मीना कुमारी अपने से जिंदा रहने के लिए नहीं, मरने के लिए लडी थी ,छह नाम थे इनके

-अनिल अनूप
बहुत से लोग आज इस बात को यक़ीन से कहते हैं कि धर्मेन्द्र ने अपना करियर बनाने के लिए मीनाकुमारी का इस्तेमाल लिया.
उस समय मीनाकुमारी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थीं. शायद असल कहानी तो कभी बाहर आएगी नहीं लेकिन सच्चाई यह है कि धर्मेन्द्र के आगमन के २-३ सालों में कमाल अमरोही और मीनाकुमारी का अन्यथा प्रसन्न रहा दाम्पत्य गुलाटी कहा गया और हालत यहाँ तक आई कि १९५४ में कमाल ने ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग तक बंद करवा दी.
इसके बाद भी धर्मेन्द्र ने मीनाकुमारी से अपनी नजदीकियां कम नहीं कीं उन्हें अपना करियर बनाना था. ‘काजल’ फ़िल्म की सफलता इस तथ्य को प्रमाणित करती है. नायक के रूप में धर्मेन्द्र की पहली सुपरहिट थी ‘फूल और पत्थर’- यह भी मीनाकुमारी की मेहरबानी थी, क्योंकि धर्मेन्द्र की उपस्थिति के कारण ही मीनाकुमारी ने इस फ़िल्म में काम करने की सहमति दी थी.
एक बार धर्मेन्द्र स्टार बन गए तो सारा कुछ बदल गया. अब धर्मेन्द्र दूसरे ठिकानों की तरफ निकल पड़े और मीनाकुमारी को अपने तिरस्कृत किये जाने का दुखद अहसास हुआ. यहीं से मीनाकुमारी के जीवन में शराब की घातक एंट्री हुई जो अंततः उनका जीवन लील गयी.
लेकिन इन सारे सालों में मीनाकुमारी ने कमाल अमरोही को प्रेम करना बंद नहीं किया. इसी वजह से जब उन्हें अहसास हुआ कि ख़राब स्वास्थ्य के चलते अब उनका लम्बे समय तक जीना मुश्किल है, उन्होंने ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग के लिए हामी भर दी. मीनाकुमारी को पता था कि वह फ़िल्म कमाल अमरोही के जीवन का सबसे बड़ा सपना था जिसे पूरा करने को वे बेचैन थे. ‘पाकीज़ा’ की शूटिंग इस बार बगैर धर्मेन्द्र के शुरू हुई – उनके बदले राजकुमार को ले लिया गया था. यह एक तरह से वरदान ही सिद्ध हुआ क्योंकि धर्मेन्द्र की अभिनय क्षमता के बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा. सलीम का किरदार जिस तरह राजकुमार के माध्यम से जीवंत हुआ, धर्मेन्द्र शायद उसका सौवां हिस्सा भी न दे पाते. फ़िल्म में मीनाकुमारी और राजकुमार दोनों का काम शानदार है.
‘पाकीज़ा’ जब तक रिलीज़ हुई, मीनाकुमारी के लिए सब ख़त्म हो चुका था. रिलीज़ के कुछ ही हफ़्तों बाद उनकी मौत हो गयी – एक निहायत अकेली और शर्मसार कर देने वाली मौत. मीनाकुमारी के अंतिम यातनाभरे दिनों में धर्मेन्द्र उनके आसपास फटके तक नहीं.
उन दिनों में मीनाकुमारी ने एक बार अभिनेता प्रदीप कुमार से कहा था कि “अल्लाह उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा जिन्होंने उसका घर उजाड़ कर रख दिया.”
उनका असली नाम महजबीं बानो था. अपने दमदार और संजीदा अभिनय से सिने प्रेमियों के दिलों पर छा जाने वाली मीना कुमारी ने 7 साल की उम्र से ही अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरूआत कर दी थी. उन्होंने 1939 में विजय भट्ट की ‘लेदरफेस’ से अपने फ़िल्मी करीयर की शुरूआत की थी. पढ़िए मीना कुमारी से जुड़ी ऐसी बातें जो आप नहीं जानते होंगे.
