भारत राष्ट्र के निर्माताओं में से एक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

 

-अशोक “प्रवृद्ध”

स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है के उद्घोषक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक (3 जुलाई 1856- 1 अगस्त 1920)  एक भारतीय राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और एक स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में लोकख्यात हैं। ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में से एक थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के घोर आलोचक तिलक का मानना था कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्खन (डेक्कन)  शिक्षा सोसायटी की स्थापना की ताकि भारत में शिक्षा का स्तर सुधारा जा सके । बहुमुखी प्रतिभा के धनी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक माने जाने वाले बाल गंगाधर तिलक राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ भारतीय इतिहास, संस्कृत, हिन्दू धर्म, गणित और खगोल विज्ञानं जैसे विषयों के विद्वान भी थे। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रथम लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध तिलक को ब्रिटिश औपनिवेशिक प्राधिकारी भारतीय अशान्ति के पिता कहते थे। इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। ब्रिटिश काल में सर्वप्रथम भारतीय जनता के सर्वमान्य नेता के रूप वे में उभरे थे। आम जनता के द्वारा नायक के रूप में सर्वस्वीकृत किये जाने के कारण ही उन्हें लोकमान्य का आदरणीय संज्ञा भी प्राप्त हुआ। ब्रिटिश राज के दौरान स्वराज के सबसे पहले और मजबूत अधिवक्ताओं में से एक तिलक भारतीय अन्तःकरण में एक प्रबल आमूलचूल परिवर्तन के समर्थक थे। उनका मराठी भाषा में दिया गया नारा स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच अर्थात स्वराज यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई नेताओं से एक क़रीबी सन्धि बनाई, जिनमें बिपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, अरविन्द घोष, वी० ओ० चिदम्बरम पिल्लै और मुहम्मद अली जिन्नाह शामिल थे। स्वतंत्रता संग्राम में लाला लाजपतराय, तिलक जी और बिपिनचन्द्र पाल की तिकड़ी लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति के नाम से प्रसिद्ध थी, जिनसे स्वाधीनता संग्राम में बड़ी धूम मचाई । तिलक ने इंग्लिश में मराठा दर्पण व मराठी में केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। अपने पत्रों में तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।भारत राष्ट्र के निर्माताओं में अपना एक विशिष्ट स्थान  रखने वाले बाल गंगाधर तिलक  का जन्म तीन जुलाई 1856 ईस्वी को ब्रिटिश भारत में वर्तमान महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के एक गाँव चिखली में महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण वंश में हुआ था। उनके पिता गंगाधर शास्त्री रत्नागिरी में संस्कृत विद्वान व शिक्षक थे। उनकी माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था । 1871 में तिलक ने तापीबाई से शादी की जो बाद में सत्यभामा के रूप में प्रख्यात हुई । उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण वंश का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। शिवाजी के बाद महाराष्ट्र राज्य के अधिकारी बने पेशवा इसी वंश की सन्तान थे। महान क्रान्तिकारी चाफेकर बन्धु वीर सावरकर, गोपालकृष्ण गोखले आदि इतिहास पुरुषों के साथ ही बालगंगाधर तिलक ने भी इसी वंश में जन्म लिया। इस वंश के नामकरण के विषय में एक जनश्रुति प्रसिद्ध है कि बेन अर्थात इजराइल के एक धर्मोपदेशक भारत आ रहे थे, तो उनका जलयान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनका मृत शरीर कोंकण के तट पर आ लगा। मृत शरीर को अन्त्येष्टि के लिए चिता पर रखा गया, तो वह जीवित हो गया। पुनः चैतन्य संचार हो जाने से उस व्यक्ति का वंश चितपावन कहा गया, जो बाद में भारत में ब्राह्मण कुल बन गया । पेशवाओं के शासनकाल में ही इसी वंश में सन 1776 में केशवराव नामक एक व्यक्ति का जन्म हुआ। अपने जीवनकाल में केशवराव रत्नागिरी जिले में दपोली तहसील के अन्तर्गत अपने जन्म स्थान चिलख गाँव के खोत अर्थात पटवारी बने। उनके दो पुत्र थे, रामचन्द्र और काशीनाथ। बड़े पुत्र रामचन्द्र का जन्म 1802 ईस्वी में हुआ था। सन 1820 में रामचन्द्र के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम गंगाधर पड़ा। इन्हीं गंगाधर के कुल में बाल गंगाधर तिलक  का जन्म तीन जुलाई 1856 ईस्वी को हुआ था। इनका पूरा नाम लोकमान्य  बाल गंगाधर तिलक था। तिलक का जन्म एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक पहले रत्नागिरि में सहायक अध्यापक थे और फिर पूना तथा उसके बाद ठाणे में सहायक उपशैक्षिक निरीक्षक हो गए थे। वे अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शिक्षक थे। कई वर्षों तक शिक्षण कार्य करने के बाद 1866 में वह पूना और थाना में सहायक उप शिक्षा अधिकारी बने। अपने चिपलूण के अध्यापकीय जीवन में ही उनका विवाह हो गया था। उनकी पत्नी का नाम पार्वतीबाई था। वह एक धर्मपरायण मराठा ब्राह्मण थे। धर्म के नियमों का अत्यन्त कठोरता से पालन करते थे। इसीलिए उनका शरीर अत्यन्त कृश था। संस्कृत के ज्ञाता होने के कारण लोग उन्हें गंगाधर शास्त्री कहते थे। उन्होंने त्रिकोणमिति और व्याकरण पर पुस्तकें लिखीं जो प्रकाशित हुईं। अपने पुत्र की शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के पूर्व ही लोकमान्य तिलक के पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक का सन 1872 ईस्वी में निधन हो गया।

