बाबरी मसजिद प्रकरण- लखनऊ का सांस्कृतिक समझौता फार्मूला

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आज जब इलाहाबाद उच्चन्यालय की लखनऊ पीठ ने बाबरी मसजिद पर  फैसला सुनाया तो आरंभ में टीवी चैनलों पर भगदड़ मची हुई थी,भयानक भ्रम की स्थिति थी। समझ में नहीं आ रहा था आखिरकार क्या फैसला हुआ ? लेकिन धीरे-धीरे धुंध झटने लगा। बाद में पता चला कि उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुनियादी तौर पर विवाद में शामिल पक्षों को सांस्कृतिक समझोते का रास्ता दिखाया है। इस फैसले की कानूनी पेचीदगियों को तो वकील अपने हिसाब से देखेंगे। लेकिन एक नागरिक के लिए यह फैसला चैन की सांस लेने का  मौका देता है।
लखनऊ पीठ के फैसले की धुरी है भारत की सामयिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक विविधता और भाईचारा। बाबरी मसजिद का विवाद राजनीतिक-साम्प्रदायिक विवाद है। यह मंदिर-मसजिद का विवाद नहीं है बल्कि एक तरह से विचारधारात्मक विवाद भी है औऱ विचारधारात्मक विवादों पर बुर्जुआ अदालतों में फैसले अन्तर्विरोधी होते हैं।
राम के जन्म को लेकर जिस चीज को आधार बनाया गया है वह कानूनी आधार नहीं है ,वह सांस्कृतिक-राजनीतिक समझौते का आधार है। अदालत के फैसले से राम पैदा नहीं हो सकते और न भगवान के जन्म को तय किया जा सकता है। भगवान अजन्मा है। यह विवाद का विषय है।
मौटे तौर पर जस्टिस एस .यू.खान के फैसले ने आरएसएस को विचारधारात्मक तौर पर करारा झटका दिया है। इस फैसले की पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि बाबर ने राममंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनायी थी। संघ परिवार का प्रौपेगैण्डा इस राय से ध्वस्त होता है। संघ परिवार का सारा प्रचार अभियान इसी आधार पर चला आ रहा था कि बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनायी थी। अदालत ने इसे नहीं माना है।
अदालत ने विवादित जमीन पर साझा स्वामित्व को स्वीकार किया है। यानी हिन्दू-मुसलमानों के साझा स्वामित्व को माना है। यानी राममंदिर की मूर्ति जहां रखी है वह वहीं रहेगी और मुसलमानों को एक तिहाई जमीन पर स्वामित्व मिलेगा। संघ परिवार की यह मांग थी कि रामजन्मस्थान पर मसजिद नहीं बननी चाहिए। इस मांग को अदालत ने एकसिरे से खारिज कर दिया है। आज की स्थिति में मंदिर -मसजिद साथ में हो सकते हैं। मुसलमानों को एक तिहाई जमीन का स्वामित्व देकर अदालत ने संघ परिवार की मांग को एकसिरे से खारिज किया है।
संघ परिवार चाहता था कि अयोध्या में कहीं पर भी बाबरी मसजिद नहीं बनायी जाए। उसे दोबारा बनाया जाए तो अयोध्या के बाहर बनाया जाए। वे यह भी चाहते थे कि राम जन्मभूमि की जमीन पर मुसलमानों का कहीं पर भी कोई प्रतीक चिह्न न हो। लखनऊ पीठ ने विवादित जमीन पर मुसलमानों का एक-तिहाई स्वामित्व मानकर संघ परिवार को करारा झटका दिया। वक्फ बोर्ड की पिटीशन कानूनी दायरे के बाहर थी इसलिए खारिज की है।
लखनऊ पीठ के फैसले में सबसे खतरनाक पहलू है आस्था के आधार पर रामजन्म को मानना। निश्चित रूप से आस्था के आधार पर भगवान के जन्म का फैसला करना गलत है। इस आधार पर बाबरी मसजिद की जगह पर राम जन्मभूमि को रेखांकित करना, बेहद खतरनाक फैसला है। इसके आधार पर संघ परिवार आने वाले दिनों में अपने मंदिर मुक्ति अभियान को और तेज कर सकता है और जिन 3000 हजार मसजिदों की उन्होंने सूची बनायी है उनकी जगह वह मंदिर बनाने की मांग पर जोर दे सकता है। इससे काशी विश्वनाथ मंदिर के पास वाली मसजिद और मथुरा के कृष्णजन्मभूमि के पास बनी ईदगाह मसजिद को गिराने या हटाने या हिन्दुओं को सौंपने की मांग जोर पकड़ सकती है।
आस्था के आधार पर जब एकबार हिन्दू मंदिर या हिन्दू देवता की प्राचीनकाल में उपस्थिति को अदालत ने आधार बना लिया है तो फिर इस निर्णय के आदार संघ परिवार कम से कम इन दो मंदिरों के पास बनी मसजिदों को हासिल करने के लिए आंदोलन तेज करेगा। वे हाईकोर्ट में जा सकते हैं अथवा हाईकोर्ट के इस फैसले के आधार पर अपनी अतार्किकता को वैधता प्रदान करने की कोशिश कर सकते हैं।
लखनऊ पीठ के फैसले पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जो बयान दिया है वह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है उन्होंने सभी से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने राम मंदिर निर्माण में सभी से सहयोग मांगा है। लेकिन वे यह नहीं बोले कि उन्हें विवादित जमीन पर मसजिद भी कबूल है। इस प्रसंग में भाजपानेता और सुप्रीम कोर्ट वकील रविशंकर प्रसाद ने जिस तरह वकील की बजाय एक हिन्दू स्वयंसेवक के नाते मीडिया को संबोधित किया उससे यही बात पुष्ट होती है कि वे वकील कम स्वयंसेवक ज्यादा है।