बच्ची का चांद सा माथा देख कर उनकी मां ने उनका नाम महजबीं रखा था. बाद में यही माहजबीं फ़िल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी के नाम से मशहूर हुईंl
बचपन के दिनों में मीना कुमारी की आंखें काफ़ी छोटी थीं इसलिए परिवार वाले उन्हें ‘चीनी’ कहकर भी पुकारते थे.
मीना कुमारी को फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा शेरो-शायरी का भी बेहद शौक था. इसके लिये वह ‘नाज़’ उपनाम का इस्तेमाल करती थीं.
1952 में मीना कुमारी ने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही के साथ शादी कर ली. अमरोही उन्हें प्यार से ‘मंजू’ कहकर बुलाया करते थे.
मीना कुमारी को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए चार बार फ़िल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार से नवाज़ा गया. इनमें बैजू बावरा, परिणीता, साहिब बीबी और गुलाम और काजल शामिल हैं.
1962 मीना कुमारी के सिने कैरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ. इस साल उनकी ‘आरती’, ‘मैं चुप रहूंगी’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं.
1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही की विवाहित जिंदगी मे दरार आ गई. इसके बाद मीना कुमारी और कमाल अमरोही अलग-अलग रहने लगे.
कमाल अमरोही की फ़िल्म पाकीज़ा के निर्माण में लगभग 14 साल लग गए. कमाल अमरोही से अलग होने के बावजूद मीना कुमारी ने शूटिंग जारी रखी क्योंकि उनका मानना था कि पाकीज़ा जैसी फ़िल्मों में काम करने का मौका बार-बार नहीं मिल पाता है.
1953 में फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाली मीना कुमारी पहली अभिनेत्री हैं.
महमूद ने मीना कुमारी की बहन से शादी की थी. उन्होंने मीना कुमारी को टेबल टेनिस खेलना भी सिखाया था.
मीना कुमारी की शराब पीने की लत ने उनके लीवर को काफ़ी नुकसान पहुंचाया था जिसके कारण वह 1968 में गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी.
अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिलों में खास पहचान बनाने वाली मीना कुमारी ने 31 मार्च 1972 को दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन फ़िर भी वो अभिनय के द्वारा आज भी हमारे दिलों में मौजूद हैं.
“परिणीता” से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों की आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर रह गयी। काम के प्रति समर्पित मीना कुमारी अपने काम में कमाल अमरोही की बेवजह दखल को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और वर्ष 1964 के बाद वे दोनों अलग-अलग रहने लगे और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे में डूबो लिया। कमाल अमरोही से अलग होने के बाद भी कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ की शूटिंग जारी रखी। वर्ष 1972 में जब ‘पाकीजा’ प्रदर्शित हुई तो फिल्म में मीना कुमारी के अभिनय को देख दर्शक मुग्ध हो गए पर फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी तबीयत काफी खराब रहने लगी थी। “ठाड़े रहियो” और “चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था” गीतों के फिल्मांकन के दौरान मीना कुमारी कई बार नाचते-नाचते बेदम हो कर गिर पड़ती थी। यह फिल्म आज भी मीना कुमारी के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है। वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिने करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ।
मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1954 में भी फिल्म ‘परिणीता’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद लगभग 8 वर्षों तक इंतजार के बाद वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ मिला। इसके बाद वर्ष 1965 में फिल्म ‘काजल’ के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार से सम्मानित की गईं।
मीना कुमारी अपने आधा दर्जन नामों से जानी जाती थी- महजबीं आरा (माता-पिता), चीनी (परिवार वालो ने- क्योंकि इनकी आखें छोटी थी), बेबी मीना (बतौर बाल-कलाकार), मीना कुमारी (होमी वाडिया की फिल्म “बच्चों का खेल” में बेबी मीना ने पहली बार हीरोइन का रोल किया। वे इस फिल्म में मीना कुमारी बन गई और फिर इसी नाम से आखिरी फिल्म “गोमती के किनारे” तक लगातार काम करती रहीं।), नाज़ (शायरी के लिए उपनाम) और मंजू (कमाल अमरोही द्वारा दिया गया नाम)।