बाल गंगाधर तिलक का सार्वजनिक जीवन 1880 में एक शिक्षक और शिक्षण संस्था के संस्थापक के रुप में आरम्भ हुआ। इसके बाद केसरी और मराठा के माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध तो किया ही, साथ ही भारतीयों को स्वाधीनता का पाठ भी पढ़ाया। वह एक निर्भीक सम्पादक थे, जिसके कारण उन्हें कई बार सरकारी कोप का भी सामना करना पड़ा।पारम्परिक सनातन धर्म व हिन्दू विचारधारा के प्रबल समर्थक तिलक का अध्ययन असीमित था। उनके द्वारा किये गए शोधो से उनके गहन गम्भीर अध्ययन का परिचय मिलता है। अपने धर्म में प्रगाढ़ आस्था होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में संकीर्णता का लेशमात्र भी नहीं था। अस्पृश्यता के वह प्रबल विरोधी थे। इस विषय में एक बार उन्होंने स्वयं कहा था कि जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए वह कुछ भी करने को तत्पर हैं। महात्मा फुले जैसे ब्राह्मण विरोधी व्यक्ति ने उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही कोल्हापुर मानहानि मुकदमे में उनके लिए जमानत करने वाले व्यक्ति की व्यवस्था की थी। वह विधवा विवाह के भी समर्थक थे। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं कहा था कि कहने भर से विधवा विवाह को समर्थन नहीं मिलेगा, यदि कोई वास्तव में इसे प्रोत्साहन देना चाहता है, तो उसे ऐसे अवसरों पर स्वयं उपस्थित रहना चाहिए और इनमें दिए जाने वाले भोजों में अवश्य भाग लेना चाहिए।अपने समय के सर्वाधिक आदरणीय व्यक्तित्व तिलक ने यूँ तो अनेक पुस्तकें लिखीं किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या को लेकर मांडले जेल में लिखी गयी गीता-रहस्य सर्वोत्कृष्ट है जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी लिखी हुई पुस्तकें- वेद काल का निर्णय , आर्यों का मूल निवास स्थान, श्रीमद्भागवतगीता रहस्य अथवा कर्मयोग शास्त्र, वेदों का काल-निर्णय और वेदांग ज्योतिष ,हिन्दुत्व तथा श्यामजीकृष्ण वर्मा को लिखे तिलक के पत्र अत्यंत लोकप्रिय हुए तिलक ने इंग्लिश में मराठा दर्पण व मराठी में केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए।

उनकी समस्त पुस्तकें मराठी अँग्रेजी और हिन्दी में लोकमान्य तिलक मन्दिर, नारायण पैठ, पुणे से सर्वप्रथम प्रकाशित हुईं। बाद में उन्हें अन्य प्रकाशकों ने भी छापा।उनकी राजनीतिक कर्मभूमि कांग्रेस थी, किन्तु उन्होंने अनेक बार कांग्रेस की नीतियों का विरोध भी किया। अपनी इस स्पष्टवादिता के कारण उन्हें कांग्रेस के नरम दलीय नेताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ा। इसी विरोध के परिणामस्वरुप उनका समर्थक गरम दल कुछ वर्षों के लिये कांग्रेस से पृथक् भी हो गया था, किन्तु उन्होंने अपने सिद्धान्तों से कभी समझौता नहीं किया। वह एक पारम्परिक सनातन धर्म को मानने वाले हिन्दू थे। अपने धर्म में प्रगाढ़ आस्था होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में संकीर्णता का लेशमात्र नहीं था। अस्पृश्यता के वह प्रबल विरोधी थे। निश्चय ही तिलक अपने समय के प्रणेता थे। उनका देशप्रेम अद्वितीय था। लंबे समय तक वह भारतीय राजनेताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्ति रहे। उनके महनीय गुणों की भारतीयों ने ही नहीं, अपितु कई अंग्रेजों ने भी प्रशंसा की है। तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। 1908 में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गये और 1916 में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की। सन 1919 ईस्वी में कांग्रेस की अमृतसर बैठक में हिस्सा लेने के लिये स्वदेश लौटने के समय तक तिलक इतने नरम हो गये थे कि उन्होंने मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों के ज़रिये स्थापित लेजिस्लेटिव कौंसिल (विधायी परिषद) के चुनाव के बहिष्कार की गान्धी की नीति का विरोध ही नहीं किया। इसके बजाय तिलक ने क्षेत्रीय सरकारों में कुछ हद तक भारतीयों की भागीदारी की शुरुआत करने वाले सुधारों को लागू करने के लिये प्रतिनिधियों को यह सलाह अवश्य दी कि वे उनके प्रत्युत्तरपूर्ण सहयोग की नीति का पालन करें। लेकिन नये सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही 1 अगस्त,1920 ईस्वी को बम्बई में उनकी मृत्यु हो गयी।

 

 

 

 

 

 

 

 

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