सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे….

देवेंद्रराज सुथार
छोड़ो मेहंदी खडक संभालो, खुद ही अपना चीर बचा लो, द्यूत बिछाये बैठे शकुनि, मस्तक सब बिक जायेंगे, सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे। किसी कवि की उक्त पंक्तियां आधुनिक परिवेश में महिलाओं की हक़ीक़त बयां करने के लिए सटीक बैठती हैं। जो भारत कभी ”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” की विचारधारा पर चलायमान था, आज हालात यह ही कि वो भारत महिलाओं पर अत्याचार के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक देश बन गया है। एक सर्वे में यौन हिंसा और बंधुआ मजदूरी को इसकी वजह बताया गया है। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन ने महिलाओं के मुद्दे पर 550 एक्सपर्ट्स का सर्वे जारी किया। इसमें घरेलू काम के लिए मानव तस्करी, जबरन शादी और बंधक बनाकर यौन शोषण के लिहाज से भी भारत को खतरनाक करार दिया है। महिलाओं के लिए खतरनाक टॉप 10 देशों में पाकिस्तान छठे नंबर पर है। सर्वे में ये भी कहा गया है कि देश की सांस्कृतिक परंपराएं भी महिलाओं पर असर डालती हैं। इसके चलते उन्हें एसिड अटैक, गर्भ में बच्ची की हत्या, बाल विवाह और शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ता है। सात साल पहले इसी सर्वे में भारत महिलाओं के मामले में दुनिया में चौथे नंबर का सबसे खतरनाक देश था। सर्व में ग्रामीण महिलाओं की स्थिति चिंताजनक बतायी गई है। भारत में महिलाओं को तस्करी से सबसे ज्यादा खतरा है। भारत में 2016 में मानव तस्करी के 15 हजार मामले दर्ज किए गए जिनमें से दो तिहाई महिलाओं से जुड़े थे। इनमें से आधी महिलाओं की उम्र 18 साल से कम थी। ज्यादातर महिलाओं को जिस्मफरोशी या घर में काम करने के लिए बेचा गया था।देश के हर कोने से महिलाओं के साथ बलात्कार, यौन प्रताड़ना, दहेज के लिए जलाए जाने, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना और स्त्रियों की खरीद-फरोख्त के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं। ऐसे में महिला सुरक्षा कानून का क्या मतलब रह जाता है, इसे हम बेहतर तरीके से सोच और जान सकते हैं। इसलिए अगर महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से देखा जाए तो जिस तरह की घटनाएं आए दिन भारत में घट रही हैं, उसमें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अगर कोई रिपोर्ट आती है तो वह कहीं न कहीं इस दिशा में उठाए जा रहे कदमों पर अंगुली उठाती हैं। समय-समय पर महिला सुरक्षा को लेकर कानून बनाए जाते हैं और कानूनों में परिवर्तन भी किए जाते रहे हैं। फिर भी देश में महिलाएं असुरक्षित है, यह बेहद चिंता की बात है। गौरतलब है कि जिन लोगों को लगता है कि सिर्फ कठोर कानून से महिलाएं सुरक्षित हो सकती हैं, तो जान लें शरिया कानून और कठोरतम सजा वाले देश अफगानिस्तान, सऊदी अरब भी इस टॉप 10 सूची में हैं।शासन और प्रशासन चाहे जितना कठोर कानून तैयार कर ले, लेकिन जब तक व्यक्ति की मानसिकता और उसे बचपन में नारी मर्यादा के संस्कार नहीं सिखाए जाएंगे, तब तक ऐसे कानून मजाक बनते ही रहेंगे। लिंग आधारित हिंसा कई शताब्दियों से मानव इतिहास का एक काला अध्याय रहा और सारे कानून नारी आंदोलन सातवीं परंपराओं के बावजूद पुरुष बर्बरता, वहशीपन और स्त्रियों के प्रति अपराध भावना में कोई परिवर्तन नहीं आया लगता है। स्त्रियां भूण हत्या, गरीबी और युद्ध के कारण मारी जाती हैं। यह हत्याएं औरतों और पुरुषों दोनों की ही होती है, किंतु जो हत्याएं बलात्कार कर मार देने की है उनकी लगातार वृद्धि हो रही हैं। इसके साथ ही छेड़खानी के किस्से भी लगातार बढ़ रहे हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में बसों में चढ़ना भी खतरनाक होता जा रहा है। कुल मिलाकर औरत सभी जगह अपने को असुरक्षित महसूस कर रही है। सच्चाई यह है कि आज भी औरत को मनुष्य समाज का भाग नहीं है, केवल भोग की वस्तु माना जाता है। तब तक यह दृश्य नहीं बदलता, कुछ बदला नहीं जा सकता। दुर्भिक्ष, बाढ़ तो प्राकृतिक विपदाएं हैं, मनुष्य द्वारा स्त्री के संबंध में अपनाई गई पंक्तियां उन से कहीं ज्यादा कष्टकारी हैं तथा पुलिस की ब्रिटिश मनोवृति का परिणाम है। कहने को तो नारी सशक्तिकरण हो रहा है। पंचायतों में इसे दिशा दी है। पश्चिम से ही विचार आ रहे हैं। आंदोलन का स्वरूप आ रहा है। मैरिज वेस्टर्न क्राफ्ट महिला आंदोलन जननी बताई जाती है। भारत में नारीवाद की एक लंबी परंपरा रही। द्रोपदी, मैत्रेयी, गार्गी से लेकर नूरजहां, रजिया सुल्तान, चाँद बीबी, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्या बाई से लेकर सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय और अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी से लेकर इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी भी कतार में है। एक ओर तो सशक्त महिलाएं के प्रेरणादायी उदाहरण हमें गौरवान्वित करते हैं, तो दूसरी ओर दामिनी, निर्भया, आसिफा जैसी दुष्कर्म का शिकार हुई लड़कियों की लंबी फ़ेहरिस्त शर्मसार करती है। दरअसल, जब ऐसी दुर्घटनाएं होती है राजनेताओं के वक्तव्य सुनकर के समूचा मानव जगत का सीना छलनी हो जाता हैं। क्या ऐसे राजनेताओं के घर में बहन-बेटियां नहीं होती। जिस तरह से समाज में ऐसी विकृतियां फैली हुई हैं। जिन को दूर करने के लिए मनुष्य को और पूरे समाज को एकजुटता का आवाहन करना होगा और जन्म से लेकर के युवावस्था तक अपने बच्चों को नारी सम्मान की गाथाएं सुनवानी होगी। ध्यान रहे परिवर्तन एक दिन में नहीं होता, परिवर्तन के लिए अनेक संघर्ष करने पड़ते। अब वक्त की मांग है कि नारी उत्थान के लिए आंदोलन छेड़ा जाएं।

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