयों द्वारा प्रदत्त सेवाओं को अब वर्तमान में उसकी सूचना सेवाओं की भूमिका के रूप में परंपरागत प्राचीन पुस्तकालय कार्यों से मिश्रित करते हुए पुस्तकालय और सूचना सेवाएँ के नाम से पुकारा जाता है। कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी ने भी सूचना सेवाएँ प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू कर दिया है। इस विषय क्षेत्र से दो अन्य शब्द जैसे कि डॉक्यूमेंटेशन तथा सूचना भंडारण और सुधार भी जुड़ गए हैं। अत: पुस्तकालयों के अलावा अब प्रलेखन केंद्र और सूचना केंद्र भी काम कर रहे हैं। विभिन्न नामों का प्रयोग होने के बावजूद इस विषय क्षेत्र में जरूरतमंदों के लिए सूचना सेवाएँ उपलब्ध होती हैं। इन पुस्तकालयों के प्रबंधन के लिए अच्छी अकादमिक और व्यावसायिक योग्यताएँ रखने वाले व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान मात्र एक अकादमिक विषय क्षेत्र नहीं है। यह एक व्यावसायिक पाठ्यक्रम है जिसमें व्यावहारिक, प्रेक्षण तथा प्रायोगिक अध्ययन शामिल है। तेजी से उभरते इस पेशे की माँग को देखते हुए कई संस्थानों ने अपने लाइब्रेरी साइंस कोर्स के माड्यूल में पेशेवर बदलाव लिए हैं, जैसे सूचनाओं की प्राप्ति के लिए कम्प्यूटर तकनीक का प्रयोग। पहले की पारंपरिक तकनीकों की तुलना में आज के दौर में लाइब्रेरियन कोर्स में आधुनिक तकनीक जैसे कि सूचना प्रबंधन व तकनीक, रिसर्च तकनीक, कैटलॉग और विभिन्न सेवाओं का वर्गीकरण आदि का समावेश हुआ है। लाइब्रेरी साइंस में समय के साथ डाटा बेस मैनेजमेंट, इंफर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे नए विषय जुड़ गए हैं। भारत में ज्यादातर विश्वविद्यालय लाइब्रेरी और इंफर्मेशन साइंस में बैचलर और मास्टर प्रोग्राम करवा रहे हैं। इस व्यवसाय में विद्धान, घर से सम्पन्न तथा ज्ञान के पिपासुओं के आने से इस व्यवसाय की पवित्रता बनी रहती है। वह अपने लिए नहीं अपितु समाज राज्य या राष्ट्र के लिए जीता है और स्वयं को समर्पित करता है। यदि एसा भाव वह नहीं बना पा रहा है तो इसे जीविका के किसी अन्य विकल्प की तलाश करनी चाहिए और पुस्तकालय की पवित्रता पर आंच नहीं आने देना चाहिए।

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