लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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डॉ. शुभ्रता मिश्रा

यूरोप में फ्रांस की राज्यक्रांति के बाद प्रायः सभी यूरोपीय देश स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सैद्धांतिक आधार पर राजशाहियों से मुक्त होने लगे थे। इस मुक्तनाद का स्वर ऊँचा करने वाले पश्चिमी विचारकों और नेताओं ने अपने चिंतन की दिशा राजनैतिक संघर्षों से हटकर सामाजिक चिंतन की ओर उन्मुख की। प्लेटो, रुसो, अरस्तू और मेकियावली से प्रारम्भ हुई यह श्रृंखला एशिया में आकर ही समाप्त हुई। इस तरह राजनैतिक और शैक्षिक स्तर पर उन्नति होने से सामाजिक चिंतन करने वाले विचारकों का अभ्युदय यूरोप में एशिया की तुलना में शीघ्र हुआ। निःसंदेह यूरोप से लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता की हवाओं को भारत तक आने में कुछ समय लगा। अतः भारत में भारतीय समाज पर चिंतन करने वाले विचारकों का अभ्युदय उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ। भारतीय समाज इस समय राजनैतिक रुप से सुप्त, शैक्षिक रुप से पिछड़ा, धार्मिक रुप से भीरु और अंधविश्वासी, आर्थिक रुप से दरिद्र तथा सामाजिक रुप से भेदभाव व वैमनस्य की दासता में जकड़ा हुआ था। भारतीय सामाजिक विचारकों के लिए ये चिंता के प्रश्न थे। इन क्षेत्रों में भारतीय समाज की न्यूनताओं को दूर करने के लिए यह आवश्यक था कि भारतीय समाज के प्रत्येक पहलू पर चिंतन हो और कुछ जमीनी कार्य भी हों।

भारतीय समाज पर समग्र चिंतन करने वाले विचारकों में महात्मा गाँधी का नाम तो सर्वोपरि है ही, परन्तु साथ ही उग्रवादी चिंतकों में बालगंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, आदि; समाजवादी चिंतकों में आचार्य नरेंद्रदेव, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आदि का नाम उल्लेखनीय है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से प्रारम्भ हुए भारतीय सामाजिक चिंतन की दिशा में कार्यरत विचारकों में पंडित मदनमोहन मालवीय जी महाराज का नाम उन ऐसे चिंतकों की श्रेणी में आता है, जिन्होंने भारतीय समाज पर समग्र चिंतन किया। वे किसी वाद के अधीन नहीं थे। भारतीय समाज पर उन्होंने स्वयं अपने विशिष्ट विचार दिए। भारतीय राजनीतिक विचारों के इतिहास में मालवीय जी का मुख्य योगदान उनका व्यापक राष्ट्रवाद का सिद्धांत है। इस क्षेत्र में वे स्टालिन, हार्डेनबर्ग, गेटे और फिख्टे की श्रेणी में आते हैं, जो संस्कृति को राष्ट्रवाद का आधार मानते हैं।

पंडित मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर 1861 को एक भागवतमर्मज्ञ नैष्ठिक ब्राह्मण कुल में प्रयाग में हुआ था। वे आधुनिक भारत की सर्वाधिक महान विभूतियों में से एक थे। संस्कृत, हिन्दी और अँग्रेजी के वे अधिकारपूर्ण वक्ता थे। मालवीय जी के असाधारण व्यक्तित्व का आधुनिक भारत की राजनीति, समाज, शिक्षा तथा संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा है। एक सामाजिक चिंतक होने के नाते मालवीय जी अपने चिंतन की सरिता समाज के समुद्र में प्रवाहित करना चाहते थे। वे लेखन को समाजसेवा का सर्वप्रमुख माध्यम मानते थे। उन्होंने हिन्दी दैनिक “हिन्दुस्तान” का अनेक वर्षों तक सम्पादन किया। कुछ समय तक वे “द इण्डियन यूनियन” पत्र के भी सम्पादक रहे। उन्होंने “अभ्युदय” नामक एक हिन्दी साप्ताहिक की भी स्थापना की। इसके अलावा मालवीय जी ने मर्यादा, सनातन धर्म, हिन्दुस्तान रिव्यु, स्वराज्य तथा इण्डियन पीपल जैसी तत्कालीन उत्कृष्ट पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में अपने कला, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, साहित्य, धर्म और समाज से सम्बद्ध उत्कृष्ट लेखों के माध्यम से भारतीय समाज को एक नवीन चिंतन से परिपूरित किया।