15 thoughts on “बाबरी मसजिद प्रकरण- लखनऊ का सांस्कृतिक समझौता फार्मूला

  1. माननीय, जगदीश्वर जी,
    आप जैसे महान लेखकों को बिना पढ़े टिका टिप्पणी शोभा नहीं देता, पूरा जजमेंट 8,००० पेज में है, जिसको पढ़ने के लिए समझने के लिए कम से कम २ वीक चाहिए, आप तो जजमेंट पढ़े बिना शुरू हो गए, अभी इतना भी महान नहीं हुए हैं सर, जो बिना पढ़े सब समझ जाएँ, ये लिंक है फुल जजमेंट का http://elegalix.allahabadhighcourt.in/elegalix/DisplayAyodhyaBenchLandingPage.do
    इस जजमेंट में सारे framed issues और सारे issues पर तीनों माननीय जजों का निष्कर्ष है, पुरे जजमेंट में ये कंही नहीं लिखा है की चूँकि हिन्दूओं की आस्था है इसलिए ये जगह उनहें दे दी जाए,

    आपने बिना पूरा जजमेंट पढ़े ये लिख दिया की कोर्ट ने नहीं माना वंहा राम मंदिर था ! जबकी तीनो जजों ने ये माना की पहले वंहा हिन्दू धार्मिक स्थल था. जजमेंट का लिंक ऊपर है, पहले पूरा पढ़ें, तब कुछ बोले नहीं तो आपकी डिग्री पर भी सबको शक हो जाएगा.

    और इस जजमेंट को आने से rss नहीं सारे वामपंथी इतिहासकार बेनकाब हो गए हैं, जो देश को गलत इतिहास पढ़ाते रहे,
    आप चिंता नहीं करें, जल्द ही ये फैसला Supreme Court से approve हो जायेगा, तब आप सब वामपंथी इतिहासकारों को मैं अकेला देश से माफ़ी माँगने पर मजबूर कर दूंगा.
    अभी बस Supreme Court का ठप्पा लगना बाकी है

    इस जजमेंट में अगर कुछ गलत है तो बस बिना किसी सबूत के वक्फ बोर्ड को १/३ जमीन मिल गया. क्योंकी ये टोम्ब एक सिया नवाब के द्वारा बनाया गया था, जबकि दावा ठोंका एक शुन्नी वक्फ बोर्ड ने, और तो और उस प्रोपर्टी का कभी वक्फ ही क्रियेट नहीं हुआ साथ ही शुन्नी वक्फ बोर्ड कोई भी सबूत नहीं दे सकी वक्फ क्रियेसन का ?

    और जगदीश्वर जी आपको ये जान कर शोक्क लगेगा की, इस देश में एक law है adverse possession का जो सारे law पर supercede करता है, उस जगह पर हिन्दू १२ साल से भी ज्यादा सालों तक पूजा करते रहे उस प्रोपर्टी को manage करते रहे, पर वो सुन्नी वक्फ बोर्ड वाले सोये रहे, वो जागे भी तो अपने कारण से नहीं कुछ तथाकथित समाजवादियों व वामपंथियों के politicization से,
    मुझे उम्मीद है आप पढ़े लिखे हैं पहले पूरा जजमेंट पढेंगें फिर कोई बात कहेंगे, अगर सच के साधक हैं तो अपने सारे लेख जो बिना पढ़े लिखे गए हैं उसे वापस लेते हुए समाज, देश और कोर्ट से माफी भी मांगेंगे नहीं तो लिखना छोड़ देंगें, और अयोध्या में संन्यास लेंगें.