मीना कुमारी ने ‘हिन्दी सिनेमा’ जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है। वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं, उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी। अपने जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया, उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो। गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. ये तो शायद ‘अल्लाह ताला’ की वदीयत थी उन्हें। तभी तो कहा उन्होंने –
कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको
मीनाकुमारी की ज़िंदगी अपने पति के शोषण से प्रताड़ित रही है। मीना कुमारी अपनी जिंदगी का फैसला खुद नहीं कर सकी। वह अपने परिवार के लिए आमदनी का एक साधन बनकर रह गई। वह दूसरों की उँगलियों के इशारे पर अंत तक नाचती रही। वह ज्यादतियाँ बर्दाश्त करती रही परंतु उनका सामना करने की अपने में ताकत नहीं सँजो सकी।
मीना कुमारी ने अपने हक की लडाई को शराब की प्यालियों में पी जाना बेहतर समझा बजाय सिर उठाने के। अंदर की चोटों से तिलमिला कर उन्होंने अपनी तन्हाइयों में शायरी का दामन थाम कर खुद को बचाये रखा। उसकी शायरी में ग़म है, आग नहीं, बगावत नहीं। वे कहतीं थीं,
“आपको अपने बाजुओं की ताकत पर
नाज़ है तो हमें अपनी सहनशक्ति और
रूहानी ताकत पर।“
अंदर के अँधेरों की छटपटाहट से बेबस होकर वह शराब की प्यालियों में अपने को डुबोती गईं और जब कभी तन्हा दर्द पिघल उठा, तब उससे शायरी फूट पडी। मीना आमदनी का जरिया बनकर भी दिल की, मुहब्बत की, आशिकी की और ईमान की बेशुमार ताकत थीं। वह अपने से जिंदा रहने के लिए नहीं, मरने के लिए लडी थीं। उस मरने के लिए जिसके आगे मौत अपने को यतीम महसूस करती है।
और जाते जाते सचमुच सारे जहाँ को तन्हां कर गयीं। जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं। दर्द चुनती रहीं, संजोती रहीं और कहती रहीं –
टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली
जब चाहा दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली
होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सादा-सी जो बात मिली
एक बार गुलज़ार साहब ने उन पर एक नज़्म लिखी थी :
शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर
अपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी
पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी। कहने लगी -“जानते हो न, वे तागे क्या हैं? उन्हें प्यार कहते हैं। मुझे तो प्यार से प्यार है। प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है। इतना प्यार कोई अपने तन से लिपटा कर मर सके तो और क्या चाहिए?” महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा। “बैजू बावरा”,”परिणीता”, “एक ही रास्ता”, ‘शारदा”. “मिस मेरी”, “चार दिल चार राहें”, “दिल अपना और प्रीत पराई”, “आरती”, “भाभी की चूडियाँ”, “मैं चुप रहूंगी”, “साहब बीबी और गुलाम”, “दिल एक मंदिर”, “चित्रलेखा”, “काजल”, “फूल और पत्थर”, “मँझली दीदी”, ‘मेरे अपने”, “पाकीजा” जैसी फिल्में उनकी “लम्बी दर्द भरी कविता” सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है –
थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं….
गीतकार और शायर गुलजार से एक बार मीना कुमारी ने कहा था, “ये जो एक्टिग मैं करती हूं उसमें एक कमी है। ये फन, ये आर्ट मुझसे नही जन्मा है। ख्याल दूसरे का, किरदार किसी का और निर्देशन किसी का। मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूं। जो मैं कहना चाहती हूं, वह लिखती हूं।“
मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया, जिसे उन्होंने नाज उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपनी जिंदगी का नजरिया पेश किया है-
चांद तन्हा है
आसमां तन्हा
दिल मिला है
कहां-कहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे
ये जहां तन्हा
लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज करने वाली हिंदी सिने जगत की महान अभिनेत्री मीना कुमारी 31 मार्च 1972 को इस दुनिया से सदा के लिए रुखसत हो गई।

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