मगध साम्राज्य पाटलीपुत्र के राजवंश

—विनय कुमार विनायक
महाभारत कालीन बृहद्रथ पुत्र जरासंध के
वंशजों की राजधानी गिरिव्रज थी मगध की
पांच सौ चौवालीस ई.पू.हर्यकवंशी भट्टी ने
अपने पुत्र बिम्बिसार को गिरिव्रज की गद्दी दी
गिरिव्रज को बिम्बिसार ने राजगृह का नाम दिया
बिम्बिसार के पौत्र, अजातशत्रु के पुत्र उदायिन ने
राजगृह से पाटलीपुत्र राजधानी को बदल दी थी
अंतिम हर्यक नागदशक से शिशुनाग ने सत्ता ली!

कहते हैं शिशुनाग नागदशक का अवैध पुत्र था
जिनसे चला हर्यक से हटकर शैशुनाग राजवंश
शिशुनाग पुत्र काकवर्ण कालाशोक शक्तिशाली,
इस वंश का अंतिम शासक था महानन्दिन जो
जैन मुनि बनकर सत्ता छोड़ हो गए थे सन्यासी,
इस अराजक स्थिति में सम्राट बना महापद्मनन्द,
महापद्म नन्द भी दासी पुत्र था महा नन्दिन का!

महापद्म नन्द से नन्द वंश चला धना नन्द तक,
कौटिल्य ने नन्दवंश की सत्ता को उखाड़ फेंकी
और धनानन्द के मुरा दासी से उत्पन्न वीर पुत्र
चन्द्रगुप्त मौर्य को पाटलीपुत्र का सम्राट बनाया,
विशाखदत्त का मुद्राराक्षस और विष्णु पुराण है
साक्षी कि चन्द्रगुप्त मौर्य मुरा-धनानन्द का पुत्र था
किन्तु चन्द्रगुप्त मौर्य से चला मौर्य का नया वंश
ई. पू. तीन सौ इक्कीस से एक सौ छियासी तक!

अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ को उनके ही सेनापति
पुष्यमित्र शुंग ने ईसा पूर्व एक सौ छियासी वर्ष में
वध कर ब्राह्मणी शुंग साम्राज्य किया था स्थापित!
शुंग थे ब्राह्मण इस वंश के पूर्व सभी थे जैन बौद्ध
शुंगवंश ने बौद्ध ,जैन श्रमणों का कत्लेआम किया,
बलि प्रथा जो जैन,बौद्ध काल में बंद थी उसे शुंग ने
अश्वमेध यज्ञ करके शुभारंभ की और नहीं उपलब्धि,
ई.पू.पचहत्तर में वसुदेव कण्व के हाथ मरा देवभूति!

शुंग अमात्य वसुदेव कण्व भी जाति से ब्राह्मण था
ईसा पूर्व तीस में कण्ववंश की सत्ता छिन गयी थी
दक्षिण के आन्ध्र भृत्य ब्राह्मण सातवाहन के हाथों,
तबसे पाटलीपुत्र की केन्द्रीय सत्ता बिखर गयी थी
फिर लगातार विदेशी शक, हूण,कुषाण शासकों ने
हिन्दू धर्म अपनाकर राज किया गुप्तवंश के पहले!
ई. पू. तीस से तीन सौ बीस ई. तक इतिहास का
यह दौर मगध साम्राज्य का अंधा युग कहलाता है!

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