  2. हमेशा की तरह इस बार भी श्री चतुर्वेदी जी ने हिन्दू समाज की तरफ नकारात्मक रुख अपनाया है.

  3. ise kahte hain sanghi tanashahi jo kisi bhi prakar ke tark nahi sun pata aur desh drohi videshi ka tamga thhokna shuru kar deta hai khair is faisle se bhagwan ram ki saujanyata aur shalinta sthapit huyee aur ek bar phir se Apne Dadi ke JAI SIYARAM BHAJO ki punarsthapna maine mahsus kiya.

    1. इसे कहते हैं सच्चे लोकतांत्रिक जो कि अपने पक्ष मे फैसला न आने पर न्याय तंत्र को ठेंगे पर रखने का दम रखते हैं

  4. इसे कहते हैं कि ‘सावन के अंधे को हरा ही हरा नज़र आता है’. इन वामपंथी मित्रों की सच को देखने की क्षमता समाप्त हो गयी है. ये अपने वामपंथ के कूएँ से बाहर आने की क्षमता खो चुके हैं. इन्हें हिन्दू और भारतीयता के विरोध का असाध्य रोग लग चुका है.
    अतः इन की किसी बात की परवाह करना केवल समय की बर्बादी है. पर मजबूरी यह है कि ये लोग अभी भी समाचार माध्यमों पर कब्जा जमाये हुए हैं और अपनी बेतुकी व बेवक्त की रूसी-चीनी रागिनी गाये जा रहे हैं. एक तरह से यह अछा भी हो रहा है. इनकी असलियत खुल कर सामने आ रही है. पहले बहुत कम लोग होते थे जो इन्हें भारतीयता का अंध शत्रु समझते थे, पर अब इनकी असलियत को समझने वालों की संख्या आश्चर्यजनक तेजी से बढ़ी है. ये अछे लक्षण हैं, यह सुखद और कल्याणकरी है.
    तो कुल मिला कर साफ़ नज़र आ रहा है कि ‘खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे’ वाली स्थिते है बेचारों की. १८ साल से गा-गा कर कह रहे हैं कि राम जन्मभूमी पर राम मंदिर होने के कोई भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं. अब न्यायालय के बहुमत से इनके झूठ का किला ढह गया तो संघ पर अपनी भडास निकाल रहे हैं. ठीक है, संघ के खम्बे को नोचो ; क्या बिगाड़ लोगे उनका. वामपंथियों की काली सोच को समझ चुके लोग ज़रूर सोचेंगे कि जिस संघ की आलोचना ये भारतीय संस्कृति वरोधी लोग कर रहे हैं, वह संगठन ज़रूर अछा और देशभक्त होगा.
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    -शैलेन्द्र जी आप सार्थक, सही, सटीक बात कहने में सक्षम हैं. प्रयास जारी रहे. बधाई व शुभकामनाएं.
    – पंकज जी की परिपक्व, संक्षिप्त, सार्थक टिप्पणियाँ सदा ही पठनीय होती हैं.
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    अधिकाँश ने इस लेख और लेखक की भर्त्सना की है. क्या आदरणीय चतुर्वेदी जी उदारता से अपने पूर्वाग्रही, संकीर्ण और कंडीशंड सोच से बाहर निकल कर सोचने-समझने का प्रयास करेंगे ? शुभकामनाये कि वे ईश्वर कृपा से सच को समझने की सामर्थ्य प्राप्त कर सकें.

  5. संपादक महोदय
    इनके लेखो को बंद करो, यह व्यक्ति कोर्ट के निर्णयों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहा है

  6. जगदीश्वर जैसे लोग अब पुनःश्च नए सिरे से रुदन मे व्यस्त हो गए, जब से उन्हे ज्ञात हुआ है कि तीनो माननीय न्यायाधीशों ने वहाँ पर मंदिर के आस्तित्व को (मस्जिद के पूर्व) स्वीकार किया है, और तो और माननीय खान जी ने भी उस स्थान पर मस्जिद को धर्म युक्त नही माना है चुंकि यह दूसरे धर्म स्थल पर बना था (उन्होने सिर्फ इतना माना है कि मंदिर पहले ही टूट गया था) तब से इन लोगो को अपना मुंह छुपाने के लिए जगह मिलना मुश्किल हो गया है।

