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    रवीन्द्रनाथ की स्मृति में उम्मीद के उजाले


    रवीन्द्रनाथ ठाकुर स्मृति दिवस- 7 अगस्त, 2020 पर विशेष
    -ललित गर्ग-

    महापुरुषों की कीर्ति त्रैकालिक, सार्वदैशिक एवं सार्वभौमिक होती है। उनके महान् योगदान एवं उनका यश किसी एक युग तक सीमित नहीं रहता। ऐसे गुरुदेव के नाम से विश्वविख्यात रवींद्रनाथ ठाकुर महान कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और नोबल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले एकमात्र भारतीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने दो-दो देशों के राष्ट्रगान के रचियता होने का गौरव प्राप्त है। वे सिर्फ एक लेखक ही नहीं बल्कि संगीतकार, चित्रकार, नाटककार भी थे। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगद्रष्टा कवि थे, उनका लोकहितकारी चिन्तन एवं सृजन कालजयी होने के साथ-साथ युग-युगों तक उजाला बिखरने का प्रकाश-स्तंभ है। साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वे एशिया के प्रथम व्यक्ति हैं।
    रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेन्द्रनाथ ठाकुर और शारदा देवी की संतान के रूप में 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ एवं उनका निर्वाण 7 अगस्त, 1941 को हुआ। उनकी स्कूल की पढ़ाई सेंट जेवियर स्कूल में हुई। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटाऊन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया, लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। बचपन में ही उनमें अलौकिक एवं अद्भुत प्रतिभा देखने को मिली। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी।
    रवींद्रनाथ ठाकुर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। उन्हें दो देशों के राष्ट्रगान के रचियता एक तो भारत के लिए ‘जन गण मन’ और दूसरा बांग्लादेश के लिए ‘अमार शोनार बांग्ला’ के रूप में भी जाना जाता है। इतना ही नहीं ठाकुर ने हजारों गीतों की भी रचना की है। ठाकुर द्वारा कही गयी बातें, जो आज भी लोगों को प्रेरणा देती है। वह कहा करते थे कि केवल पानी पर खड़े होकर या उसे देखकर समुद्र पार नहीं किया जाता। इसे पार करने के लिए कदम बढ़ाना होगा। विश्वास को जीवन में अहम मानते हुए वह कहते थे कि ये (विश्वास) वह पक्षी है जो प्रभात के पूर्व अंधकार में प्रकाश का अनुभव कराता है और गाने लगता है।
    प्रकृति के सान्निध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में शांति निकेतन की स्थापना की, जहां कला और साहित्य का एक अलग अनूठा, विलक्षण रूप दिखता था। इससे ठाकुर का गहरा नाता था। उनके पिता ने 1863 में ब्रह्मो समाज आश्रम और विद्यालय के रूप में एक आश्रम की स्थापना की थी। फिर यहीं पर रवींद्रनाथ ठाकुर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की, वे शिक्षा के पारम्परिक रूप के पक्ष में नहीं थे, गुरुकुल परम्परा एवं प्रकृति के बीच शिक्षा को वे अधिक उपयोगी एवं प्रभावी मानते थे। यही कारण है कि विश्व भारती विश्वविद्यालय दुनिया का एक अनूठा शैक्षणिक संस्थान है, जहां ठाकुर के रचना संसार का संग्रहालय भी है। जहां ठाकुर की 60 सबसे लोकप्रिय कविताओं को ‘सबसे प्रसिद्ध कविताएं’ नामक एक अलग गैलरी में रखा गया है। पांच साल तक शोध के बाद इन कविताओं को संकलित किया गया। टैगोर चित्रकार भी थे। उन्होंने जीवन के अन्तिम दौर यानी 60 साल की उम्र के दौरान चित्र बनाने शुरू किए थे। इन चित्रोें में युग का संशय, शांति, मोह, क्लांति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। उनकी कई चित्र प्रदर्शनियां यूरोप, रूस और अमेरिका में लगी हैं। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थीं। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास भी लिखे थे। ठाकुर प्रकृतिप्रेमी थे और उनको बचपन से ही प्रकृति का सान्निध्य बहुत भाता था।
    ठाकुर और महात्मा गांधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं ठाकुर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। ठाकुर ने गांधीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शांति निकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देशभर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस वक्त गांधीजी ने ठाकुर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था। उनकी काव्यरचना गीतांजलि के लिये उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। ब्रिटिश शासकों ने 1915 में रबींद्रनाथ ठाकुर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था। लेकिन 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद ठाकुर ने यह उपाधि वापस कर दी। ब्रिटिश सरकार के मनाने के बाद भी वह इसे वापस लेने के लिए राजी नहीं हुए।
    रवींद्रनाथ ठाकुर एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वे धर्म, दर्शन, कला, साहित्य, संगीत और संस्कृति के प्रतिनिधि राष्ट्रपुरुष एवं राष्ट्रनायक थे। उनका संवाद, शैली, साहित्य, साधना, सोच, सपने, संगीत एवं चित्र सभी कुछ मानवीय मूल्यों के योगक्षेम से जुड़े थे। इसीलिये वे महान् रचनाकार होकर भी सूरज की धूप, वर्षा के पानी एवं वृ़क्ष की छांव ज्यो कभी बंटे नहीं। हवा बन सब तक पहुंचे, प्रकाश बन अंधेरों को थामा और विश्वास बन सबके आश्वास बने। उन्होंने पुरुषार्थ से भाग्य रचा- अपना, राष्ट्र का और उन सभी का जिनके भीतर थोड़ी भी मानवीयता, राष्ट्रीयता, आस्था और आत्मविश्वास है कि हमारा जीवन बदल सकता है।
    रवींद्रनाथ ठाकुर का सम्पूर्ण जीवन विवेक और विनय की समन्विति का आदर्श है। प्रज्ञा एवं पुरुषार्थ की प्रयोगशाला है। व्यक्तित्व निर्माण की रचनात्मक शैली और अनुभूत सत्य की स्वस्थ प्रस्तुति है। यह वह सफर है जो जिधर से भी गुजरा, उजाले बांटते हुए आगे बढ़ा। उनका चिन्तन, कार्य एवं रचना-संसार सृजनशील सफर का साक्षी बना। इसके हर पड़ाव पर शिशु-सी सहजता-पवित्रता, युवा-सी तेजस्विता, प्रौढ़-सी विवेकशीलता और वृद्ध-सी अनुभवप्रवणता के पदचिन्ह हैं, जो हमारे लिये सही दिशा में मील का पत्थर बनते रहे हैं। आपका जीवन मानवता के अभ्युदय का उजला एवं प्रेरक जीवन है। इससे जुड़ी है मानवीय एकता, सार्वभौम शांति, सर्वधर्म समन्वय, सापेक्ष चिन्तनशैली के विकास की अमाप्य संभावनाएं। ठाकुर का सम्पूर्ण जीवन मानवीय मूल्यों, उन्नत सृजन, राष्ट्रीयता का सुरक्षा प्रहरी बना, इसलिये आप सबके प्रणम्य है। आपके विचार एवं रचना-संसार जीवन का दर्शन है, आपकी साधना एवं सोच भीतरी बदलाव की प्रेरणा है एवं संवाद जीने की सही सीख है। हम उनके सपने के अनुरूप नये भारत के निर्माण के सपनों को सच बनाने में सचेतन बने, यही हमारी उनकी पुण्यतिथि पर उनके प्रति सच्ची संकल्प-श्रद्धा प्रणति है। 

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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