पंडित मदनमोहन मालवीय जी महाराज की उम्रभर की राष्ट्रीय और सामाजिक सेवाओं का चिरस्थायी स्मारक बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय है। प्रारम्भ से ही उनका स्वप्न था कि एक ऐसा शुभ दिन आए जब भारतीय युवावर्ग को उच्चशिक्षा के लिए विदेश न जाना पड़े। वे यह देखकर भी द्रवित होते थे कि अन्य धर्माबलम्बी अपने धर्म के विषय में जो ज्ञान रखते हैं, हिन्दु विद्यार्थी अपनी समृद्ध संस्कृति के विषय में उतना ज्ञान नहीं रखते। ऐसे महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कि भारतीय भी अपनी समृद्धशाली संस्कृति की अस्मिता से परिचत हों, मालवीय जी ने अथक श्रम किया। देश के कोने कोने से सहायता और धनराशि जोड़ने के लिए इस महापुरुष ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। यह थी उनकी समाज सेवा और ऐसा था मालवीय जी का सामाजिक चिंतन।

मालवीय जी के सामाजिक दर्शन में एक देश की आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण स्थान था। वे तत्कालीन भारतीय समाज की उस दशा से दुखी थे कि एक समय का भारत जैसा समृद्ध देश चाकू, कपड़े, बटन और साबुन जैसी दैनिक उपयोगी वस्तुओं के लिए इंग्लेण्ड पर आश्रित था। सन् 1881 में प्रयाग में मालवीय जी ने एक देशी “तिजारत कम्पनी” की स्थापना की, जो दैनिक उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करती थी। हांलाकि यह मात्र छः माह की अवधि तक ही चल सकी थी।

मालवीय जी का हिन्दु सभ्यता और संस्कृति के शाश्वत मूल्यों में अटूट विश्वास था और उनका यह विश्वास ही उनके जीवन तथा कार्यपद्धति का मुख्य आधार था। वे ईश्वर भीरु थे और धर्म के प्रति उनके मन में जन्मजात श्रृद्धा थी। मालवीय जी ने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए एक व्यापक सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उनका कहना था कि देश के नैतिक, बौद्धिक और आर्थिक साधनों का परिवर्धन करने के लिए लोगों में लोककल्याण और लोकसेवा की भावना उत्पन्न करना भी नितांत आवश्यक है। मूलतः एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण वे अत्यधिक धार्मिक विश्वासी थे। यद्यपि धर्म में किसी भी व्यक्ति की आस्था उसका नितांत व्यक्तिगत पहलू होता है, परन्तु हम ऐसा नहीं कह सकते कि इस कारण मालवीय जी के धार्मिक दर्शन का समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा होगा। बल्कि मैं मानती हूं कि यदि ऐसा हम सोचते भी हैं तो निःसंदेह यह मालवीय जी के धार्मिक चिंतन के प्रति अन्याय करना ही होगा। मालवीय जी ने असँख्य धार्मिक लेख लिखे, वे अंततः समाज के लिए ही थे। “कल्याण” नामक हिन्दु धार्मिक पत्रिका उनके धार्मिक विचारों का सर्वाधिक प्रतिनिधित्व करती है। वे भारतीय समाज को धर्ममय और आस्थामय देखना चाहते थे। धर्माधारित जीवन पवित्र, सत्य और उज्जवल होता है। धर्म पर चलने का उनका मुख्य कारण यही था।

मालवीय जी के धार्मिक विचारों और धार्मिक कार्यों में भी समाज का हितचिंतन निहित था। उन्होंने “गौरक्षा संघ” की स्थापना भी की थी। वे सनातन धर्म सभा, हिन्दु महासभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन इत्यादि अनेक संस्थाओं के बहुमुखी नेता, संचालक और प्राण थे। सन् 1932 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमजे मैकडानल्ड ने साम्प्रदायिक निर्णय दिया, तब मालवीय जी ने इसका मुखर विरोध किया। कई बार उनके धार्मिक विचारों को साम्प्रदायिकता से ग्रस्त दृष्टिकोण से देखा गया। लेकिन वास्तव में वे एक राष्ट्रवादी और सच्चे देशभक्त थे। लाहौर में 28 जून 1933 को दिए उनके एक भाषण में उन्होंने स्वयं कहा था कि “स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रथम कदम हिन्दु तथा मुसलमानों की एकता का होना है। मैं धर्म में विश्वास रखता हूं। जब कभी भी मैं मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों के सामने से गुजरता हूं, तो स्वाभाविक रुप से मेरा मस्तक झुक जाता है।”

मालवीय जी महाराज का समस्त जीवन भारतवर्ष, सनातन धर्म और हिन्दु संस्कृति की सेवा में बीता। वे जीवन के प्रभातकाल से ही मानवता की रक्षा और समृद्धि की चिंता में लगे थे। नोआखली के नरनारियों पर होने वाले बरबर अत्याचारों ने उन्हें आकुल कर दिया था। उनका हृदय दुख, संताप और वेदना से भर गया था। इसी चिंता में फलतः वे शैय्या पर पड़ गए। अंततः सन् 1946 में भारत के प्राण, भूतल के महाप्राण, धर्म के स्तम्भ और पवित्र आचार के मूर्तिमान विग्रह, हिन्दु जाति की आत्मा पंडित मदनमोहन मालवीय जी महाराज स्वर्ग सिधार गए।

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