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    ओजोन की उपेक्षा से तबाह होता जीवन

    विश्व ओजोन परत संरक्षण दिवस- 16 सितम्बर 2020 पर विशेष
     ललित गर्ग 

    विश्व ओजोन परत संरक्षण दिवस 16 सितंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष ‘जीवन के लिये ओजोन’ थीम पर यह दिवस मनाया जा रहा है। अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ओजोन परत के सुरक्षित ना होने से जनजीवन, प्रकृति, पर्यावरण और पशुओं के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। यहां तक कि पानी के नीचे का जीवन भी ओजोन की कमी के कारण नष्ट हो जाएगा। ओजोन परत के नष्ट होने एवं उसकी कमी से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, सर्दियों की तुलना में अधिक गर्मी होती है, सर्दियां अनियमित रूप से आती हैं और हिमखंड गलना शुरू हो जाते हैं। इसके अलावा ओजोन परत की कमी स्वास्थ्य और प्रकृति के लिए खतरा है।
    आज समग्र्र मनुष्य जाति ओजोन में छिद्र होने एवं उसके नष्ट होने से पर्यावरण के बढ़ते असंतुलन से संत्रस्त है। प्रकृति एवं पर्यावरण की तबाही से पूरा विश्व चिन्तित है। कहा नहीं जा सकता कि ओजोन सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये सोची गयी योजनाएं, नीतियां और निर्णय कब, कैसे सफल निष्पत्तियों तक पहुंचंेगी। इधर तेज रफ्तार से बढ़ती दुनिया की आबादी, तो दूसरी तरफ तीव्र गति से घट रहे प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत। समूचे प्राणि जगत के सामने अस्तित्व की सुरक्षा का महान संकट है। पिछले लम्बे समय से ऐसा महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या ओजोन से जुड़ी हुई है। आज पृथ्वी विनाशकारी हासिए पर खड़ी है। सचमुच आदमी को जागना होगा। जागकर फिर एक बार अपने भीतर उस खोए हुए आदमी को ढूंढना है जो सच में खोया नहीं है, अपने लक्ष्य से सिर्फ भटक गया है। यह भटकाव ओजोन परत के लिये गंभीर खतरे का कारण बना है।
    ओजोन गैस हमारी जीवन रक्षक है। ओजोन से ही पृथ्वी और उस पर प्रकृति एवं पर्यावरण टिका हुआ है। लेकिन अफसोस है, कि ओजोन परत में ओजोन गैस की मात्रा कम हो रही है। इसका मुख्य कारण प्रकृति और पर्यावरण का अति दोहन करने वाले स्वार्थी मानव ही हैं। इस संकट का मूल कारण है प्रकृति का असंतुलन, औद्योगिक क्रांति एवं वैज्ञानिक प्रगति से उत्पन्न उपभोक्ता एवं सुविधावादी संस्कृति। स्वार्थी और सुविधाभोगी मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। उसकी लोभ की वृत्ति ने प्रकृति को बेरहमी से लूटा है। इसीलिए ओजोन की समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है। ओजोन परत का छेद दिनोंदिन बढ़ रहा है। सूरज की पराबैंगनी किरणें, मनुष्य शरीर में अनेक घातक व्याधियाँ उत्पन्न कर रही हैं। समूची पृथ्वी पर उनका विपरीत असर पड़ रहा है। जंगलों-पेड़ों की कटाई एवं परमाणु ऊर्जा के प्रयोग ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया है। न हवा स्वच्छ है, न पानी, न मौसम का संतुलित क्रम। वैज्ञानिको ने ओजोन परत से जुड़े एक विश्लेषण में यह पाया है कि क्लोरो फ्लोरो कार्बन ओजोन परत में होने वाले विघटन के लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। इसके अलावा हैलोजन, मिथाइल क्लोरोफॉर्म, कार्बन टेट्राक्लोरिडे आदि रसायन पदार्थ भी ओजोन को नष्ट करने में सक्षम हैं। इन रसायन पदार्थांे को ‘ओजोन क्षरण पदार्थ’ कहा गया है। इनका उपयोग हम मुख्यतः अपनी दैनिक सुख-सुविधाओ में करते हैं जैसे एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, फोम, रंग, प्लास्टिक इत्यादि। ओजोन चिन्ता की घनघोर निराशाओं के बीच एक बड़ा प्रश्न है कि कहां खो गया वह आदमी जो संयम एवं सादगीपूर्ण प्रकृतिमय जीवन जीता था, जो स्वयं को कटवाकर भी वृक्षों को काटने से रोकता था? गोचरभूमि का एक टुकड़ा भी किसी को हथियाने नहीं देता था। जिसके लिये जल की एक बूंद भी जीवन जितनी कीमती थी। कत्लखानों में कटती गायों की निरीह आहें जिसे बेचैन कर देती थी। जो वन्य पशु-पक्षियों को खदेड़कर अपनी बस्तियां बनाने का बौना स्वार्थ नहीं पालता था। अपने प्रति आदमी की असावधानी, उपेक्षा, संवेदनहीनता और स्वार्थी चेतना के कारण ही आज ओजोन क्षत-विक्षित हो रही है। ओजोन मनुष्य के द्वारा किये गये शोषण एवं उपेक्षा के कारण ही नष्ट हो रही है, और तभी बार-बार भूकम्प, चक्रावत, बाढ़, सुखा, अकाल, कोरोना महामारी जैसे हालात देखने को मिल रहे हैं।
