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    Homeसाहित्‍यकविताज़़िंदगी पहले इतनी सिमटी न थी

    ज़़िंदगी पहले इतनी सिमटी न थी

    ज़िंदगी पहले कभी इतनी
    सिमटी न थी।
    जिंदगी पहले कभी इतनी
    डरी डरी न थी।
    जिंदगी पहले इतनी
    अकेेेली भी न थी।
    अब कोई किसी के घर
    आता जाता नही,
    अब किसी को कोई
    बुलाता नहीं……
    एक फोन में सारे रिश्ते
    समाहित हो गयेे।
    स्पर्श के सुख से
    सभी वंचित गये हो
    बहुत दिनों बाद
    कोई मिले तो
    गले लगा सकते नहीं
    दुख में रोने को
    कोई काँधा
    नहीं मिलता है अब
    ख़ुशी के ज़माने तो
    अब आते ही नही।
    ये कौन सा मंजर है
    मेरे भगवन!
    जहाँ से
    दुख दर्द जाते ही नहीं
    कहते हैं वक़्त ही तो है
    गुज़र जायेगा…
    इस वक़्त के गुज़रने के
    आसार कहीं नज़र आते नहीं!

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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