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    Homeसाहित्‍यदोहेअब मैं आता हूँ मात्र!

    अब मैं आता हूँ मात्र!

    अब मैं आता हूँ मात्र अपनी,

    विश्व वाटिका को झाँकने;

    अतीत में आयोजित रोपित कल्पित,

    भाव की डालियों की भंगिमा देखने!

    उनके स्वरूपों की छटा निहारने,

    कलियों के आत्मीय अट्टहास की झलक पने;

    प्राप्ति के आयामों से परे तरने,

    स्वप्निल वादियों की वहारों में विहरने!

    अपना कोई उद्देश्य ध्येय अब कहाँ बचा,

    आत्म संतति की उमंगें तरंगें देखना;

    उनके वर्तमान की वेलों की लहर ताकना,

    कुछ न कहना चाहना पाना द्रष्टा बन रहना !

    मेरे मन का जग जगमग हुए मग बन जाता है,

    जीवित रह जिजीविषा जाग्रत रखता है;

    पल पल बिखरता निखरता सँभलता चलता है,

    श्वाँस की भाँति काया में मेहमान बन रहता है!

    मेरी सृष्टि मेरी द्रष्टि का अहसास लगती है,

    और मैं अपने सुमधुर सृष्टा का आश्वास;

    दोनों ‘मधु’ सम्बंधों में जकड़े,

    आत्म-अंक में मिले सिहरे समर्पण में सने!

    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

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