कश्मीरी लोगों को इलाहाबाद के माघ मेले से भगाया

इलाहाबाद, १३ जनवरी. कश्मीर के लोगों उनके अपने ही देश में जिस तरह शक की निगाहों से देखा जाता है इसका एक नमूना बुधवार को इलाहाबाद के संगम पर हर साल लगाने वाले माघ मेले में भी देखने को मिला. यहाँ कश्मीर के अनन्तनाग से आये शाल और ऊनी वस्त्र विक्रेताओं को विदेशी बता कर भगा दिया है. मेले में हर वर्ष की तरह इस बार भी करीब 17 कश्मीरी लोगों ने अपने स्टाल लगाये थे. उन्हें मेले एक एक ठेकेदार दिनेश कुमार पासी ने अवैध करार देते हुए तुरंत वहां से चले जाने की धमकी दी और उनके स्टोल उलट-पुलट दिए. कश्मीरी शाल विक्रेतावों ने प्रशासन को भी अपनी समस्या बताई लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया.

अनन्तनाग से आये एक विक्रेता गुलाम अहमद ने बताया की वह कश्मीर के खादी ग्रामोद्योग से जुड़े हुए हैं, और उनके पास इस बात के प्रमाण भी हैं. उन्होंने बताया की कश्मीर से वह 25 हज़ार रुपये खर्च कर आये थे. इससे पहले हम लोगों ने देहरादून में भी अपना स्टोल लगाया था. बुधवार को उनके स्टोल पर कुछ लोगों ने अचानक हमला बोल दिया और उन्हें विदेशी बताते हुए मेले से चले जाने को कहा. एक अन्य विक्रेता मोहम्मद इकबाल ने बताया की वो सभी कश्मीर के निवासी हैं और हर साल इस मेले में आते हैं. उधर, इस घटना की जानकारी मिलने के बाद पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने इसकी निंदा करते हुए प्रशासन से कश्मीरी लोगों को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की मांग की है. पीयूसीएल के राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम व लक्ष्मण प्रसाद ने कहा की कश्मीरी लोगों के साथ उनके देश में ही ऐसा दुहरा व्यहार बर्दास्त के काबिल नहीं है.

9 thoughts on “कश्मीरी लोगों को इलाहाबाद के माघ मेले से भगाया

  1. हमने आजतक किसी कश्मीरी पंडित को तमीज से बात करते नहीं देखा!न ही कोई गरीब कश्मीरी पंडित देखा!
    बस!रो कर कितना लाभ मिल सकता है?इसकी कोशिश मे हमेशा रहते है!!

  2. yah gatana hindu-muslim ya fir kashmir se jyada “vyapar” ki lagati he,vayvsayik pratidavndita ke chalate aneko bar sthaniy vyapari ya majadoor bahar se ane vale vyapariyo v majdooro ko tang karate he ya pratadit karate he,esame unako koe dosh nahi hota balki market par kabjja karane ki bhavana mukhy rup se uttardayi he.yr bahut hi “natural” phenomena he yaha bahari ya sthaniy ke paribhasha spst nahi he,ek hi state ka hote huve bhi alag alag sharo ke log ek dusare ko bahari ya sthaniy kah sakate he………………………..

  3. लाखनजी अच्छा होता, यदि आप दो शब्द कश्मिरी पंडितोंपर जो अन्याय हुआ है, उसके विषयमें भी कहते।वैसे, समाज (Mass psychology) या भीड के मानस शास्त्रमे आपके प्रश्नका विश्लेषण है, स्पष्टीकरण है, उत्तर नहीं। वैसे, अमरिकामें, आज आतंकसे जुडे समुदाय जैसे दिखाइ पडने वाले को भी हवाइ अड्डोंपर सघन और कभी, कभी निर्वस्त्र जांच से गुजरना पडता है।इसका अनुभव मुझे भी हुआ है।वैसे अमरिकामें जब ९/११ का आतंकवादी हमला हुआ था, तब सिख बंधुओंको भी (दाढी पगडीके) भ्रमके कारण कुछ कठिनाइयोंसे गुजरना पडा था।ऐसे वह अन्याय हि था।समाज या भीडका अपना मानस शास्त्र है।जन प्रवाद ऐसेहि व्यवहार मे व्यक्त होता है।

  4. जो लोग कश्मीरियों को माघ मेले से भगाए जाने से फूले नहीं समां रहे हे उनके संतोष के लिए एक और समाचार हे की घ्हत्तिस्गढ़ की पुलिस ने का शाम को रायपुर में बंगाल से आये कपडा बेचने वाले lagbhag २५ लोगो को गिरफ्तार kar के जेल भेज दिया.ये bangali bhi इलाहाबाद के कश्मीरियों की तरह २५-३० सालो से कपडा बेचने का कम करते थे.दोनों घटनाओ में एक ही सामान बात हे की वो सभी मुसलमान हे और यही उनका दोष हे,kayoki न तो इन्होने आपके अनुसार कश्मीरी पंडितो पर अत्याचार किये हे और न इन पर नक्सल समर्थक होने का आरोप हे.लाखन जे सिंह ambikapur

  5. ऐसा हुआ है ये कोई नयी बात नहीं , आखिर हम एक सेकुलर देश में जी रहे है !भारत एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश है , यहाँ अजमल आमिर कसाब के तो हक़ है लेकिन उसके द्वारा मारे जाने वाले लोगो का कोई अधिकार नहीं था बल्कि वो तो मानव ही नहीं थे ,वो भारत की गरीब जनता थी जिसके बारे में कम से कम अधिकारों की बात तो न करे !

  6. सबसे अव्वल सवाल ये है कि, ये ‘पीयूसीएल’ और मानवाधिकार वाले कभी भी कश्मीरी पंडितो के हक़ की बात क्यों नहीं करते??

  7. “शाहनवाज़ आलम व लक्ष्मण प्रसाद ने कहा की कश्मीरी लोगों के साथ उनके देश में ही ‘ऐसा दुहरा व्यवहार’ बर्दास्त के काबिल नहीं है.”
    यह बात निश्चित रूपसे मानता हूँ, पर साथमे इससे भी अत्यंत अन्यायी क्रूरतापूर्ण वह बर्ताव था, जो कश्मीरी मुसलमानोंने कश्मीरी हिंदू पंडितोंके साथ किया था। जिसमे मेरी जानकारीके अनुसार हत्त्याएं, बलात्कार, भूसंपत्तिपर अधिकार कर लेना,और अंतमे उन्हे उन्हीके प्रदेशसे जहां वे वंशानुवंश, परंपरासे, सदियोंसे रहते आए थे, अनगिनत अत्याचार सहकर,आज अपनेहि देशमे, निर्वासित (Refugee) बनकर ठोकरे खा रहे हैं। उसको भूलकर, उसके संदर्भ बिना, यह समाचारभी कैसे दिया जा सकता है ? क्या वह दुहरा व्यवहार नहीं था? और वह व्यवहार क्या बर्दाश्त के काबिल था? आपको याद कैसे ना आया? न्यायका एक सिद्धांत स्थानापत्ति है। यदि ’क्ष’ ’य’ के प्रदेशमे जाता है, तो उससे जिस प्रकारका बर्ताव किया जाएगा, ठीक वैसाहि बर्ताव य ने क्ष के प्रदेशमे जानेपर अपेक्षित है। चित मै जीता, पट तू हारा, इसे अन्याय कहा जाता है।और यह घोर अन्याय है। मै यही मानता हूँ।

Leave a Reply

%d bloggers like this: