देखो, कश्मीर मुस्करा रहा है…

  • श्याम सुंदर भाटिया

एशिया के स्विज़रलैंड समझे जाने वाले कश्मीर के बारे में मशहूर सूफी संत एवं कवि अमीर खुसरो ने कहा था, गर फिरदौस बर रुये जमीं अस्त… हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त… अगर धरती पर जन्नत है, तो वो यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं हैं… अमीर खुसरो ने कश्मीर की दिलकश की वादियों को लेकर उनकी शान में कसीदे पढ़े, होंगे जबकि मुग़ल शासक जहाँगीर ने कश्मीर की सुंदरता से प्रभावित होकर इसे धरती का स्वर्ग कहा था, लेकिन आर्टिकल 370 की बंधन समाप्ति के बाद इसकी सीरत में भी आमूल-चूल परिवर्तन आया है। सेबों की लालिमा और केसर की खुशबू अपनी चमक, दमक और खनक से अपनेपन का शिद्दत से अहसास करा रही हैं। कश्मीर अब मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है बल्कि 137 करोड़ लोगों का इस पर अधिकार है। ‘एक देश, एक संविधान, एक झंडा’ महज एक सपना नहीं, बल्कि हकीकत है। अर्से से चोटिल इस घाटी के जख्म रातों-रात तो नहीं भरे जा सकते हैं लेकिन केंद्र के सभी 890 कानून और योजनाएं उम्दा मरहम का काम कर रही हैं। 50 नए कॉलेज खोले गए हैं। 35 हजार शिक्षकों को नियमित  गया है।  हेल्थ सेक्टर में साढ़े सात हजार करोड़ का निवेश हुआ है। सूबे में दो एम्स खोलने की तैयारी है। जम्मू और श्रीनगर को स्मार्ट सिटी बनाया जा रहा है। यहां लाइट मेट्रो रेल ट्रांजिट सिस्टम के लिए 10,599 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट स्वीकृत कर दिया गया है। पर्यटन के विकास पर भी 552 करोड़ रुपए खर्च होंगे। मुस्कराने के लिए कश्मीर की झोली भरी है। इंटरनेट और 4जी का व्यवधान और अब लम्बे लॉकडाउन के चलते विकास की बयार अनसीन हो लेकिन केंद्र शासित प्रदेश के बाद सेंटर की गवर्मेंट की नीयत में कोई खोट नहीं है। आंकड़े विकास का इशारा करते हैं , लेकिन अलगाववादियों और सियासीदानों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है तो वे मुगालते में हैं और उन्हें अपने चश्मों से सकारात्मकताऔर नकारात्मकता को देखने के फर्क का नजरिया बदलना होगा।      

बसीकत, सरकारी नौकरी, जमीन खरीददारी का रास्ता साफ़

अनुच्छेद 370 के चलते पहले दूसरे सूबों के लोगों को यहाँ बसने, सरकारी नौकरी और जमीन खरीदने की मनाई थी। विशेष अधिकारों के तहत देश ही नहीं, दुनिया भर में जम्मू-कश्मीर की अलग पहचान थी। अब बाहरी लोगों को बसाने के लिए नया डोमेसाइल कानून लागू हुआ है। इस कानून के तहत उन लोगों को डोमेसाइल स्टेटस देता है, जो सूबे में 15 साल से रह रहे हैं। इसके अलावा इस कानून का उन छात्र-छात्राओं को भी बड़ा लाभ हुआ है, जो सात साल से जम्मू-कश्मीर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। यह बात दीगर है, वहां के बाशिंदों को डेमोग्राफी बदलने का डर है। जम्मू-कश्मीर की 68 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जबकि शेष आबादी में 30 फीसदी हिन्दू, 2 फीसद सिख और 1 फीसदी बौद्ध रहते हैं। उल्लेखनीय है, सर्वाधिक हिन्दू जम्मू में रहते हैं। अनुच्छेद 370 समाप्ति के बाद उन तीन लाख लोगों के बसने का रास्ता साफ़ हो गया है, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान छोड़कर जम्मू आ गए थे और 72 सालों से बतौर शरणार्थी रह रहे हैं।

लॉकडाउन में सैकड़ों शिकारे वालों की केंद्र ने की इमदाद   

केंद्र सरकार ने डल झील पर शिकारा चलाने वाले सैकड़ों लोगों की आर्थिक मदद की है। सरकार की तरफ से हर शिकारे वाले को तीन माह तक एक हजार रुपए की इमदाद दी गई है। इसमें कोई शक नहीं, डल झील पर शिकारा चलाने वालों की कमाई पूरी तरह टूरिज़्म पर निर्भर है। एक अनुमान के मुताबिक 5.20 लाख टूरिस्ट या बाहरी लोग फ़िलहाल घाटी छोड़कर चले गए हैं। हाउस बोर्ड वेलफेयर एक चैरिटी संस्था है। यह चैरिटी हर महीने उन 600 शिकारे वालों की मदद करती है, जिनकी कमाई का जरिया सिर्फ टूरिस्म ही है। कश्मीर में हैंडीक्राफ्ट सेक्टर ख़ासकर कालीन का कारोबार फ़िलहाल  कोरोना की चमेट में है। देश के दीगर सूबों में भी हैंडीक्राफ्ट डॉकडाउन का शिकार रहा है, ऐसे में कश्मीरी कालीन के हालात जुदा नहीं हैं।     

कश्मीर में युवाओं की बतौर आतंकी में कमी

तीन दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे कश्मीर में आतंकी तंजीबों की भर्ती में जबर्दस्त गिरावट आयी है। इसका साफ़-साफ़ मतलब यह हुआ, कश्मीर के युवा अब अमन चाहते हैं। सुरक्षा एजेंसियों के डेटा के मुताबिक 2018 में 219 कश्मीरी आतंवादी बने थे। हालाँकि 2019 में इनकी संख्या घटकर 119 पहुंच गई। 2020 में 30 जून तक 74 कश्मीरी आतंकी तंजीबों से जुड़े हैं। स्थानीय आतंकियों की भर्ती में कमी आने की ख़ास वजह यह भी है, अब ज्यादातर आतंकी संघटनो के टॉप कमांडरों को मार दिया जा रह है। आंकड़े बताते हैं, 2018 में 215 और 2019 में 152 मारे गए थे। 2020 में 30 जुलाई तक सुरक्षाबलों ने 148 आतंकियों के ढेर कर दिया।              

कठोर क़दमों का सकारात्मक प्रतिफल

एक बरस पहले संवैधानिक बदलाव किए जाने के बाद से आंकड़ों के तुलनात्मक विश्लेषण से पता चलता है कि हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है। आंकड़े बताते हैं। 2018 में पथराव की 532 घटनाएं हुई, वहीं 2019 में 389 तो 2020 में 102 घटनाएं हुईं। 2018 के मुकाबले 2019 में 27 प्रतिशत की कमी आई, वहीं 2020 में 73 प्रतिशत की कमी आई है। 2018 में 2,268 पथराव करने वाले गिरफ्तार किए गए तो 2019 में 1,127 और 2020 में 1,152 पत्थरबाज गिरफ्तार किए गए। तीन के तुलनात्मक आंकड़ों के मुताबिक 2018 में 583 आतंकवादी गैर कानूनी रोकथाम अधिनियम के तहत गिरफ्तार किए तो 2019 में 849 और 2020 में 444 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया। जो अलगाववादी नेता कश्मीर में हड़ताल का आहवान किया करते थे, वे शासन के कठोर क़दमों से हताश हैं क्योंकि सरकार ने अलगाववादी के बैंक खातों को सील करने और आतंकवाद से मिलने वाले धन से अर्जित उनकी सम्पत्तियों को कुर्क करने जैसे कदम उठाए हैं। एक बरस में इन अलगाववादी समूहों ने नाम मात्र को ही किसी बंद का आहवान किया है। मुख्य अलगाववादी नेताओं- जेकेएलएफ के यासीन मलिक और जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिव फ्रीडम पार्टी के शब्बीर शाह की गिरफ़्तारी के बाद ये समहू निष्क्रिय हो गए हैं। नियमों में बदलाव किए जाने के बाद आंतकवादियों के जनाजे में जुटने वाली हजारों की भीड़ पर भी रोक लगाई गई।         

सबका साथ… सबका विकास… सबका विश्वास के गढ़े गए नए आयाम

वरिष्ठ पत्रकार श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी मानते हैं, 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद सबसे जरुरी था, आम कश्मीरियों के जीवन में बदलाव आए। बदलाव के जरुरी था, बिजली, सड़क जैसी जरुरतें पूरी करके उन्हें रोजगार दिया जाए। अब कश्मीर की आवाम के सपनों में रंग भरा जाने लगा है। दक्षिण कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित शोपियां जिले के दुननाडी गांव में 73 वर्षों के बाद बिजली पहुंची है। जम्मू के कटरा से ऊपर जाते हुए आपको जम्मू-कश्मीर के हर रास्ते पर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना की होल्डिंग दिख जाएंगी, लेकिन शोपियां के दुननाडी गांव में बिजली आने की कहानी सबको जानना जरुरी है। इस गांव बिजली पहुंची या नहीं, इसकी निगरानी खुद प्रधानमंत्री कार्यालय से की जा रही थी। बिजली विभाग के कर्मचारियों ने एक सप्ताह में इस गांव में बिजली पहुंचा दी। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय का जम्मू-कश्मीर पर विशेष ध्यान है, इसीलिए जब 26 जुलाई को प्रधानमंत्री ने मन की बात में अनंतनाग के नगर पालिका अध्यक्ष मोहम्मद इकबाल की की तारीफ छह लाख लागत वाली सैनिटाइज़ करने वाली मशीन को 50 हजार रुपए में तैयार करने के लिए की तो किसी को हैरानी नहीं हुई। अनुच्छेद 370 की समाप्ति ने जम्मू-कश्मीर को सही मायने में स्वतंत्रता दे दी है। रक्तगुलाब, दिद्दा द वैरियर क्वीन ऑफ कश्मीर और रिफ्यूजी कैंप के लेखक एवं मीडिया की जानी-मानी पर्सनालिटी श्री आशीष कॉल कहते हैं, अनुच्छेद 370 की समाप्ति सरकार की बेमिसाल उपलब्धि है। लोग कहते थे, कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली 370 को हटाया गया तो खून की नदियां बह जाएंगी। उन्होंने सुझाव दिया, सरकार को कश्मीर के लिए अब ऐसी आर्थिक नीति बनानी चाहिए, जिससे न केवल आतंवाद का जड़ से खात्मा हो बल्कि कश्मीर का चहुंमुखी विकास हो।   

उमीदों को मिले पंख, कश्मीर में खुलेगा पहला मल्टीप्लेक्स

श्रीनगर के सीनियर जर्नलिस्ट श्री नवीन नवाज़ कहते हैं, कश्मीर और बॉलीवुड का नाता बरसों पुराना है। अनुच्छेद-370 की समाप्ति और जेएंडके पुनर्गठन नियम लागू किए जाने के बाद कश्मीर और बॉलीवुड के टूटे रिश्तों में गर्माहट आने लगी है। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी नामी हस्तियां कश्मीर में निवेश करना चाहती हैं। कश्मीर में पहला मल्टीप्लेक्स जल्द ही खुलने वाला है। आतंकवाद के दौर में गीत-संगीत और फिल्मों को इस्लाम विरोधी करार देते हुए वादी के दो दर्जन सिनेमा घरों को जबरिया बंद करा दिया गया था। अब सिनेमाघरों में रंगाई-पुताई हो रही है। फिल्मों की शूटिंग के लिए नई लोकेशन चिन्हित की जा रही हैं। एक बरस में एक दर्जन फिल्मों और सीरियलों को कश्मीर में शूटिंग हो चुकी है। फिल्म सिटी बनाने की बात हो रही है। मुंबई ही नहीं, दक्षिण भारत, पंजाब और बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री को कश्मीर में शूटिंग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। वरिष्ठ साहित्यकार श्री हसरत गड्डा कहते हैं, एक साल में बहुत कुछ बदल गया है। कश्मीरियों की उम्मीदों को पंख लग चुके हैं। बात सिनेमा घरों और फिल्मों की शूटिंग की नहीं है, यह आम आदमी की ख्वाहिशों की बात है। श्री नवाज मानते हैं, कश्मीर के आवाम की नजर केंद्र के वायदों के क्रियान्वयन पर है। 370 की समाप्ति के बाद जनता का विरोध स्वरुप सड़कों पर न उतरना यह बताता है, कश्मीर के बाशिंदे अमन पसंद हैं। अलगवादी हुर्रियत नेता सैयद अली गिलानी ने अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से 27 साल बाद इसीलिए नाता तोड़ लिया है, क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें बिलकुल दरकिनार कर दिया था।  90 वर्षीय इस नेता ने कश्मीर घाटी के सबसे बड़े अलगाववादी संगठन से इस्तीफा दे दिया है। सियासीदां चाहें नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला हों या उमर अब्दुल्ला, नहीं समझ पा रहे हैं, मौजूदा हालात से बाहर आने का क्या रास्ता होगा। पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ़्ती की पीएसए तीन महीने और बढ़ा दी गई है। यह सच है, जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने पर सूबे में देश के झंडे को कोई थामने वाला नहीं मिलेगा की धमकी देने वाली महबूबा मुफ़्ती को कोई याद नहीं करता है।

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