    हम जानते हैं-कम्प्यूटर और इंटरनेट के युग में जीने वाला आज का युवा बैलगाड़ी, चरखा या दीये की रोशनी के युग में नहीं लौट सकता फिर भी अनावश्यक यातायात को नियंत्रित करना, यान-वाहनों का यथासंभव कम उपयोग करना, विशालकाय कल-कारखानों और बड़े उद्योगों की जगह, लघु उद्योगों के विकास में शांति/संतोष का अनुभव करना, बिजली, पानी, पंखे, फ्रिज, ए.सी. आदि का अनावश्यक उपयोग नहीं करना या बिजली-पानी का अपव्यय नहीं करना, अपने आवास, पास-पड़ोस, गाँव, नगर आदि की स्वच्छता हेतु लोकचेतना को जगाना, पेड़-पौधों के अंधाधुंध दोहन पर नियंत्रण-ये ऐसे उपक्रम हैं, जिनसे आत्मसंयम पुष्ट होता है, प्राकृतिक साधन-स्रोतों का अपव्यय रुकता है। प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ सहयोग स्थापित होता है और ओजोन की सुरक्षा में भागीदारी हो सकती है।
    सुविधावादी जीवनशैली एवं बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से ओजोन को भारी नुकसान हो रहा है। एयर कंडीशनर में प्रयुक्त गैस फ्रियान-11, फ्रियान-12 भी ओजोन के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक है क्योंकि इन गैसों का एक अणु ओजोन के लाखों अणुओं को नष्ट करने में सक्षम है। धरती पर पेड़ों की बढ़ती अंधाधुंध कटाई भी इसका एक कारण है। पेड़ों की कटाई से पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा काम होती है जिसकी वजह से ओजोन गैस के अणुओं का बनना कम हो जाता है। ओजोन परत के बढ़ते क्षय के कारण अनेकों दुष्प्रभाव हो सकते हैं। जैसे की सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणें धरती पर वायुमंडल में प्रवेश कर सकती हैं, जो कि बेहद ही गरम होती हैं और पेड़ पौधों तथा जीव जन्तुओं के लिए हानिकारक भी होती हैं। मानव शरीर में इन किरणों की वजह से त्वचा का कैंसर, श्वसन रोग, अल्सर, मोतियाबिंद यदि जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं। साथ ही साथ ये किरणें मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती हैं। जहां ओजोन क्षय के कारण मनुष्य जल्दी बूढ़े होते है और शरीर पर झुर्रियां पड़ती है  वही पत्तियों के आकार छोटे जाते हैं, अंकुरण का समय बढ़ जाता है और मक्का, चावल, गेहूं, सोयाबीन जैसे फसलों का उत्पादन कम हो जाता है। पैराबैंगनी किरणें सूक्ष्म जीवों को अधिक प्रभावित करते हैं जिसका असर खाद्य श्रृंखला पर पड़ता है। ओजोन परत के बढ़ते क्षय के कारण आने वाले कुछ वर्षों में त्वचा कैंसर से पीड़ित रोगों की संख्या के बढ़ने के अनुमान है। इसी कारण कोरोना महामारी को परास्त करने में भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है।
    देश के भावी नागरिकों यानी बच्चांे को जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए जरूरी है कि उन्हें ओजोन परत के प्रति संवदेनशील बनाया जाए। पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों के साथ प्रेमपूर्ण सहअस्तित्व का बोध कराया जाए। खान-पान की शुद्धि और व्यसन मुक्ति भी ओजोन- सुरक्षा के सशक्त उपाय हैं। खान-पान की विकृति ने मानवीय सोच को प्रदूषित किया है। संपूर्ण जीव जगत के साथ मनुष्य के जो भावनात्मक रिश्ते थे, उन्हें चीर-चीर कर दिया है। इससे पारिस्थितिकी और वानिकी दोनों के अस्तित्व को खुली चुनौती मिल रही है। नशे की संस्कृति ने मानवीय मूल्यों के विनाश को खुला निमंत्रण दे रखा है। वाहनों का प्रदूषण, फैक्ट्रियों का धुँआ, परमाणु परीक्षण-इनको रोक पाना किसी एक व्यक्ति या वर्ग के वश की बात नहीं है। पर कुछ छोटे-छोटे कदम उठाने की तैयारी भी महान क्रांति को जन्म दे सकती है।
    विकास एवं सुविधावाद के लिये ओजोन की उपेक्षा गंभीर स्थिति है। सरकार की नीतियां एवं मनुष्य की वर्तमान जीवन-पद्धति के अनेक तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल रहे हैं कि वहां जीवन का अस्तित्व ही कठिन हो जायेगा। ओजोन की तबाही को रोकने के लिये बुनियादी बदलाव जरूरी है और वह बदलाव सरकार की नीतियों के साथ जीवनशैली में भी आना जरूरी है।

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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