    जजों ने कहीं भी अपने फैसले मे आस्था के नाम पर यह जगह हिद्दुओं को नही दी, हिन्दुओं को वो स्थान ASI के निश्कर्ष से मिला है, परन्तु इन लोगो ने आँख बंद रखने की कसम जो खाई हुई है, इसका कोइ इलाज किसी के पास नही मिलेगा।

    झटका तो इन लोगो को लगा है जो यह बहकी बहकी बातें कर रहे हैं। वैसे भी ममता बनर्जी इन सबको रात मे सपने में आ कर सोने नहीं देती है, अब तो यह इस निर्णय के पश्चात दिन मे चैन भी नही ले पाएगे।

    राम के जन्म को आस्था के नाम पर मानना गलत है पर लेनिन के जन्म को नहीं? उसका birth certificate तो इनके घर मे है न? रूस के इतिहासकार को मानेगे, पर हमारे साहित्यकार को नही। इन्हे तो शायद अपने होने पर भी शक होगा, birth certificate चाहिए न।

    1. रविन्द्र जी ये चतुर्वेदी इंडियन नहीं है क्योनी इसे शर्म नहीं आती राम के अस्तित्वा पे सवाल करता है लेकिन अपने बाप के astitva par nahi

      एक बार और कहूँगा चतुर्वेदी जी देश सबसे बड़ा होता है उससे गद्दारी मत करो और अमन चन रहने दो

    2. बहुत अच्छा उत्तर दिया है इस तरह के साहित्यकार तो इससे भी जटिल टिप्पड़ी के अधिकारी होते है

  7. हद है लेकिन. अति आदर मन में रहते हुए भी लेखक को केवल रात के अँधेरे को ही देख पाने वाले उल्लू की ही संज्ञा दी जा सकती है. हद है कि एक जज के विचार को उन्होंने संघ पर झटका के रूप में निरूपित किया लेकिन दो जजों ने जो मंदिर तोड़े जाने की बात की है उसकी कोई चर्चा नहीं. यहाँ तक कि न्यायमूर्ति शर्मा ने तो पूरा ही भू-खंड राम जन्मभूमि के रूप में माना है. अब-जब लगभग सारे देश में अमन-चैन दिख रही है तब ऐसा लग रहा है कि केवल कुछ मुट्ठी भर वामपंथी बचे हैं जो इस अमन से काफी मायूस हैं. भर्त्सना ऐसे कु-बुद्धिजीवियों को.

    1. jo jo cinatk or gyanvan hain we sb apni -apni rai rakhne ke liye swtantr hain .chaturvedi ji ke aaklan se sahmat nahin hain jo unhen ye adhikar kisne diya ki chaturvedi ji kevyktigat vichar prakat karne ko bhi vaam panth se jod den .vaampanth ne jo alakh jagaai thi whi to lucknow khandpeeth ne apne faisle men sunaya hai .8000page ke faisle ko poora padhe tabhi apna mat vykt karen to behtar hoga .

      1. चतुर्वेदी जी ने रात भर जाग कर ८००० पन्ने का निर्णय पढा तब जा कर लेख लिखा है, तिवारी जी ने भी तभी टिप्पणी की है।

  8. संघ का दावा ख़ारिज हुआ हो या न हो लेकिन आपका दावा जरूर ख़ारिज हो गया की वहां पहले कोई मंदिर नहीं था जी पी आर अस सर्वे और एएसआइ की जो रिपोर्ट आप ख़ारिज कर रहे थे न्यायालय ने उसे सबूत के रूप में स्वीकार किया है और तीनो माननीय न्यायाधीसो ने ये माना है की वहां मंदिर था केवल न्यायाधीश खान की राय ये थी की मंदिर को तोडा नहीं गया है जबकि बहुमत की राय यहीं थी की मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाई गयी
    हमारे नहीं तो कम से कम न्यायालय के फैसले को तो मानिये
    और जहाँ तक झटके लगने का सवाल है ये तो कोई भी समझ सकता है की झटका किसे लगा है

  9. Pandit Ji

    Ab to thoda sharm kijiye . Ap bohi hain jo pahle kah rahe the ki bahan Koi mandir nahin tha. Ram ki Janmbhumi boh nahin thi. Lekin High Court ke nirnay ne Ap Jeise hajaron logon jo Bharat ka swabhiman ko nicha karne mein jee jan se lage hain, Unpar tamacha mara hai .

    Is bare mein apke sare tark khokhle ho chuke hai . AP asatya beten kah rahe the yah pramanit ho gaya hai . . Mere apse binti hai ki is bare mein tippani na karen aur Bhartiya Mulyon ke Pratik Ram Mandir Nirman mein sahyog prafan keren .

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